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आप का नया चुनाव चिन्ह 'ईवीएम' होना चाहिए

जिस तरीके से आप ईवीएम के पीछे पड़ी है, उसे देखकर यही विकल्प ठीक लगता है

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Apr 25, 2017 05:27 PM IST

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आप का नया चुनाव चिन्ह 'ईवीएम' होना चाहिए

पूर्ण राज्य का दर्जा मांगने के लिए केजरीवाल ने दिल्ली में रेफरेंडम की मांग की थी. अब उनके पुराने साथी योगेंद्र यादव ने एमसीडी के चुनाव को अरविंद केजरीवाल के लिए निजी रेफरेंडम बताया है. यहां तक कि ये भी कहा है कि आम आदमी पार्टी अगर एमसीडी चुनाव हारती है तो केजरीवाल को इस्तीफा भी दे देना चाहिए. योगेंद्र यादव आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में हैं.

केजरीवाल पर योगेंद्र के सवाल

yogendra

योगेंद्र यादव की दलील आम आदमी पार्टी के चुनावी प्रचार में लगे होर्डिंग पर सवाल उठा रही है. उनका कहना है कि एमसीडी में सिर्फ केजरीवाल के नाम पर वोट मांगे गए हैं.

जाहिर तौर पर केजरीवाल खुद उस चक्रव्यूह में घिर गए हैं जिस पर वो दूसरों को घेरने में जुटे रहते थे.

3 साल पहले की तारीखों में झांके में तो लोकसभा चुनाव में बनारस से उनका चुनाव लड़ना राजनीतिक महत्वाकांक्षा का चरम था. लोकसभा चुनाव देख कर उन्होंने दिल्ली की सरकार ही छोड़ दी थी जिस वजह से दिल्ली वालों पर दोबारा चुनाव का बोझ पड़ा.

उस दौरान उनके टारगेट पर दस साल से सत्ता में रही कांग्रेस की यूपीए सरकार नहीं थी. बल्कि बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ उन्होंने हमला बोला था. मोदी के गुजरात के विकास के दावों को झूठा साबित करने के लिये गुजरात दौरे पर निकल गए थे.

पूरे चुनाव प्रचार में वो एक सुर में कहते आए कि कहीं भी उन्हें मोदी लहर दिखाई नहीं दी. लेकिन लोकसभा के नतीजों की सुनामी ने उन्हें और उनकी पार्टी को वापस दिल्ली के किनारे पर ला पटका.

बनारस से लौटकर दिल्ली वालों से केजरीवाल ने मांगी थी माफी

Arvind Kejriwal

केजरीवाल ने दिल्ली आने के बाद राजनीति की नई पारी शुरू करने से पहले दिल्ली वालों से दिल से माफी मांगी और कहा कि दिल्ली कभी नहीं छोड़ेंगे. वादा किया – पांच साल केजरीवाल. जनता ने माफ किया और चुनाव फिर जिता दिया. लेकिन विधानसभा चुनाव आते ही पंजाब और गोवा की दौड़ लगा दी.

पंजाब में तो प्रचार में ये तक कह डाला कि अगर जीते तो सीएम केजरीवाल होंगे जिसे बाद में सुधारते हुए कहा कि केजरीवाल जैसे होंगे. लेकिन पंजाब की जनता ने केजरीवाल और केजरीवाल जैसे को नकार कर कांग्रेस के पुराने दिन लौटा दिए. सरसों के खेत पर केजरीवाल सियासत की मक्के की रोटी पका नहीं सके.

अब केजरीवाल के पास नया हथियार ईवीएम मशीन है. ऐसा लगता है कि ये हथियार इन्हें सियासत के महर्षि दधीचि से प्राप्त हुआ है. जिस वजह से आप के मंत्री सीधे उस संवैधानिक संस्था पर सवाल उठाने से गुरेज नहीं कर रहे हैं जिसे केजरीवाल धृतराष्ट्र बताते हैं.

दिल्ली सरकार में मंत्री गोपाल राय का एक्सपर्ट कमेंट है कि ‘ईवीएम की चली तो एमसीडी चुनाव में बीजेपी जीतेगी और आम आदमी की चली तो उनकी पार्टी.’ बौखलाहट की ये इंतेहाई केजरीवाल के हार से पहले की हताशा का सबसे बड़ा नमूना है.

दरअसल यूपी में मिली करारी हार से सदमे में डूबी बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने भी अपनी हार के लिए ईवीएम मशीन को ही बलि का बकरा बनाया था. उसके बाद अखिलेश यादव भी ईवीएम की गड़बड़ी पर संदेह जता कर अपनी हार की असली वजह को छिपा गए. लेकिन केजरीवाल इन लोगों से दो कदम आगे ही निकल गए. पंजाब और गोवा के चुनावों में ईवीएम पर हार की ठीकरा फोड़ने के बाद अब एमसीडी चुनाव के नतीजों से पहले ही उन्होंने ईवीएम की खराबी को लेकर ट्वीट वार छेड़ दिया है. उन्होंने धमकी दी है कि नतीजे पक्ष में नहीं हुए तो आंदोलन छेड़ा जाएगा.

