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ईवीएम हैकिंग: कपिल मिश्रा को जवाब देने के बजाय मुद्दे को भटका रहे हैं केजरीवाल

मिश्रा और अन्य विरोधियों को चुप कराने के लिए उनके पास सबसे अच्छा विकल्प तो यही था कि वो आरोपों की एक निष्पक्ष जांच कराते

Sandipan Sharma | Published On: May 10, 2017 03:16 PM IST | Updated On: May 10, 2017 03:16 PM IST

ईवीएम हैकिंग: कपिल मिश्रा को जवाब देने के बजाय मुद्दे को भटका रहे हैं केजरीवाल

अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक जीवन को परिभाषित करते पलों में से एक पल साल 2014 की एक घटना है. इसमें नितिन गडकरी द्वारा दायर केजरीवाल के खिलाफ एक मानहानि मामले में पहले तो केजरीवाल ने जमानती बॉन्ड भरने के बजाय जेल जाने का निर्णय लिया था.

लेकिन जेल में 6 दिन बिताने के बाद उन्होंने जमानत के लिए आवेदन देकर विचारधारा के स्तर पर पलटी मार दी थी.

वह घटनाक्रम केजरीवाल के बारे में क्या संकेत देता है? कई लोगों के लिए यह एक ऐसे शख्स का सैद्धांतिक संकेत था जो उच्च आदर्शों पर चलने की बात करता है. सार्वजनिक रूप से उन आदर्शों के लिए लड़ने का वचन देता है लेकिन जैसे ही उसे ये अहसास होता है कि उन सिद्धांतों के साथ खड़े रहना महंगा साबित हो सकता है तो वह खुद को व्यवहारिकता की ओट में छुपा लेता है.

जब उन्होंने एक जमानती बॉन्ड भरने के बजाय जेल जाना पसंद किया था तो एक पल के लिए ऐसा लगा था कि केजरीवाल महात्मा गांधी या अन्ना हजारे बनना चाहते थे जिनकी गिरफ़्तारी ने लोकपाल आंदोलन के दौरान एक तूफान पैदा कर दिया था.

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असल में अन्ना हजारे अपनी उम्र के उस पड़ाव पर भी अपने ठोस विचारों को लेकर किसी भी नतीजे को भुगतने के लिए तैयार थे. लेकिन उन्होंने भी कुछ दिनों में ही एक मामूली समझौता करके अपने आदर्शों का आत्मसमर्पण कराते हुए अपने विरोध को खत्म करना पसंद किया था.

केजरीवाल भी अपने पूर्व कैबिनेट सहयोगी कपिल मिश्रा की तरफ से दी गयी चुनौती से निपटने के लिए उसी तरह की कमजोर कोशिश कर रहे हैं. जनता के बीच मिश्रा से टकराने के बजाय अपनी भ्रष्टाचार विरोधी छवि के साथ खड़े होकर केजरीवाल मिश्रा के साथ किसी भी तरह के टकराव से बचने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही कुछ अन्य विरोध के साथ छाया भी तलाश रहे हैं.

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केजरीवाल ने मिश्रा के आरोपों का जवाब देने के बजाय ईवीएम पर आरोप लगाना ज्यादा जरूरी समझा

मिश्रा के गुरू केजरीवाल

मंगलवार को मिश्रा ने अपने संरक्षक जिन्हें वो गुरू कहना पसंद करते थे उनपर घूस लेने और भाई-भतीजावाद करने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ सीबीआई में तीन शिकायतें दर्ज करायी. आम आदमी पार्टी के बर्खास्त मंत्री ने केजरीवाल के खिलाफ एक मुहरबंद लिफाफे में अपने आरोपों का सबूत भी पेश किया.

मिश्रा ने सीबीआई से मिलने के बाद दावा किया, 'मैंने तीन शिकायतें दर्ज करायी हैं. पहली शिकायत केजरीवाल के रिश्तेदार के 50 करोड़ रुपये के जमीन के सौदे के संबंध में है. दूसरी शिकायत केजरीवाल और सत्येंद्र जैन के बीच दो करोड़ रुपये के नकद लेन-देन के खिलाफ है और तीसरी शिकायत आम आदमी पार्टी के उन पांच नेताओं के खिलाफ है जिन्होंने विदेश यात्रा पर जनता के पैसों को चूना लगाया है.

