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लालू की ताजा परेशानियां चारा घोटाले से सबक न लेने का नतीजा हैं

यह बिहार के पिछड़ों और दबे कुचले लोगों के लिए निराशा की ही घड़ी है

Surendra Kishore Surendra Kishore | Published On: May 16, 2017 02:05 PM IST | Updated On: May 16, 2017 02:05 PM IST

लालू की ताजा परेशानियां चारा घोटाले से सबक न लेने का नतीजा हैं

पिछड़ा बहुल गरीब प्रदेश बिहार का यह दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि इस प्रदेश में सामाजिक न्याय के सबसे बड़े नेता लालू प्रसाद का ऐसा हश्र हो. यदि बड़ी आबादी वाले पिछड़ों का भला नहीं होगा तो बिहार का भला कैसे होगा? चारा घोटाले में निचली अदालत लालू प्रसाद को पहले ही सजा दे चुकी है. अब आयकर के छापे चल रहे हैं.

चारा घोटाले में जेल जाने के बाद लालू का जनसमर्थन घटा था. ताजा कार्रवाई के बाद क्या होगा, यह देखना दिलचस्प होगा.

बिहार के पिछड़ों ने लालू को कभी भारी बहुमत देकर जिताया था ताकि वे गरीबों की सेवा कर सके. ऐसा लगता है कि मसीहा अपनी राह से भटक गया.

चारा घोटाले के आरोप में 1997 में लालू प्रसाद जब अदालत में आत्मसमर्पण करने जा रहे थे तो उनके नन्हे पुत्र ने कातर स्वर में कहा था कि ‘पापा जल्दी आ जाना.’

भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने पिछले दिनों कहा कि अपनी धन लोलुपता के कारण लालू प्रसाद ने अपने पुत्रों को भी फंसा दिया है. मौजूदा छापेमारी का अंततः क्या हश्र होता है,यह तो आने वाला समय ही बताएगा.

एक बात पक्की है कि लालू परिवार ने चारा घोटाले के नतीजों से भी कुछ नहीं सीखा है. नतीजा सामने है.

पिछड़ों-गरीबों के लिए निराशा का समय

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इससे लालू परिवार का जो भी हश्र हो, पर बिहार के उन गरीबों और पिछड़ों को जरूर निराशा हुई है जिन्हें 1990 में खुद लालू प्रसाद ने सीना तान कर चलना सिखाया था. यह और बात है कि लालू-राबड़ी ने अपने 15 साल के शासनकाल में उन तने सीने के नीचे के पेट में अन्न नहीं डाला. हां कुछ थोड़े से लोग जरूर संपन्न हुए.

इतना ही नहीं, उनमें से कुछ लोगों को कानून हाथ में लेने की पूरी छूट थी.

नतीजतन पटना हाईकोर्ट ने जंगलराज कहा था. बाद में नीतीश सरकार ने बहुत शोर किए बिना उन गरीबों के पेट में भी थोड़ा अन्न डालने का काम जरूर किया.

आयकर के ताजा छापों के बाद बिहार में अब बहुत कुछ अनिश्चित हो गया है. याद रहे कि आरजेजी-कांग्रेस की मदद से नीतीश सरकार चल रही है.

फिर घटेगी लालू की ताकत

30 जुलाई 1997 को चारा घोटाले के आरोपी के रूप में लालू प्रसाद पहली बार जेल गये थे. जेल जाने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने कहा था, ‘यह दरअसल कुछ निहित स्वार्थी, सांप्रदायिक और गरीब विरोधी ताकतों की राजनीतिक साजिश का ही परिणाम है. इसलिए बिहार की गरीब जनता के बीच असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है.’

पर राबड़ी देवी का अनुमान सही नहीं निकला.

साल 2000 में हुए बिहार विधानसभा के चुनाव में लालू प्रसाद के दल आरजेडी को बहुमत नहीं मिला. कांग्रेस की मदद से ही राबड़ी देवी की सरकार 2000 में बन सकी थी. याद रहे कि सामाजिक न्याय के मसीहा के रूप में चर्चित लालू प्रसाद के दल को 1995 के विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल किया था. यानी जितने लोगों ने 1995 में लालू को मसीहा माना था, उनकी संख्या 2000 आते आते कम हो गयी. बाद में भी घटती-बढ़ती रही.

आयकर महकमे की ताजा छापेमारी के बाद आरजेडी नेताओं ने एक बार फिर उसी तरह का बयान दिया है जैसा बयान 1997 में राबड़ी देवी ने दिया था. दरअसल लालू प्रसाद और राजद की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे येन केन प्रकारेण धन संग्रह को बुरा नहीं मानते.

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उन में से कुछ लोग यह तर्क भी देते हैं कि आजादी के तत्काल बाद जब सवर्ण सत्ताधारी लोग धनोपार्जन कर रहे थे तो आप मीडियावाले कहां थे ?

इस क्रम में वे यह नहीं समझ पाते कि जब सत्ताधारी नेता धनोपार्जन करने लगते हैं तो उससे अफसरों तथा राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं को भी ऐसा ही करने की अघोषित छूट मिल जाती है.

फिर तो सरकारी साधन गरीब और पिछड़ी जनता तक कम ही पहुंच पाते हैं.

दरअसल सरकारी साधनों की सवर्णों की अपेक्षा पिछड़ों को अधिक जरूरत रहती है. सवर्णों के पास तो पहले से ही अपेक्षाकृत अधिक साधन रहे हैं.

पिछड़ों के नाम पर आए लालू बदल कैसे गए

साल 1990 में लालू प्रसाद ने उन्हीं पिछड़ों के हक के लिए आरक्षण विरोधियों से कठिन लड़ाई लड़ी थी और गरीबों के मसीहा बने थे. अनुसूचित जातियों और अल्पसंख्यकों की बात को छोड़ भी दें तो सरकारी धन की कमी के कारण जब 52 प्रतिशत पिछड़ों का विकास नहीं होगा तो पूरे बिहार का विकास कैसे होगा?

आरक्षण की लड़ाई जीत जाने के बाद मैंने 1992 में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद से यह सवाल किया था कि कर्पूरी ठाकुर और आपके सामाजिक न्याय में क्या फर्क है ? उन्होंने कहा था कि ‘कर्पूरी ठाकुर ने जो शुरू किया था, उसे हमने यहां तक पहुंचाया है. इसे और आगे ले जाना है. यह विचार डॉ राम मनोहर लोहिया, अंबेडकर, फुले, संत रविदास, नानक, गुरू गोविंद सिंह, सूफी संतों के हैं. इन लोगों ने पाखंडियों के खिलाफ सामाजिक न्याय की लड़ाई का बिगुल फूंका. यह लड़ाई जारी है.’

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हालांकि बाद की घटनाएं बताती हैं कि लालू प्रसाद ने इन वायदों को भुला दिया और वह दूसरे ही काम में लग गए जिसकी तार्किक परिणति चारा घोटाले में निचली अदालत से उनकी सजा और आयकर महकमे की ताजा छापेमारियां हैं. इन सबके बीच लालू प्रसाद का सामाजिक न्याय व्यापक से घटकर कुछ लोगों में सिमट गया. अब देखना है कि लालू परिवार की आगे की राह कैसी होगी!

वैसे बिहार के उन पिछड़ों और दबे कुचले लोगों के लिए निराशा की ही घड़ी है जो अब भी उन्हें मसीहा मानते हैं.

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