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2004 की गलती से सबक लेकर बीजेपी कर रही है 2019 की तैयारी

‘इंडिया शाइनिंग’ के नारे से आत्ममुग्ध सत्ताधारी एनडीए ने 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले अपने तीन वैसे महत्वपूर्ण सहयोगी दलों से नाता तोड़ लिया था

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Oct 06, 2017 09:24 AM IST

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2004 की गलती से सबक लेकर बीजेपी कर रही है 2019 की तैयारी

लगता है कि भाजपा ने साल 2004 की अपनी गलतियों से सबक लेकर अपने मौजूदा सहयोगी दलों की संख्या घटाने के बदले बढ़ाते जाने की ही रणनीति अपना ली हैं.

याद रहे कि ‘इंडिया शाइनिंग’ के नारे से आत्ममुग्ध सत्ताधारी एनडीए ने 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले अपने तीन वैसे महत्वपूर्ण सहयोगी दलों से नाता तोड़ लिया था, जिन्होंने सन 1999 में उसे दोबारा सत्ता में पहुंचाया था. हालांकि इस बात पर विवाद हो सकता है कि नाता किसने तोड़ा. हालांकि कुछ मामलों में जमीन तो भाजपा ने ही तैयार की थी. उन क्षेत्रीय दलों के वोट बैंक की ताकत को भाजपा ने तब नजरअंदाज कर देने की गलती कर दी थी.

नतीजतन, अटल सरकार सन 2004 में सत्ता से बाहर हो गई. उसे अनुमान जीत का था. इसीलिए समय से पहले चुनाव करा लिया. पर उसे सरजमीनी राजनीति का पता नहीं चल सका था. इसलिए हार हुई.

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दलों को साथ बनाए नहीं रख सकी थी एनडीए

दरअसल, पिछले अनुभव बताते हैं कि जो सत्ताधारी दल अपने अच्छे कामों के साथ-साथ अपने सहयोगी दलों को भी साथ बनाए रखता है, आम तौर पर उसी के दुबारा सत्ता में आने की संभावना रहती है. इसी उपाय से पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा ने लंबे समय तक राज किया था. सन 1999 और 2004 के बीच अटल सरकार ने कुल मिलाकर अच्छे काम किए थे. पर उसे कुछ सहयोगी दलों को अपने साथ बनाए नहीं रखने का खामियाजा भुगतना पड़ा.

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उप-प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी. (रॉयटर्स)

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उप-प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी. (रॉयटर्स)

2004 से पहले एनडीए से अलग हुए दल थे डीएमके, इंडियन नेशनल लोकदल और लोजपा. यानी करूणानिधि,ओम प्रकाश चौटाला और राम विलास पासवान. तमिलनाडु, हरियाणा और बिहार के इन तीनों दलों के अलग हो जाने के कारण एनडीए को लोकसभा की 55 सीटों का नुकसान हो गया.

इन तीनों राज्यों में एनडीए को 2004 के मुकाबले 1999 के चुनाव में लोकसभा की 55 सीटें अधिक मिली थीं. 2004 में एनडीए को कुल 185 सीटें मिली थीं. इन दलों का साथ रहता तो उसे 240 सीटें मिल जातीं. इतनी अधिक सीटों वाले गठबंधन को तुरंत कुछ छोटे दलों का समर्थन मिल जाता है.

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बिहार में राम विलास पासवान 1999 में जब एनडीए में थे तो एनडीए को लोस की 54 में से 41 सीटें मिलीं थीं.पर जब पासवान ने 2002 में एनडीए छोड़ दिया तो एनडीए को 2004 के चुनाव में कुल 40 में से सिर्फ 11 सीटें मिलीं. याद रहे कि इस बीच सन 2000 में बिहार का बंटवारा हो चुका था. ऐसा ही तमिल नाडु में हुआ. हरियाणा में तो चौटाला का साथ छोड़ देने के कारण एनडीए 2004 में एक सीट पर सिमट गया. 1999 में साथ रहने पर बीजेपी और चौटाला के दल को पांच -पांच सीटें मिली थीं.