अब केजरीवाल के खिलाफ मिश्रा का अचानक जहर उगलना चालबाजी और व्यक्तिगत बदले की ओर इशारा करता है. आरोप लगाया जा रहा है कि केजरीवाल मंत्रिमंडल से बर्खास्त किए जाने के बाद ही वो आरोपों का तूफान पैदा कर रहे हैं.

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ऐसा करते हुए दो ही स्थिति बन सकती है. पहला ये कि- उनके दावे के मुताबिक केजरीवाल के कथित भ्रष्टाचार मामले के वो प्रत्यक्षदर्शी हैं या फिर वो अनाप-शनाप बोलकर अपने 'गुरु' की छवि को चोट पहुंचाने की कोशिश करने वाले झूठे इंसान हैं.

लेकिन, इस मामले को लेकर केजरीवाल की हालत ज्यादा भयावह है. लगाए गए आरोपों का सामना करने के बजाय उसका खंडन करना और इस बात को सुनिश्चित करना कि उन पर लगाया गया इल्जाम कहीं नहीं टिकता.

केजरीवाल ने मिश्रा के आरोपों से ध्यान हटाने के लिए एक नये युद्ध शुरू करने वाले पारंपरिक दांवपेंच का सहारा लिया. उन्होंने दिल्ली विधानसभा का विशेष सत्र सिर्फ इसलिए बुलाया ताकि वो दिखा सकें कि ईवीएम को कैसे हैक किया जा सकता है.

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सत्येंद्र जैन पर आरोप है कि उन्होंने केजरीवाल के रिश्तेदार को करोड़ों का फायदा पहुंचाया

केजरीवाल की फैंटेसी

केजरीवाल वास्तव में किसी ऐसी फंतासी दुनिया में रह रहे हैं जहां वे इस हद तक सोच लेते हैं कि जब उनकी विश्वसनीयता ही शक के दायरे में है तो ऐसी स्थिती में भी लोग ईवीएम को लेकर उनके लगाए आरोप पर भरोसा कर लेंगे.

चुनाव आयोग के खिलाफ बघारी गयी उनका शेखी सच में एक मशहूर शेर की याद दिला गया, 'तू इधर-उधर की न बात कर, ये बता कि काफिला क्यूं लुटा, मुझे रहज़नों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है.' (इसका मतलब है आप इधर-उधर की बात मत कीजिए, हमें सिर्फ इतना  बता दीजिए कि आखिर कारवां लुटा कैसे? आपके नेतृत्व पर ये सवालिया निशान लगा है.)

केजरीवाल वास्तव में अगर ईवीएम को लेकर गंभीर हैं तो वह सिर्फ मतपत्रों और वीवीपीएटी के उपयोग के लिए एक प्रस्ताव पारित करने के मुकाबले बहुत कुछ कर सकते थे.

अपनी बात को साबित करने के लिए जैसा कि बहुतों ने ट्वीटर पर सुझाव दिया है कि वो बैलेट पेपर के जरिये फिर से चुनाव करवाने की सिफारिश कर सकते थे. लेकिन, जब वो ऐसा नहीं कर रहे हैं तो इसका मतलब यह है कि केजरीवाल अपनी छवि बचाने की लड़ाई की तुलना में राजनीतिक दांव-पेंच में ज्यादा लगे हुए हैं.

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आदर्श रूप से तो केजरीवाल को अपनी मूल विश्वसनीयता में से कुछ को फिर से स्थापित करने के लिए मिश्रा के आरोपों का इस्तेमाल करना चाहिए था. सीता की तरह वह अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए खुद को अग्नि-परीक्षा से गुजार सकते थे.

मिश्रा और अन्य विरोधियों को चुप कराने के लिए उनके पास सबसे अच्छा विकल्प तो यही था कि वो आरोपों की एक निष्पक्ष जांच कराते. अगर उनके पास हिम्मत और जीवटता है तो आरोपों की जांच के लिए हाईकोर्ट के किसी रिटायर्ड जज या किसी पैनल से अपने ऊपर लगे आरोपों की जांच करवा सकते थे.

अगर उन आरोपों से वो पाक साफ बाहर निकल आते तो केजरीवाल का खोया सम्मान और विश्वसनीयता वापस आ सकता था. लेकिन, अब जबकि उन्होंने अग्नि-परीक्षा के बजाय मुद्दे को भटकाने का रास्ता ही चुन लिया है तो केजरीवाल ने आग और ईंधन दोनों को समाप्त कर दिया है.

और ये स्थिति धीरे-धीरे उन्हें और उनकी पार्टी को निगल रही है.

 

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