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राष्ट्रपति चुनाव 2017: लालू यादव नवंबर 2015 की उस घटना को भूले नहीं हैं?

लालू की तरफ से रामनाथ कोविंद के नाम पर रजामंदी के आसार कम ही लग रहे हैं

Amitesh Amitesh | Published On: Jun 20, 2017 08:38 PM IST | Updated On: Jun 20, 2017 08:38 PM IST

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राष्ट्रपति चुनाव 2017: लालू यादव नवंबर 2015 की उस घटना को भूले नहीं हैं?

रामनाथ कोविंद के नाम को बीजेपी ने आगे कर एक साथ यूपी और बिहार के सियासी दिग्गजों को अपने साथ लाने की कोशिश की है. मायावती और नीतीश इस चाल में उलझते भी नजर आ रहे हैं. लेकिन, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) अध्यक्ष लालू यादव अभी भी कोविंद के नाम पर सहमति वाला नजरिया नहीं दिखा रहे हैं.

लालू रामनाथ कोविंद के नाम पर राजी हों भी तो कैसे. दस साल बाद 20 नवंबर, 2015 को बिहार में सत्ता में वापसी हो रही थी. लालू के दोनों 'लाल' शपथ ग्रहण कर रहे थे. उसी वक्त बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद ने लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप को बीच में ही टोक दिया.

राज्यपाल रामनाथ कोविंद ने मंच से तेजप्रताप को टोक दिया

दरअसल, हुआ यूं था कि तेजप्रताप ने अपने शपथ पत्र में गलत शब्द बोल दिया था. तेजप्रताप ने अपेक्षित के बदले उपेक्षित का उच्चारण कर दिया था. फिर, क्या था, शपथ ग्रहण कराने वाले बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद ने मंच पर ही तेजप्रताप को टोक दिया.

Lalu-Tej Pratap Yadav

लालू यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप ने मंत्री पद के शपथ ग्रहण के दौरान गलत शब्द का उच्चारण कर दिया था

राज्यपाल रामनाथ कोविंद ने शपथ लेने के तुरंत बाद तेजप्रताप को फिर से शपथ लेने को कहा था. लगता है लालू इस बात को अबतक भुला नहीं पाए हैं. लालू की तरफ से कोविंद के नाम पर रजामंदी के आसार कम ही लग रहे हैं.

आरजेडी प्रवक्ता मनोज झा के बयान से यह साफ हो भी जाता है. मनोज झा का कहना है कि बीजेपी संवैधानिक पदों पर नियुक्ति के संदर्भ में भी अहंकार के प्रदर्शन से बाज नहीं आ रही. आरजेडी इस बात का संकेत दे रही है कि कांग्रेस के साथ मिलकर संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार के साथ ही वह रहेगी.

बेटे का मजाक उड़ने से लालू हुए थे आगबबूला 

पहली बार विधायक बने अपने बड़े बेटे के दोबारा शपथ लेने के कारण सोशल मीडिया से लेकर हर जगह खूब मजाक उड़ा था. लालू इस बात को लेकर तब आगबबूला भी हो गए थे. बेटे के मजाक बनने के बाद लालू यादव ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण पर ही सवाल खड़े कर दिए थे.

लालू ने उस वक्त प्रधानमंत्री मोदी पर हमला बोलते हुए कहा था कि देश को तोड़ने का इनका एजेंडा है क्योंकि प्रधानमंत्री ने देश की प्रभुता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने की शपथ तो ली ही नहीं.

रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी का विरोध कर लालू यादव अपनी बीजेपी विरोधी छवि को बरकरार रखना चाहते हैं

रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी का विरोध कर लालू यादव अपनी बीजेपी विरोधी छवि को बनाए रखना चाहते हैं

लालू का आरोप था कि प्रधानमंत्री ने अक्षुण्ण के बदले अक्षण्ण शब्द बोला था,  इसलिए उन्हें फिर से शपथ लेनी चाहिए. लालू की नाराजगी इस बात का इशारा करने के लिए काफी है कि वह राज्यपाल रामनाथ कोविंद को किस कदर नापंसद करते हैं.

अब वही रामनाथ कोविंद एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं तो भला लालू से समर्थन की उम्मीद कैसे की जा सकती है.

दरअसल, लालू के साथ मजबूरी भी है. लालू यादव का इतिहास अब तक बीजेपी और संघ परिवार के धुर-विरोधी के तौर पर रहा है. हर तरह से वह संघ विरोधी मुहिम में खुद को सबसे बड़े नायक के तौर पर सामने लाना चाहते हैं. ऐसी सूरत में लालू के लिए संघ और बीजेपी की पृष्ठभूमि के रामनाथ कोविंद का विरोध करने के सिवा कोई और चारा भी नहीं दिख रहा.

बड़े मसलों पर सरकार के फैसलों के साथ खड़ा दिखता

इस मामले में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार काफी आगे हैं. मोदी विरोधी होने के बावजूद नीतीश ने अपनी छवि को एक ऐसे नेता के तौर पर उभारा है जो बड़े मसलों पर सरकार के फैसलों के साथ खड़ा दिखता है.

Nitish Kumar

नीतीश कुमार के नरेंद्र मोदी से अपने मतभेद हैं लेकिन जनहित के मुद्दे पर वो सरकार को समर्थन करते दिखते हैं

रामनाथ कोविंद की तारीफ के जरिए नीतीश की कोशिश एक संदेश देने की है. अगर वह रामनाथ कोविंद का समर्थन भी कर देते हैं तो उनके व्यक्तित्व के खिलाफ नहीं बल्कि वह बात उनके व्यक्तित्व के मुताबिक ही होगा. लेकिन, यही बात लालू यादव के साथ लागू नहीं होती है.

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