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जिस गांधी को 'अधनंगे फकीर' से फर्क नहीं पड़ा उन्हें 'चतुर बनिया' से क्या पड़ेगा

गांधी ने अपने जीवन में खुद के लिए कई बार बनिया सुना, कई बार खुद को बनिया कहा

Manoj Kumar | Published On: Jun 11, 2017 09:29 PM IST | Updated On: Jun 11, 2017 09:29 PM IST

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जिस गांधी को 'अधनंगे फकीर' से फर्क नहीं पड़ा उन्हें 'चतुर बनिया' से क्या पड़ेगा

मोहनदास करमचंद गांधी एक इंसान रहे. महज एक संज्ञा-जिससे किसी व्यक्ति विशेष का बोध होता है. मगर, यही संज्ञा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का पर्याय बनकर सर्वनाम बन जाता है.

आंदोलन का अहिंसात्मक रूप से सृजन कर विशेषण बन जाता है. आंदोलन की गति, उसका जीवन और उसकी धार बनकर क्रिया बन जाता है. यही संज्ञा तब समास बन जाता है जब-जब हमें गांधी याद आते हैं अलग-अलग रूपों में- कभी बुरा देखने, सुनने और कहने से बचने का संदेश देते हुए, कभी छुआछूत के खिलाफ अलख जगाते हुए, तो कभी सांप्रदायिकता से लड़कर जान देते हुए और अक्सर अनशन और सत्याग्रह के जरिए सामाजिक हक हासिल करने की जिद करते हुए.

गांधी, बापू, संत, महात्मा, राष्ट्रपिता, अधनंगा फकीर, बनिया, चतुर बनिया....चाहे लोग सुविधानुसार जिस नाम से उन्हें याद कर लें, पर वे चंपारण सत्याग्रह के 100 साल बाद भी भारतीयता, विश्वबंधुत्व और मानवता का व्याकरण बने दिख रहे हैं.

किताब फाड़ सकते हैं, भाषा मार नहीं सकते

व्याकरण के बिना भाषा नहीं बनती, भाषा के बिना संवाद नहीं बनता. आजादी के आंदोलन में यह भाषा सबकी जुबान बन गई, सबकी जान बन गई. इसे कुचलने का प्रयास, दबाने की कोशिश भी साथ-साथ चलती रही, मगर वह कभी परवान न चढ़ी. वजह ये है कि किताब तो आप फाड़ सकते हैं, जला सकते हैं मगर भाषा को मार नहीं सकते. संज्ञा नाशवान है. कोई भी नाथूराम गोडसे उसे मार सकता है. मगर, सर्वनाम तब तक जिंदा रहता है जब तक विशेषण, समास और क्रिया जिंदा रहती हैं.

गांधी के लिए किन्हें लग रहा है डर?

लेकिन सच ये भी है कि भाषा बदलती रहती है, उसमें बदलाव होता रहता है. यही उसके विकास की और अस्तित्व में बने रहने की खुद की शर्त भी है. जिस व्याकरण को गांधी ने जन्म दिया, जिसे जीया और जो भारतीयों की जुबान में आचरण बनकर रमा हुआ है उसमें बदलाव से किन्हें डर लग रहा है? गांधी खुद बदलाव के वाहक रहे, वाहक बने. सौ साल बाद ये कैसे संवाहक आ गए, जिन्हें गांधी के लिए डर लग रहा है?

बनिया बोलिए या चतुर बनिया, गांधी का क्या बिगड़ना

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने चतुर बनिया गांधीजी की शान में बोला हो या अपमान में बोला हो, गांधी जी का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है. सवाल है कि उनके व्याकरण पर क्या इसका असर पड़ेगा? ऐसी छोटी बातों से जिस व्याकरण पर असर पड़ने लगे, उस व्याकरण की हम चर्चा ही क्यों करें? गांधीजी ने जो संवाद बढ़ाया है वह त्याग का है, संघर्ष और बलिदान का है. प्रगतिशील और परिवर्तनशील समाज की रचना का संवाद बना कर गए हैं बापू.

Mahatma Gandhi

न गांधी कांग्रेस के, न ही किसी के दुश्मन

कांग्रेस की ये भूल है कि वह बापू को अपनी पार्टी का समझती रही है. यही भूल वो भी करते हैं जो बापू से नाराजगी पालकर जी रहे हैं. अमित शाह अगर बापू को चतुर बनिया कहने के लिए माफी मांग लेते हैं तो इससे कांग्रेस खुश हो सकती है, अमित शाह के प्रशंसक दुखी हो सकते हैं लेकिन इससे बापू के व्याकरण पर कोई फर्क नहीं पड़ता. कहने का अर्थ ये है कि बापू के नाम पर राजनीतिक दल एक-दूसरे की छीछालेदर छोड़ अपनी फिक्र करें तो शायद ये बेहतर होगा.

मोतीलाल नेहरू ने भी कहा था गांधी को 'बनिया'

गांधी के जिस व्याकरण की हम चर्चा कर रहे हैं उसे ग्रंथ की शक्ल लेने में समय लगा. इस दौरान गांधी ने अपने जीवन में खुद के लिए कई बार बनिया सुना, कई बार खुद को बनिया कहा. गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपनी जेल डायरी में लिखा है कि तब गांधीजी से वरिष्ठ रहे मोतीलाल नेहरू उनसे खुश नहीं थे और उनके लिए बुरा-भला कहते हुए उन्हें बनिया तक कहा था.

