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JNU की जंग: दांव पर है लोकतंत्र और सेक्युलरिज्म के मूल्य

हकीकत यह है कि एबीवीपी ने जेएनयू में बड़े पैमाने पर सीटों में कटौती विरोध नहीं किया इससे यूनिवर्सिटी के कई केंद्र परोक्ष रूप से बंद हो गए

Geeta Kumari Updated On: Sep 07, 2017 06:48 PM IST

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JNU की जंग: दांव पर है लोकतंत्र और सेक्युलरिज्म के मूल्य

जेएनयू छात्र संघ के चुनाव नजदीक आ रहे हैं. लेफ्ट यूनिटी पैनल के अंग के तौर पर हमें ये चुनाव देश में हो रही घटनाओं से अलग नहीं दिखाई दे रहे. जिस जेएनयू को हमने खड़ा किया है वह खुद को कोई अलग-थलग टापू नहीं मानता.

जेएनयू चीजों को कनेक्ट करता है और बाकी दुनिया के साथ खाई को पाटता है. यह न्याय, समानता और सम्मान के आंदोलनों को आगे बढ़ाता है. सालों से जेएनयू सामाजिक न्याय, समावेश के लिए और शिक्षा पर केवल अमीरों का हक है इस तर्क के खिलाफ लड़ता रहा है. हमें हमेशा गर्व रहा है कि हमने सत्य की बात की है भले ही इसके लिए इसे बोलने में कितनी भी मुश्किल क्यों न आई हो.

भीड़ द्वारा दलितों और मुसलमानों की हत्याएं की जा रही हैं

8 सितंबर को जब छात्र वोट डालेंगे, तो हम उनसे गौरी लंकेश को याद करने के लिए कहेंगे जिनकी क्रूर तरीके से हत्या ठीक उनके घर के सामने कर दी गई. कुछ ताकतें उनके सख्त एंटी-आरएसएस, एंटी-बीजेपी रुख को झेल नहीं पा रही थीं. जेएनयू में हम एबीवीपी के गुंडों की पिटाई के बाद गायब कर दिए गए छात्र नजीब के मामले में लड़ रहे थे.

एबीवीपी के गुंडों को बीजेपी के नियुक्त किए गए वाइस चांसलर द्वारा खुला छोड़ दिया गया. इसके उलट नजीब मामले में न्याय की मांग कर रहे जेएनयूएसयू और अन्य छात्रों को सजा दी गई और निवर्तमान जेएनयूएसयू प्रेसिडेंट को निष्कासित कर दिया गया.

फासिज्म देश में सिर उठा रहा है. भीड़ द्वारा दलितों और मुसलमानों की हत्याएं की जा रही हैं. विरोध में उठने वाली हर आवाज को देशद्रोह कहा जा रहा है और दंडित किया जा रहा है. दक्षिणपंथी विचारधारा के लोग और उनके समर्थक लंकेश की हत्या का जश्न मना रहे हैं. सरकार बेशर्मी के साथ रोहिंग्याओं को पकड़ने और उन्हें वापस भेजने में लगी हुई है, हालांकि वह हिंदू शरणार्थियों को देश में रहने की इजाजत दे रही है. एबीवीपी-आरएसएस-बीजेपी अपना उदार चेहरा दिखाने के लिए अब किसी तरह के मास्क को भी पहनने की जरूरत नहीं समझते. चूंकि, जेएनयूएसयू चुनाव करीब आ रहे हैं, ऐसे में इन घृणित कृत्यों से हमें अपनी नजरें नहीं फेरनी चाहिए.

इस बार के जेएनयूएसयू इलेक्शन ऐसे वक्त पर हो रहे हैं जबकि एक स्वयंभू बाबा के समर्थकों को सरेआम तोड़फोड़ और आगजनी करने की छूट दी गई, जब सरकारी फंडिंग से चलने वाली रिसर्च और उच्च शिक्षा को खत्म करने की कोशिश की जा रही है, जब नौकरियां खत्म हो रही हैं और हेल्थकेयर के लचर पड़ चुके इंफ्रास्ट्रक्चर को बर्बाद होने के लिए छोड़ दिया गया है. बड़े कारोबारी सरकारी बैंकों का करोड़ों रुपए लेकर भाग जाते हैं, सरकारी अस्पतालों में बच्चे मर रहे हैं क्योंकि उन्हें फंडिंग नहीं मिल रही है. ऐसे वक्त में यह सरकार अपने हिंदी हिंदू हिंदुस्तान के मॉडल को लागू करने में लगी हुई है. सरकार एक सांप्रदायिक, जातिवादी, बहुसंख्यकवादी, पितृसत्तात्मक मॉडल को थोपना चाहती है.

jnuposter

एबीवीपी ने जेएनयू में बड़े पैमाने पर सीटों में कटौती विरोध नहीं किया

जेएनयू में एबीवीपी आरएसएस और बीजेपी की प्रतिनिधि के तौर पर खड़ी है. गुजरे दो सालों में एबीवीपी ने #शटडाउनजेएनयू का आह्वान किया. एबीवीपी ने कभी भी सीटों में कटौती, बड़े पैमाने पर नौकरियों में छंटनी, अर्थव्यवस्था को ध्वस्त किए जाने, पब्लिक हेल्थकेयर और एजूकेशन को खत्म किए जाने का विरोध नहीं किया.

