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ब्लैक​मेलिंग के सामने फिर घुटने टेकता जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल

इस बार मनमोहन वैद्य और दत्तात्रेय होसबोले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल होंगे

Sandipan Sharma | Published On: Dec 21, 2016 08:23 AM IST | Updated On: Dec 21, 2016 11:04 AM IST

ब्लैक​मेलिंग के सामने फिर घुटने टेकता जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजकों ने अक्सर कायरों जैसा बर्ताव किया है. उन्होंने हमेशा ही मीडिया के दबाव और राजनैतिक ब्लैकमेल के आगे घुटने टेके हैं.

2009 की सर्दियों की एक हेडलाइन उनकी कायरता की मिसाल कही जा सकती है. जब एक हिंदी अखबार ने हेडलाइन लगाई, 'साहित्य के मंच पर शराब'. खुद को नैतिकता का पहरुआ कहने वाले मीडिया के एक तबके को मशहूर लेखक विक्रम सेठ के मंच पर वाइन पीते हुए सवालों के जवाब देने पर ऐतराज हुआ था.

एक बार लेखिका कृष्णा सोबती ने मुझसे पूछा था कि एक ऐसे लेखक का नाम बताओ जो दूध पीते हुए लिखता हो. सोबती के कहने का मतलब ये था कि साहित्य और शराब का गहरा नाता रहा है.

अगर भारत के तमाम शहरों में प्रेस क्लब में शराब परोसने पर रोक लग जाए, तो बहुत सी मीडिया कंपनियों को शराब के लिए तड़पते पत्रकारों के इलाज के लिए डॉक्टरों का इंतजाम करना पड़ जाएगा.

ऐसे में जब मीडिया नैतिकता का सवाल उठा रहा था तो जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजकों को ऐसे पत्रकारों को ठेंगा दिखाना चाहिए था. साथ ही लिटरेचर फेस्टिवल में शराब की मात्रा दोगुनी कर देनी चाहिए थी. उन्हें विक्रम सेठ का समर्थन करना चाहिए था.

मगर अफसोस की बात ये कि इस हेडलाइन के लगने के अगले दिन से लिटरेचर फेस्टिवल से शराब गायब हो गई. उसकी जगह बोतलबंद पानी ले ली. विक्रम सेठ भी मंच से विदा हो गए.

जब वो दो साल बाद फिर से लिटरेचर फेस्टिवल में आए तो उनके हाथ में सादे पानी का ग्लास था. तब सेठ ने कहा था, 'अब मैं सावधानी बरत रहा हूं. इस गिलास को देखकर कोई नहीं कह सकता कि ये जिन है या पानी'.

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कहने का मतलब ये कि जब जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजक, कुछ पत्रकारों से इतना डरते हैं तो वो प्रायोजकों, सरकार, बीजेपी और आरएसएस के दबाव का कैसे सामना कर सकेंगे?

इसीलिए इस साल के जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक भी अपनी भागीदारी का आगाज कर रहा है. इसी वजह से इस बार जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल से अवार्ड वापसी अभियान में शामिल रहे लेखक-साहित्यकार बाहर कर दिए गए हैं.

अंग्रेजी के अखबार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक इस बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य और सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल होंगे.

अखबार ने लिखा कि, 'अवार्ड वापसी अभियान के प्रमुख चेहरे और इनटॉलरेंस के विवाद के कई भागीदार मसलन, अशोक वाजपेयी, उदय प्रकाश, के सच्चिदानंदन इस बार जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में नहीं बुलाए गए हैं. जबकि ये लेखक हमेशा से इस फेस्टिवल का हिस्सा रहे थे'.

संघ के विचारकों को फेस्टिवल में आने वालों से बातचीत करने का पूरा हक है. इसकी वजह ये है कि कोई भी साहित्यिक मेला, अभिव्यक्ति की आजादी का जश्न होता है. लेकिन मनमोहन वैद्य और दत्तात्रेय होसबोले को ये गुमान नहीं होना चाहिए कि उन्हें जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल होने का मौका इसलिए मिला क्योंकि उनका साहित्य में बेशकीमती योगदान रहा है. या फिर उनकी रचनाएं अमेजन पर खूब बिक रही हैं.

