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सारी बहसें खत्म, आज की वोटिंग से तय होगा जेएनयू का रंग

अपराजिता इस चुनाव में ऐसी उम्मीदवार है जो कोई भी बना खेल बिगाड़ सकती है

Jainendra Kumar, Ashima Kumari Updated On: Sep 08, 2017 11:15 AM IST

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सारी बहसें खत्म, आज की वोटिंग से तय होगा जेएनयू का रंग

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव को लेकर पिछले एक महीने से चली आ रही सरगर्मी शुक्रवार को अपने सबसे चरम रूप में दिखेगी. प्रेसिडेंसियल डिबेट के खत्म होते ही जेएनयू के छात्र अपना मन बना लेते हैं कि इस बार किसको वोट करना है.

दरअसल प्रेसिडेंसियल डिबेट जेएनयू में एक उत्सव है, एक मेला है. विचारों के टकराव का मेला, सीखने-समझने का मेला और अगर कोई इसके लिए तैयार नहीं है तो उसके लिए सिर्फ मेला जिसमें चारों तरफ मुंड ही मुंड है. कोई नारों पर नाच रहा है है तो कोई शंख बजाने में मगन है. मजमा ऐसा लगा कि गंगा ढाबा के मालिक ने हाथ जोड़ लिए. तीन बजते-बजते गंगा ढाबा वाले के पास देने के लिए सिर्फ टोकन बचा था जिसे लेकर भी लोग डिबेट सुन रहे थे.

क्या है जेएनयू का डिबेट कल्चर?

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत स्वतंत्र रूप से अपनी बात रखने और सवाल करने में है. जेएनयू का छात्रसंघ चुनाव इस बात का भरपूर मौका सभी उम्मीदवारों और मतदाता छात्रों को देता है. इसी का एक हिस्सा है प्रेसिडेंसियल डिबेट, जिसमें सभी प्रेसिडेंसियल उम्मीदवार अपनी अपनी बात रखते हैं और छात्र उनसे सवाल पूछ सकते हैं, उनका जवाब उन्हें देना होता है. साथ ही सभी उम्मीदवार भी एक-एक कर उम्मीदवारों से आमने-सामने सवाल करते हैं, और यह बात इस माहौल को सबसे ज़्यादा मजेदार बनाती है.

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हर साल की तरह इस साल भी मेस जल्दी बंद हो गया और लोग भाग कर झेलम लॉन में पहुंचे. वैसे तो डिबेट रात साढ़े दस बजे शुरू हुआ लेकिन गर्मी नौ बजे से ही बढ़ने लगी थी. चुनाव समिति से जुड़े छात्र अपनी पोजीशन ले चुके थे. मुख्य चुनाव अधिकारी भगत सिंह के नेतृत्व में डिबेट के संचालन की तैयारी चल रही थी.

अचानक कन्हैया लेफ्ट खेमे में ‘प्रकट’ हुए. बॉलीवुड में ऋषि कपूर और राजनीति में कन्हैया जब डपली हाथ में लेते हैं तो मीडिया टूट पड़ती है. कन्हैया जी आजादी सांग गा रहे हैं और पूरी मीडिया उनकी तरफ मुड़ गई है. उनकी पार्टी की उम्मीदवार अपराजिता राजा भी हल्की मुस्कराहट के साथ उनका साथ दे रही हैं.

चुनाव कमिटी की कॉल पर निर्दलीय उम्मीदवार फारुक़ आलम सबसे पहले मंच पर पहुंचे. उन्होंने नेताओं की पारंपरिक ड्रेस पहन रखी थी. बापसा के खेमे में निर्दोष बच्चों सा उत्साह है. शबाना जैसे ही मंच पर पहुंची सबने बहुत देर लगातार शोर मचा कर उनका हौसला बढ़ाया. शबाना सहित बापसा के अधिकतर लोग नीले कपड़ों में थे. यहां तक कि उनका रुमाल भी नीला था. भीड़ बढ़ती जा रही थी.

एंट्री कराने के लिए जेएनयू वालों के पास दोस्तों का फोन लगातार आ रहे थे. नेटवर्क की भारी दिक्कत के बीच अगर चुनाव समिति खोया-पाया की सूचना माइक से देती तो बहुत मजा आता लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

शबाना को मिला अटैक का पहला मौका

साढ़े दस बसे प्रेसिडेंशियल डिबेट शुरू हुआ. लॉटरी से सबसे पहले बापसा की शबाना अली को बोलने का मौका मिला. उन्होंने नार्थ ईस्ट से लेकर कश्मीर तक के तमाम संघर्ष को अपना समर्थन दिया. नजीब की अम्मी को याद किया और सभी पार्टी को इस मुद्दे पर घेरा.