सवाल ये है कि केजरीवाल किस अंधेरे में तीर चलाने का काम कर रहे हैं. राजौरी गार्डन के नतीजों के बाद भी क्या कुछ और सोचने समझने की जरूरत है?

अगर एमसीडी के चुनाव में आप की हार होती है तो उसकी जिम्मेदार वो खुद ही होगी. एमसीडी से जुड़ी जनता की परेशानियों को लेकर दिल्ली सरकार दो साल से लगातार पल्ला झाड़ने का काम करती आई है.

दिल्ली सरकार ने समस्या के निदान की बजाए एमसीडी और बीजेपी पर निशाना साधने का काम किया. जबकि यही वो खास मौके होते जहां वो दिल्ली की जनता को एमसीडी के जरिए नए सिरे से खुद से जोड़ सकती थी. लेकिन केजरीवाल ये सोचते रहे कि एमसीडी की खामियां ही बीजेपी के ताबूत में कील ठोंकने का काम करेंगी. चाहे सड़कों पर कूड़े के ढेर का मामला हो या फिर डेंगू-चिकनगुनिया के बढ़ते मामले रहें हो. लेकिन दिल्ली सरकार के मंत्री समस्याओं को बढ़ने देने की रणनीति पर जुटे रहे.

यहां तक कि उनकी चुनाव में वोट की मांग भी जनता के लिए चेतावनी से कम नहीं थी. केजरीवाल ने कहा कि ‘डेंगू और चिकनगुनिया से मुक्ति के लिए आप को वोट दें और अगर बीजेपी को देते हैं तो भुगतने को तैयार रहें.’

जनता किसी भी मुल्क की हो वो भुगतने की ताकत रखती आई है. इतिहास के पन्ने गवाही देते हैं कि भावनाओं के उबाल में बह कर जनता ने दिल्ली में कई निजाम और अंजाम देखे हैं. बार-बार उजड़ कर फिर से बसने वाली दिल्ली की तासीर ही कुछ ऐसी है कि ये हर बार नए सिरे से अपना इतिहास लिखती आई है. दिल्ली ने हर दौर के तख्त पलटते देखे हैं. राजौरी गार्डन के चुनावी नतीजों में उसी दिल्ली के फैसलों की आहट को सुना जा सकता है.

राजौरी गार्डन की हार को सिसोदिया ने बताया था लोगों का गुस्सा

मनीष, manish

खुद उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने राजौरी गार्डन की हार को दिल्ली वालों के गुस्से की वजह बताया. गुस्से की वजह से आम आदमी पार्टी की सरकार के कामकाज पर सवाल उठते हैं. ये केजरीवाल एंड टीम के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए कि आखिर कैसे ब्रांड केजरीवाल पर ब्रांड मोदी हावी होता चला गया, खासतौर से तब जबकि 67 सीटें जीतकर ये सत्ता में आए.

क्या दो साल के ही कामकाज में जनता इनके तमाम मुफ्त ऐलानों के बावजूद  उकता गई?  क्या यही वजह है कि राजौरी गार्डन जैसी सीट पर आम आदमी पार्टी की जमानत तक जब्त हो गई?

ऐसे में मनीष सिसोदिया का दावा कि ‘ दो साल के कामकाज के बूते एमसीडी चुनाव जीतेंगे’ सुनाई अच्छा लेकिन दिखाई कुछ और देता है.

अब जबकि एग्जिट पोल के नतीजे एमसीडी में बीजेपी की जोरदार वापसी की तरफ इशारा कर रहे हैं तो इन्हें बीजेपी के लिये रेफरेंडम से जोड़ने की जरूरत है. खुद केजरीवाल नोटबंदी को लेकर पीएम मोदी के खिलाफ कई बड़े आंदोलनों का ऐलान कर चुके थे और बड़े घोटालों का आरोप तक लगा चुके थे.

अब जबकि सब हाथ से धीरे-धीरे फिसल रहा है तो ईवीएम पर केजरीवाल की पकड़ मजबूत होती जा रही है. इस उम्मीद से कि शायद ईवीएम के जरिए ही उनकी घटती साख को थोड़ी सी संजीवनी मिल जाए. अगर ऐसा ही रहा तो बहुत मुमकिन है कि वो फिर अपनी पार्टी का नया चुनाव चिन्ह ईवीएम ही रख लें.

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