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बिहार: राजनीति में खतरों के खिलाड़ी हैं नीतीश कुमार

नीतीश की कुल जमा राजनीतिक पूंजी है उनकी साफसुथरी छवि और वो इसके लिए किसी भी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं हैं

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Jul 12, 2017 12:11 PM IST

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बिहार: राजनीति में खतरों के खिलाड़ी हैं नीतीश कुमार

2014 में एनडीए से अलग होने के नीतीश कुमार के फैसले में बड़ा रिस्क था. राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक भूमिका तलाशने में नीतीश ने ये रिस्क लिया. बिहार में महादलित के नए फॉर्मूले के साथ सोशल इंजीनियरिंग करके वो एक नया प्रयोग कर रहे थे.

बिहार की दस करोड़ से ज्यादा की आबादी में 15 फीसदी हिस्सेदारी दलितों की है. दलित मुख्यतौर पर 22 जातियों में बंटे हैं. नीतीश ने इन जातियों में अत्यधिक पिछड़े 21 जातियों को लेकर महादलित का एक नया वोटबैंक तैयार किया था. अपने इस वोटबैंक के लिए उन्होंने काम भी किए थे. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने उनके फॉर्मूले को फेल कर दिया. 2009 में 20 सीटें लेकर आने वाली जेडीयू 2014 में सिर्फ 2 सीटों पर सिमट गई.

इस हार के बाद नीतीश कुमार के लिए नई राजनीतिक संभावनाएं तलाशनी जरूरी हो गई. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने एक और बड़ा रिस्क लिया. लालू विरोध की जिस राजनीति के बूते उन्होंने बिहार की सत्ता पाई थी बदली परिस्थितियों में उन्हीं के साथ दोस्ती कबूल करनी पड़ी.

आरजेडी से दोस्ती का रिस्क लेना इस बार कामयाब रहा. आरजेडी, जेडीयू और कांग्रेस के महागठबंधन को 178 सीटें मिली. आरजेडी (80 सीट) से कम सीटें (71 सीट) लाकर भी नीतीश कुमार मुख्यमंत्री और बिहार चुनाव के असली विजेता बने. लेकिन इस जीत के साथ भी एक अस्वाभाविक दोस्त को साथ लेकर शासन प्रशासन चलाने पर सवाल बना रहा.

Lalu Prasad Yadav Nitish Kumar (1)

दो साल में कई बार लालू-नीतीश की दोस्ती पर उठे सवाल 

2015 के बाद बिहार में घटी हर छोटी-बड़ी घटना को लेकर लालू-नीतीश की बेमेल दोस्ती पर सवाल उठे. फिर चाहे वो सीवान के पत्रकार का हत्याकांड हो या फिर जेल से आरजेडी के बाहुबलि नेता शहाबुद्दीन और लालू यादव के बीच फोन पर बातचीत का खुलासा. नीतीश हर बार कानून सम्मत उपाय निकालकर अपनी साफसुथरी छवि और लालू यादव से अपनी दोस्ती की मर्यादा निभाते रहे.

लेकिन हाल में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे लालू परिवार के साथ ने जिस तरह से उनकी बेदाग छवि को प्रभावित करना शुरू किया. इस बदली राजनीतिक परिस्थिति ने नीतीश को एक बार फिर से बड़ा रिस्क लेने पर मजबूर किया है.

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भ्रष्टाचार के आरोपों पर लालू परिवार को जनता के सामने सफाई देने की पेशकश करके नीतीश कुमार ने एक और बड़ा रिस्क लिया है. अपनी साफसुथरी छवि के साथ किसी भी तरह का समझौता न किए जाने का रिस्क. एक तरफ उन्हें नैतिकता के पैमाने पर ऊंचाई देता है तो दूसरी तरफ महागठबंधन टूटने की नौबत में फिर एक नई अप्रत्याशित संभावना टटोलने पर मजबूर भी करेगा.

सोमवार को विधायकदल की मीटिंग के बाद आरजेडी ने साफ कर दिया कि भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बाद भी डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव अपने पद से इस्तीफा नहीं देंगे. लालू यादव और उनकी पार्टी के रुख से साफ है कि वो किसी भी तरीके से झुकने को तैयार नहीं हैं.

इसके बाद मंगलवार को जेडीयू के विधायकदल मीटिंग हुई. बैठक से छनकर जो बातें निकलकर बाहर आई उसके मुताबिक नीतीश ही नहीं बल्की उनके करीबी जेडीयू नेता भी ये नहीं चाहते कि लालू परिवार के ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के थोड़े भी छींटे नीतीश कुमार के दामन पर लगे.