भीड़ इतनी बढ़ गई थी कि लोग स्टेज के दोनों तरफ पेड़ों पर चढ़ गए थे. ओबीसी आरक्षण, ढाबा बंद करने का मामला उठाया और जेंडर जस्टिस के मुद्दे पर दोहरा स्टैंड रखने के लिए एबीवीपी को लपेटा. जनता की जोरदार ताली तब मिली जब उसने आइसा और एसएफआई को सोनू- मोनू और डीएसएफ को बिट्टू नाम दिया.

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अगला नंबर निधि त्रिपाठी का था. जैसे ही उन्होंने वंदेमातरम् कहा, एबीवीपी का खेमा वंदेमातरम् से गूंज उठा. 8 सितंबर को चुनाव होने हैं इसलिए निधि ने इस तिथि की याद दिलाते हुए कहा कि यह मंडल आयोग के गठन की तिथि है और लेफ्ट ने इसका विरोध किया था. इस बात पर लेफ्ट खेमे से विरोध शुरू हो गया लोग कमंडल की याद दिलाने लगे.

हल्ला इतना बढ़ गया कि निधि ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बता कर सबको चुप रहने पर मजबूर किया. खटमल, हेल्थ सेंटर, प्लेसमेंट सेल, मेट्रो फीडर बस, सैनेटरी नैपकिन का मुद्दा उठाया और इसे ठीक करने का वादा किया. जब उसने कहा की हेल्थ सेंटर की ये हालत है कि कोई बीमारी हो डॉक्टर पारासिटामोल ही देता है तो इस बात पर सब लोग खूब हंसे. उन्होंने जेएनयू के उम्रदराज छात्रों के लिए बुड्ढा शब्द इस्तेमाल किया. इस बात के लिए उनकी हूटिंग हो गई.

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उन्होंने सीट कट और सीट स्कैम कहके अपनी सरकार का बचाव करना चाहा और लेफ्ट को दोषी बताने का प्रयास किया लेकिन जनता के विरोध के आगे उनकी बात हल्की पड़ गई. अंत में उसने ये कहते हुए अंत किया कि एबीवीपी संघर्ष में नहीं संघर्ष को अंतिम लक्ष्य तक पहुंचाने में विश्वास करती है. लोगों ने नजीब-नजीब के नारे लगाए.

फारुक ने लूटा माहौल, अपराजिता ने दिया वैचारिक भाषण

एनएसयूआई की वृष्णिका सिंह की तबीयत ठीक नहीं थी और वो थोडा नर्वस भी थी. बार बार उनको खांसी आती रही और पानी पीना पड़ा. उन्होंने बहुत मासूमियत से पूछा कि बाहर आप कांग्रेस के साथ गठबंधन करती हो लेकिन यहां हमें क्यों अलग कर देती हो? एमसीएम बढवाने, डॉग बाईट की सुई उपलब्ध कराने का वादा किया. ओबीसी आरक्षण पर सवाल किया. अनमोल रतन पैदा करने पर आइसा को भी घेरा.

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निर्दलीय दिव्यांग उम्मीदवार फारुक़ आलम ने अपने भाषण से सबको खूब हंसाया. फ़िल्मी अंदाज में सवाल किए. केबीसी का अंदाज भी दिखाया. सब लोगों पर हमले किए. जो पार्टी ज्यादा हंसती अगला अटैक उसी पर करता. पहली बार किसी उम्मीदवार ने घनश्याम दास को याद किया. बीच में थोड़ा पानी पीने रुका. मेरे साथ वाले ने कहा पानी पी-पी कर सबको गरिया रहा है.

कन्हैया की पार्टी एआईएसएफ की उम्मीदवार अपराजिता राजा ने सबसे पहले फातिमा शेख और सावित्री बाई फुले को याद किया और कहा आज यहां जितनी भी लड़कियां पढ़ रहीं हैं उन्हीं की बदौलत यहां तक की मेरी एबीवीपी की साथी भी. मोदी जी से कहा हमारे पुराने दिन ही लौटा दो. अपराजिता को फारुक़ के ठीक बाद बोलना पड़ा. अपराजिता बहुत गंभीर तरीके से अपनी बात रख रही थी लेकिन जनता कुछ देर तक फारुख की बातों से निकल ही नहीं पाई.

अपराजिता में जेएनयू के पुराने नेताओं की झलक मिली. पहली बार किसी ने गौरी लंकेश को याद किया. जनता ने ताली बजा कर समर्थन दिया. उन्होंने मोदी जी से भी सवाल किया कि जो लोग औरत को ‘कुतिया’ कहते हैं आप उन्हें फॉलो कैसे कर सकते हैं? तब अंग्रजों भारत छोड़ो का नारा लगा था आज उन्होंने आरएसएस भारत छोड़ो का नारा दिया. उन्होंने कहा सरकार पब्लिक यूनिवर्सिटी को बर्बाद करके प्राइवेट यूनिवर्सिटी लाना चाहती है. तब लोग व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से निकल कर मोदी-मोदी का नारा लगायेंगे. इसके विरोध में एबीवीपी ने मोदी-मोदी का नारा भी लगाया.