हकीकत यह है कि एबीवीपी ने जेएनयू में बड़े पैमाने पर सीटों में कटौती विरोध नहीं किया इससे यूनिवर्सिटी के कई केंद्र परोक्ष रूप से बंद हो गए. बीजेपी के नियुक्त किए गए वाइस चांसलर की एबीवीपी इतनी विश्वासपात्र है कि उसने साइंस स्कूलों और संस्कृत सेंटर तक में सीटों की कटौती का विरोध नहीं किया जहां से उसके काउंसलर जीत कर आए थे. एबीवीपी से डूसू की पूर्व प्रेसिडेंट और बीजेपी एमएलए कैंडिडेट मोनिका अरोड़ा ने सीटों में कटौती पर जेएनयू के वीसी के लॉयर के तौर पर काम किया.

एबीवीपी के लीडर सौरभ शर्मा ने फरवरी 2017 में सीटों में कटौती के विरोध में चल रहे आंदोलन के चरम पर सीटों में कटौती को अपना समर्थन दिया. उन्होंने ट्वीट किया कि भारत कब का एक हिंदू राष्ट्र बन चुका होता अगर यहां जेएनयू जैसे कैंपस नहीं होते. एबीवीपी के नेशनल लीडर महेश भागवत ने लिखा, ‘जेएनयू में 83 फीसदी सीट कट अच्छा है क्योंकि अब जेएनयू स्टूडेंट्स पाकिस्तान में रिसर्च करने के लिए आजाद हैं.’ फरवरी 2016 में बीजेपी सांसद चंदन मित्रा ने एनडीटीवी पर एक ब्लॉग लिखा और जेएनयू को बंद करने की मांग की ताकि मुफ्तखोरों और विद्रोह करने वालों को पैदा करने वाली फैक्टरी से निजात पाई जा सके.

एबीवीपी आखिर क्यों चुनावों में खड़ी है और वोट मांग रही है? क्योंकि यह जेएनयूएसयू सीट का इस्तेमाल जेएनयू को नष्ट करने, उच्च शिक्षा को खत्म करने, देश को हिंदू राष्ट्र बनाने में करना चाहती है. हमें इसी चीज का विरोध करना है.

जिस जेएनयू के लिए हम लड़े- जो जेएनयू हमने हासिल किया- उस जेएनयू के लिए हमें खड़े होना पड़ेगा

लेफ्ट यूनिटी पैनल का कैंपस में सामाजिक, आर्थिक और लैंगिक न्याय को लेकर लड़ाई का लंबा इतिहास है. लोकतांत्रिक, सेक्युलर, सामाजिक-आर्थिक न्याय और समावेश को चुनौती देने वाली ताकतों के खिलाफ जंग का इसका एक बड़ा इतिहास है.

गुजरे सालों के दौरान हमने लगातार निजीकरण, फीस में बढ़ोतरी और कैंपस स्पेस के कमर्शियलाइजेशन का 1995 और 2009 में विरोध किया. हमने मेरिट-कम-मीन्स स्कॉलरशिप के लिए जंग की हमने सफाई कर्मचारियों, मेस स्टाफ और अन्य कर्मचारियों के अधिकारों और सम्मान के लिए लड़ाई लड़ी.

हम एक असामान्य दौर में जी रहे हैं

1970 के दशक से अब तक हमने महिलाओं और कमजोर तबकों से आने वाले छात्रों के लिए लड़ाई लड़ी ताकि ज्यादा से ज्यादा संख्या में इन्हें जेएनयू में एंट्री मिल सके. 2007-08 में हमने जेएनयू में मदरसा सर्टिफिकेट्स को मान्यता दिलाई. जेएनयू में लेफ्ट मूवमेंट के तहत 3 साल लंबी लड़ाई चली ताकि गड़बड़ कटऑफ क्राइटेरिया के चलते ओबीसी आरक्षण को नकारा न जा सके. हमने जेएनयू के एंट्रेंस एग्जाम में वाइवा को दिए जाने वाले ज्यादा वेटेज का विरोध किया. हालांकि, जेएनयू की एकेडेमिक काउंसिल वाइस के वेटेज को 20 फीसदी करने पर राजी हो गई, लेकिन वीसी ने सभी फैसलों का उल्लंघन करते हुए इसे बढ़ाकर 100 फीसदी कर दिया. जेएनयू के स्टूडेंट मूवमेंट ने जीएससीएएसएच गठित किया और एक Equal Opportunity Office खोला.

आने वाले सालों में हम जेएनयू में सीट कट का फैसला वापस लेने और हमारे डिप्राइवेशन प्वाइंट सिस्टम को वापस लाने की मांग करेंगे. हम वाइवा में 100 फीसदी वेटेज को वापस लेने की मांग करेंगे और रिजर्वेशन को बहाल रखने के लिए लड़ेंगे. नजीब को ढूंढने और नजीब के लिए न्याय हमारे एजेंडे में रहेगा. हम अपनी एकेडेमिक काउंसिल जैसी संस्थाओं की रक्षा करेंगे.

हम एक असामान्य दौर में जी रहे हैं. हम गरीबों, हाशिये पर मौजूद तबकों, दलितों, मुस्लिमों और आदिवासियों के खिलाफ बढ़ती नफरत और हिंसा के दौर से गुजर रहे हैं. हम एक असाधारण विरोध के बीच हैं. फरवरी 2016 के बाद जेएनयू में इसी तरह का एक विरोध शुरू हुआ, एबीवीपी-आरएसएस-बीजेपी को नकारने और इनके खिलाफ खड़े होने की संयुक्त मुहिम शुरू हुई. हम अपना विरोध जारी रखेंगे. यह जंग बड़ी है. दांव पर सेक्युलर, डेमोक्रेटिक जेएनयू, समाज और भारत का मूल आइडिया है. हमें यह जंग अपने लिए और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए लड़नी होगी.

(जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में आइसा की गीता कुमारी लेफ्ट यूनिटी की तरफ से अध्यक्ष पद की उम्मीदवार हैं)

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