नीतीश से गले मिलने की रणनीति

पिछली गलतियों से सबक लेते हुए इस साल एनडीए ने बिहार में नीतीश कुमार के दल को अंगीकार करने में कोई देर नहीं की, जबकि बिहार बीजेपी के कई प्रमुख नेता नीतीश कुमार के खिलाफ रहे हैं. वे चाहते थे कि राज्य में बीजेपी नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के बल पर अगला चुनाव अकेले लड़े और राज्य में अपनी सरकार बनाए पर केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी परवाह नहीं करते हुए परिपक्वता राजनीतिक दिखाई.

उधर बीजेपी इन दिनों तमिलनाडु की प्रमुख पार्टी एआईडीएमके से भी तालमेल के पक्ष में है. वह नया सहयोगी होगा. हालांकि उसमें अभी कुछ तकनीकी व राजनीतिक बाधाएं हैं. बीजेपी देश के कुछ अन्य दलों और कुछ दलों के नेताओं को भी एनडीए में शामिल करने या सहयोगी बनाने की ताक में है.

अटल बिहारी वाजपेयी ने करीब दो दर्जन दलों के साथ सरकार चलाई. उन्होंने भरसक लचीलापन दिखाया. पर तीन दलों को लेकर तब के एनडीए के मैनेजरों ने दूरदर्शिता और लचीलेपन से काम नहीं लिया.

तमिलनाडु का दांव फेल

हरियाणा में स्थानीय बीजेपी नेताओं और चौटाला के बीच कटुता और कुछ अन्य कारणों से तालमेल टूट गया. उन दिनों ओम प्रकाश चौटाला मुख्यमंत्री थे. करूणानिधि के नेतृत्व वाले डीएमके के साथ बीजेपी का गठबंधन चल ही रहा था कि जे. जयललिता की सरकार ने एक राजनीतिक दांव फेंक दिया. उन दिनों वह मुख्यमंत्री थीं उन्होंने 2002 में विधानसभा में धर्मांतरण विरोधी विधेयक पास करा दिया. इससे भाजपा को जयललिता में हिंदुत्व के तत्व नजर आने लगे थे.

बीजेपी ने डीएमके को छोड़कर जयललिता का दामन पकड़ लिया. नतीजतन 2004 में तमिलनाडु में डीएमके और कांग्रेस को कुल मिलाकर 26 सीटें मिल गईं, जबकि साथ रहने पर 1999 में बीजेपी को 4 और डीएमके को 12 सीटें मिली थीं. बीजेपी यह बात भी भूल गई थी कि तमिलनाडु में आमतौर पर सत्ताधारी दल अगला चुनाव हार जाता है.

अटल बिहारी वाजपेयी.

अटल बिहारी वाजपेयी.

बीजेपी ने तो राम विलास पासवान को एनडीए छोड़ने के लिए मजबूर ही कर दिया था. पासवान पहले रेल मंत्री थे. उनसे रेल मंत्रालय ले लिया गया. पासवान को उसके बदले संचार मंत्रालय मिला. पासवान को रेल मंत्रालय छूटने का गम तो था, पर संचार मंत्रालय से संतुष्ट थे. पर जब संचार भी छिन गया तो पासवान ने एनडीए छोड़ देने का निर्णय कर लिया. वह सिर्फ मौके की तलाश में थे.

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गुजरात में दंगा हो गया और पासवान ने उस बहाने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. दरअसल, बीजेपी के लिए कुछ खास कारणवश यह जरूरी हो गया था कि संचार मंत्रालय प्रमोद महाजन के पास रहे. पर इस एक कदम ने अटल सरकार की ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी. लगता है कि अमित शाह और बीजेपी नेतृत्व ऐसी गलतियों से इस बार बचने के सारे उपाय कर रहा है. दूध का जला छाछ फूंक कर पी रहा है.

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