ब्रेख्त की कविता पर गीता ने बटोरी ताली

लेफ्ट यूनिटी की उम्मीदवार गीता कुमारी का नंबर सबसे अंत में आया. लाल सलाम से उसने शुरुआत की. एबीवीपी ने हो हल्ला मचाया. गीता की तैयारी अच्छी थी. उन्होंने गोरखपुर, रोहित वेमुला, नजीब सारे मुद्दों को उठाया. उन्होंने ब्रेख्त की एक कविता पढ़कर खूब तली बटोरी. कहा- ये लोग यूनिवर्सिटी को आरएसएस की शाखा बनाना चाहते हैं. पहले लड़की को देवी बनाते हैं फिर माता और अंत में जला कर मार डालते हैं. लाल भगवा एक हैं वाले नारे पर उन्होंने बापसा की राजनीति पर भी सवाल खड़ा किया.

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बीच में बारिश होने लगी. डेढ़ बजे दूसरा सेशन शुरू हुआ जिसमें सभी उम्मीदवार एक दूसरे से प्रश्न पूछते हैं. बारिश की वजह से पंडाल अस्त व्यस्त हो गया लेकिन कार्यकर्ताओं के जोश में कोई कमी नजर नहीं आई. जैसे लोग ॐ जय जगदीश गाते हुए भक्ति भाव में झूमते हैं वैसे है सभी लोग अपनी पार्टी का नारा लगाते हुए झूम रहे थे.

दो नारों पर विशेष ध्यान जा रहा था. आइसा का नारा है आ गया है आइसा छा गया है आइसा

बापसा ने इसकी कॉपी कर ली

आ गया है बापसा छा गया है बापसा

दूसरा नारा है एबीवीपी का

एक बार दिल से परिषद् परिषद्

एबीवीपी ने कभी सोचा भी न होगा कि इस नारे का ये हाल होगा. सभी पार्टी इस नारे का मजाक बनाती है.

एक बार दिल से परिषद् हाय हाय एक बार गुस्से से परिषद् हाय हाय

सभी हुए बेबस फारुक के तीखे सवालों से

प्रश्नोत्तर का सत्र देर रात शुरू हुआ. एनएसयूआई लेफ्ट खेमे के पीछे बैठी हुई थी. ऐसा लग रहा था कि जैसे बारात में आए हों. एक दम शांत और संस्कारी टाइप फीलिंग दिए हुए.

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फारुख ने इस सत्र में भी सबसे तीखे और मजेदार सवाल किया और उन्हें बैकफुट पर ला दिया. बीच में एबीवीपी और बापसा आपस में भिड़ गए. सिक्यूरिटी बुलानी पड़ी.

वृष्णिका सिंह ने एक दिन पहले फीस भरने के मुद्दे पर सवाल पूछ कर बापसा उम्मीदवार को चौंका दिया. गीता ने निधि ने पूछा जब आपके नेता जेएनयू को बंद कर देना चाहते हैं तो आप क्यों चुनाव लड़ रही? निधि को बचाव करने में संघर्ष करना पड़ा. अपराजिता ने निधि का अभिवादन ‘वंदे व्यापम’ करते हुए किया. निधि ने भी लेफ्ट के उसके दोहरे रवैये पर सवाल दागे.

लेफ्ट और बापसा में सीधी लड़ाई

तीसरा सत्र जनता के सवालों का था. खूब बारिश हो रही थी. स्टेज वाटर प्रूफ था सो उम्मीदवार तो जवाब दे रहे थे लेकिन आधी जनता इधर उधर छिपी हुई थी. तीसरा सत्र सही से संचालित नहीं हो पाया.

आम चुनाव की तरह यहां भी सभी पार्टियों का ज़ोर एससी, एसटी, ओबीसी, मुस्लिम के वोट खींचने पर फोकस रहा. पार्टियों ने टिकट वितरण में सामजिक न्याय का पूरा ख्याल रखा है. यूनाइटेड लेफ्ट मजबूत स्थिति में दिख रही है. कैंपस की दो बड़ी शक्ति आज एक साथ है. लेफ्ट की सीधी लड़ाई बापसा से है.

एबीवीपी को इन दोनों की लड़ाई का फायदा मिल सकता है जिसकी संभावना हर साल की तरह कम है. फारुक का कद बढ़ा है लेकिन उसे वोट में बदल पाना मुश्किल है. अपराजिता इस चुनाव में ऐसी उम्मीदवार है जो कोई भी बना खेल बिगाड़ सकती है. आज वोटिंग हो रही है. इससे ज्यादा अब सिर्फ वोटिंग के बाद ही कहा जा सकता है.

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