सच तो ये है कि पूरा संघ परिवार ये दावा नहीं कर सकता कि उसने साहित्य की दुनिया में जवाहरलाल नेहरू के पासंग भर योगदान किया है. नेहरू की लिखी किताबें पूरी दुनिया में खूब चर्चित हुईं.

संघ के विचारकों को इस बार जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में उस भारतीय परंपरा के तहत बुलाया गया है, जिसमें सत्ता चलाने वालों को सलामी ठोकी जाने का चलन है. वो इसलिए बुलाये गए हैं क्योंकि वो सत्ताधारी दल के करीबी हैं.

वो होसबोले या वैद्य इसलिए नहीं बुलाए गए कि उन्होंने साहित्य में बहुत बड़ा योगदान दिया है. ऐसा होता तो आयोजक होसबोले और वैद्य को बुलाने के लिए दस साल तक इंतजार न करते.

तो मनमोहन वैद्य और दत्तात्रेय होसबोले को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में बुलाना, बादशाह सलामत के आगे कोर्निश बजाने जैसा है. फिर आयोजकों में सुभाष चंद्रा का ज़ी ग्रुप हो तो आयोजकों का दुम हिलाना और वाजिब लगने लगता है.

वैसे ये पहली बार नहीं है जब जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का एजेंडा राजनेताओं ने तय किया है. ऐसा पहले भी हो चुका है. पहले भी आयोजक कपिल सिब्बल, कपिल मिश्रा और शाजिया इल्मी जैसे लोगों को साहित्य पर प्रवचन देने के लिए बुला चुके हैं.

यहां तक कि स्थानीय नेता जैसे वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत भी जयुपर लिटरेचर फेस्टिवल के मंच पर आकर साहित्य पर अपना ज्ञान बघार चुके हैं. (मुझे एक वाकिया याद पड़ता है जब साहित्य की बहस में गाली-गलौज होने लगी थी तो अशोक गहलोत सदमे में आ गए थे)

दिक्कत किसी के शामिल होने से नहीं. दिक्कत तब होती है जब कोई अपनी राजनैतिक ताकत से विचाराधार की बहस का रुख मोड़ना चाहता है.

ये वाकई शर्मनाक है कि कुछ लेखकों-साहित्यकारों को इसलिए नहीं बुलाया गया क्योंकि वो बीजेपी की विचारधारा से मुखालफत रखते हैं. वो बीजेपी की इनटॉलरेंस की नीति का विरोध कर चुके हैं. उन्होंने सरकार के विरोध में अपने अवार्ड वापस किए थे.

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अब उन्हें साहित्य के मंच से बेदखल कर दिया गया है. इससे तो एक वक्त ऐसा आएगा जब हर आजाद आवाज को दबा दिया जाएगा. फिर अनुपम खेर जैसे हां-हुजूरी करने वाले लोग ही साहित्य की दशा-दिशा तय करेंगे.

लेकिन किसी को ये उम्मीद नहीं थी कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजक राजनैतिक दबाव में नहीं आएंगे. उनके अंदर इतनी हिम्मत नहीं. जब भी उन्हें झुकने के लिए कहा जाता है, वो लेखकों-साहित्यकारों पर पाबंदी लगा देते हैं.

कुछ साल पहले की ही बात है, जब उस वक्त की कांग्रेस की सरकार के दबाव में सलमान रुश्दी को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल से दूर रखा गया था. रुश्दी को वीडियो लिंक से लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल होना था. मगर आयोजकों ने उन्हें नहीं शामिल किया.

कहते हैं कि शराब पीने से कुछ वक्त के लिए लोगों की नसों में हौसला दौड़ने लगता है. कमजोर लोग भी ताकत महसूस करने लगते हैं. लेकिन, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजकों को हिम्मत देने के लिए शायद ये नुस्खा भी काम न आए.

विक्रम सेठ मेरी इस बात से जरूर इत्तेफाक रखेंगे.

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