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लालू सीबीआई छापे से परेशान हो सकते हैं लेकिन टूटेंगे नहीं

जब लालू को लगता है कि उनके पास खोने के लिए बहुत कम और पाने के लिए बहुत ज्यादा है तो वे राजनीतिक दबंग बन जाते हैं

Ambikanand Sahay | Published On: Jul 09, 2017 12:11 PM IST | Updated On: Jul 09, 2017 12:11 PM IST

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लालू सीबीआई छापे से परेशान हो सकते हैं लेकिन टूटेंगे नहीं

अमेरिकी धर्म प्रचारक हाल लिंडसे ने कहा था, ‘आदमी भोजन के बिना करीब 40 दिन, पानी के बिना तीन दिन, हवा के बिना आठ मिनट रह सकता है ...लेकिन उम्मीद के बिना सिर्फ एक सेकंड ही जिंदा रह सकता है.’

आप लिंडसे की टिप्पणी को प्रामाणिक मानें या खारिज करें, या इसके ताजे परीक्षण की मांग करें, पर आप निश्चित ही इस बात से सहमत होंगे कि उम्मीद हमें प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जिंदा रहने की ताकत देती है. यह हमें जिंदा रहने के लिए लड़ने, सपने देखने और अपनी योजनाओं को ज्यादा आक्रामक तरीके से क्रियान्वित करने के लिए उकसाती है.

लड़ाकू और आशावादी लालू 

ऐसे में आप अनुमान लगा सकते हैं कि सरकारी एजेंसियों और राजनीतिक विरोधियों के हमले के बावजूद लालू यादव ने पूरी ताकत से लड़ने का फैसला क्यों किया. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि लालू ने उम्मीद नहीं छोड़ी है. लालू हार न मानने वाले शख्स हैं. वे बेहद लड़ाकू और आशावादी जीवन के अभ्यस्त हैं.

जब उन्हें लगता है कि उनके पास खोने के लिए बहुत कम और पाने के लिए बहुत ज्यादा है तो वे राजनीतिक दबंग बन जाते हैं. वे खुद पर लगे भ्रष्टाचार के ढेरों आरोपों से चिंतत नहीं हैं. उन्हें इस ‘तथ्य’ से ताकत मिलती है कि राजनीति में भ्रष्टाचार मायने नहीं रखती- बिहार में तो बिल्कुल भी नहीं.

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लालू विपरीत परिस्थितियों में पूरी ताकत के साथ लड़ना पसंद करते हैं. याद रखना चाहिए कि वे ‘बिल्ली के नौ जीवन’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं. अतीत में उन पर भ्रष्टाचार के अनगिनत आरोप लगे. वे कई बार जेल गए. उन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया गया. फिर भी उनका मनोबल कमजोर नहीं हुआ.

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तस्वीर: लालू प्रसाद यादव के फेसबुक वाल से

24x7 राजनेता 

दरअसल, वे एक 24x7 राजनेता हैं, जो बुरे हालात में भी अपने विरोधियों पर जवाबी हमले का मजा लेते हैं. वे बगैर राजनीति के जिंदा नहीं रह सकते. ऐसे में कोई आश्चर्य की बात नहीं कि अपने निवास और अन्य संपत्तियों पर सीबीआई के छापे के 12 घंटे के भीतर इस अविश्वसनीय और दुस्साहसी नेता ने रांची से दहाड़ मारी. वे चारा घोटाले से जुड़े एक मामले में अदालती कार्यवाही में हिस्सा लेने रांची गए थे.

उन्होंने कहा, ‘सुनो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह... मुझे और मेरे परिवार के सदस्यों को निशाना बनाने की कोशिशों के खिलाफ मैं लड़ूंगा और आपको बिहार में हुए महागठबंधन के प्रयोग को बर्बाद नहीं करने दूंगा. मैं आप की दबाव बनाने की रणनीति के आगे झुकूंगा नहीं.’

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उन्होंने आग कहा, ‘देश भऱ के समान विचारधारा वाले दल 27 अगस्त को पटना में आपके नापाक इरादों का पर्दाफाश करने के लिए मिलेंगे. हम यह सुनिश्चित करेंगे कि आप इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिए जाएं. हम आप को विपक्षी दलों के खिलाफ गंदी चालें चलने की इजाजत नहीं देंगे. इस समय देश में आपातकाल जैसी स्थिति पैदा हो गई है.’

यह भड़ास अपनी जगह है, लेकिन पटना से ताजा खबर क्या है जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं? अगर आरजेडी कार्यालय से निकलने वाले संकेतों को गंभीरता से लिया जाए तो लालू के सिपाही अगस्त में होने वाली महारैली की तैयारी में जुटे हुए हैं.

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फोटो: पीटीआई

महागठबंधन के प्रयोग को राष्ट्रीय रूप देना चाहते हैं लालू 

इस रैली का मकसद महठबंधन के शानदार प्रयोग को बिहार से बाहर राष्ट्रीय स्तर पर ले जाना है. कौन जानता है कि विपक्ष के साथ एकजुटता दिखाने के लिए राहुल गांधी, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, एम. के. स्टालिन, अखिलेश यादव और मायावती जैसे नेता इस रैली में शामिल होने का फैसला करें.

लालू यादव आज समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और बीएसपी प्रमुख मायावती से पहले से ज्यादा करीब हैं. वे मानते हैं कि वे उनकी सोच को जानते हैं. शायद यही वजह है कि इस हफ्ते के शुरू में उन्होंने इस बारे में एक बयान दिया. उन्होंने कहा, ‘इस बात की प्रबल संभावना है कि अखिलेश और मायावती 2019 का लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ें. अगर ऐसा होता है तो बीजेपी सत्ता से बाहर हो जाएगी.’

आरजेडी के 21वें स्थापना दिवस समारोह में लालू के हाव-भाव देखने और विश्वास करने लायक थे. वे अपने बेहतरीन आक्रामक अंदाज में थे. शायद वे खुद को सीबीआई के छापे के लिए तैयार कर रहे थे. आखिर कौन जानता है? बहरहाल, लालू के भाषण ने उनके हताश समर्थकों में उम्मीद का संचार किया, जो कुछ समय से अपने राजनीतिक विरोधियों के निशाने पर थे. अब वे अपनी मांसपेशियां ठोक रहे हैं.

खैर, हम एक बार फिर से उसी बिंदु पर लौट आए हैं जहां से चले थे. यह चिरस्थायी सवाल जवाब की मांग करता है: क्या लालू को हमेशा के लिए खारिज करने का यह सही समय है? हम किसी नतीजे पर पहुंचें उससे पहले हमे गौर करना चाहिए कि बर्ट्रेंड रसेल ने अपने ‘अनपॉपुलर एसेज’ में क्या कहा था: ‘अत्यधिक उम्मीदें अत्यधिक विपत्ति में पैदा होती हैं.’

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