नीतीश कुमार अपनी छवि के साथ समझौता नहीं कर सकते

नीतीश की कुल जमा राजनीतिक पूंजी है उनकी साफसुथरी छवि और वो इसके लिए किसी भी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं हैं. प्रेस कॉन्फ्रेंस में जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने साफ कर दिया कि भ्रष्टाचार के आरोपों पर तेजस्वी यादव को खुद अपनी सफाई जनता के सामने रखनी होगी.

इसका एक ही अर्थ निकलता है कि या तो तेजस्वी यादव अपने ऊपर लगे आरोपों को दस्तावेजों और सबूतों की रोशनी में जनता और मीडिया के सामने खारिज करें, जो कि संभव नहीं दिखता. ऐसा नहीं होने की स्थिति में आरजेडी खुद तेजस्वी यादव को डिप्टी सीएम के पद से इस्तीफा देने को कहे.

जेडीयू की बैठक के बाद पार्टी प्रवक्ता संजय सिंह ने कहा कि सरकार रहे या न रहे लेकिन पार्टी अपने मूल्यों के साथ समझौता नहीं करेगी. इसका मतलब साफ है कि अगर आरजेडी तेजस्वी यादव की कुर्सी का बलिदान नहीं करती है तो जेडीयू महागठबंधन की सरकार की कुर्बानी तक देने को तैयार है.

lalu-nitish

ऊपरी तौर पर नीतीश कुमार के लिए ये विन-विन सिचुएशन सरीखा दिख रहा है. यानी अगर तेजस्वी यादव इस्तीफा देने पर राजी हो जाते हैं तो महागठबंधन की सरकार भी बच जाएगी और नीतीश कुमार बेदाग छवि पर कोई आंच भी न आ पाएगी और अगर इस मुद्दे पर महागठबंधन की सरकार कुर्बान हो जाती है तो बीजेपी की टेक लेकर नीतीश सरकार भी टिकाए रख सकते हैं और एक अस्भाविक दोस्ती से छुटकारा भी मिल जाएगा.

लेकिन ये इतना भी आसान नहीं है. बीजेपी के करीब जाने का नीतीश का फैसला उनके लिए उतना फायदेमंद नहीं रहने वाला है जितना बीजेपी के लिए.

नीतीश के लिए बीजेपी के साथ जाने का फैसला आसान नहीं

बीजेपी के प्रचंड लहर के दौर में नीतीश कुमार विपक्ष का ऐसा चेहरा हैं जिन्होंने सीधे मोदी से टक्कर लेकर उन्हें पटखनी देने में कामयाबी हासिल की है. इसी बूते वो 2019 में विपक्ष का चेहरा बनने की क्षमता रखते हैं. बीजेपी से हाथ मिलाने पर वो बिहार की सरकार तो बचा लेंगे लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका से उन्हें हाथ धोना पड़ेगा. यानी बीजेपी के साथ से नीतीश का विकास संभव नहीं दिखता.

नीतीश अगर बीजेपी के साथ जाते हैं तो ये राजनीतिक तौर पर उनकी हार होगी. 2014 के लोकसभा चुनाव में महादलित के फॉर्मूले के फेल हो जाने के बाद नीतीश कुमार ने महिलाओं के मुद्दों पर फोकस किया. बिहार में शराबबंदी का फैसला महिलाओं को लुभाने के मद्देनजर लिया गया. इस फैसले ने नीतीश कुमार के लिए महिलाओं के एक बड़े वोटबैंक को तौर पर तैयार किया है.

अगर नीतीश अब बीजेपी के साथ जाते हैं तो सीधे-सीधे उनके वोटबैंक में सेंध होगी. नीतीश का अपना कद कमजोर होगा. क्योंकि जिन लोगों ने मोदी के चेहरे को तिलांजलि देकर बिहार विधानसभा चुनावों में नीतीश को वोट किया था वो अगले चुनावों में बीजेपी और मोदी की ओर झुकेंगे. नीतीश कुमार के लिए ये अपना जनाधार खोने जैसा होगा.

मोदी को चुनावों में हराना नीतीश कुमार की अब तक सबसे बड़ी उपलब्धि है. अब बीजेपी के करीब जाकर वो इस उपलब्धि को एक झटके में खो देंगे. जितनी मुश्किल लालू यादव के सामने है नीतीश के सामने उससे कम नहीं है. बिहार की सियासत एक नए मोड़ पर है. लालू के साथ नीतीश की साख भी दांव पर लगी है.

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