डायरी में उन्होंने लिखा है- 'गांधीजी के उपवास पर आपने (मोतीलाल ने) फरमाया, ‘कीलदार एक तख्ता माघ मेले से खरीद कर के भी उनके बैठने के लिए भेज देना चाहिए. मोतीलालजी ने कल यह भी कहा था, ‘अंत में, गांधी बनिया ही तो ठहरे’.'

mahatma gandhi

महात्मा गांधी लंदन में

चर्चिल से 'अधनंगा फकीर' सुनकर भी प्रतिक्रियाविहीन रहे गांधी

आज कांग्रेस का नेतृत्व उन्हीं मोतीलाल नेहरू के वंशजों के हाथों में है. इसलिए वे नाहक इन चीजों में उलझ रहे हैं कि गांधी बनिया थे या चतुर बनिया. खुद गांधी ने भी अपने जीते जी इंग्लैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल के बयान को कोई तवज्जो नहीं दी थी जिसमें उन्हें अधनंगा फकीर बोला गया था. ‘द डेथ एंड आफटर लाईफ ऑफ महात्मा गांधी’ के मुताबिक महात्मा गांधी कहते हैं, मैं कहता हूं कि मैं खुद एक बनिया हूं और मैं सच्चा बनिया हूं. शायद आप छद्म बनिया नहीं बन सकते. सही इंसान वह है जो बुरों के लिए भी अच्छा करता है.ट

असल में मैं बनिया हूं जिसका असल लक्ष्य स्वराज है -गांधी

महात्मा गांधी ने सबके सामने कहा था कि आप भले ही मुझे विजनरी कहें, लेकिन मैं असल में बनिया हूं, जिसका असल लक्ष्य स्वराज है. 7 अगस्त, 1942 को महात्मा गांधी ने ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी में अपने भाषण में कहा, 'यहां पर बहुत सारे लोग हैं जो मुझे स्वप्नदर्शी बोल रहे हैं लेकिन मैं एक असली बनिया हूं जिसका व्यवसाय स्वराज स्थापित करना है'

'अंबेडकर को छोड़कर किसी को कुछ भी कह सकते हैं इस देश में' वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने बिल्कुल नई बात नए तरीके से कहने का साहस दिखाया है. उन्होंने ट्वीट कर कहा है कि इस देश में आप अंबेडकर को छोड़कर किसी भी व्यक्ति को चाहे कुछ भी कह सकते हैं. वे ट्वीट करते हैं 'मैंने कुछ सालों में यह महसूस किया है कि आप भारतीयों के पास्ट और प्रेजेंट के बारे में कुछ भी कह सकते हैं. जबतक कि वो अंबेडकर ना हों. सहमत?'

अंबेडकर का व्याकरण भी नई भाषा को दे रहा है आकार

राजदीप की टिप्पणी से बात बढ़ाएं तो अगर 20वीं सदी में गांधी ने नया व्याकरण गढ़ा और एक नई भाषा का विकास किया, तो 21वीं सदी में अंबेडकर का व्याकरण नई भाषा बनकर आकार लेता दिख रहा है.

अलग-अलग भाषाओं का एक साथ विकास होता आया है. भारत से बड़ा उदाहरण कौन होगा, जहां चंद किलोमीटर के बाद ही भाषा बदल जाती है. भाषाएं सहिष्णु होती हैं. सहिष्णु होकर ही वह जीवित रह पाती हैं. गांधी की भाषा सहिष्णु रही है और इसलिए आज तक जिंदा है और आगे भी इसी आधार पर विश्वास से कहा जा सकता है कि जिंदा रहेगी.

Mahatma Gandhi Statue

गांधी के प्रपोत्र में उनकी भाषा की मिलती है झलक

महात्मा गांधी के प्रपोत्र राज मोहन गांधी में इस भाषा की झलक मिलती है जो कहते हैं कि ब्रिटिश शेर और सांप्रदायिकता के जहर से लड़कर निखरने वाले व्यक्ति चतुर बनिया से कहीं ऊपर थे.

गांधी की नहीं, कोई और भाषा बोल रही है कांग्रेस

वहीं कांग्रेस गांधी की भाषा बोलती नजर नहीं आ रही है. कांग्रेस नेता अमित शाह की तुलना महात्मा गांधी से कर रहे हैं. इसी से उनकी सोच और भाषा की गहराई समझ में आ जाएगी. कांग्रेस नेता संजय झा कहते हैं- गांधी स्वतंत्रता आंदोलन में जेल गए और अमित शाह फर्जी एनकाउंटर केस में.

कांग्रेस को ये भी नहीं पता कि वो गांधी के विचारों का बचाव कैसे करे, उसे आगे कैसे बढ़ाएं? अमित शाह पर हमला करके या अमित शाह से माफी की मांग करके क्या कांग्रेस गांधी का भला कर रही है? कांग्रेस वही काम कर रही है जो अमित शाह कर रहे हैं. दोनों वर्तमान संदर्भ में गांधी का नाम, सर्वनाम, विशेषण सबकुछ भूलकर बस इस बहस में उलझे हैं कि वे बनिया थे या चतुर बनिया या कुछ और.

गांधी को जिंदा रखना है तो उनकी भाषा को जिंदा रखें

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