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बेसिर-पैर के तर्कों से कैसे बनेगी विपक्षी एकता!

संघ के बारे में झूठ और अफवाह फैलाना विपक्षी पार्टियों की पहचान रही है जबकि इन पार्टियों को मतदाताओं ने चुनाव दर चुनाव खारिज किया है

Sandeep Mahapatra Updated On: Aug 27, 2017 08:53 PM IST

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बेसिर-पैर के तर्कों से कैसे बनेगी विपक्षी एकता!

आज के सियासी परिवेश में विपक्षी दल और समर्थक इस कदर हताशा के भंवर में फंसे हैं कि अपने पैर टिकाने रखने के लिए बेसिर-पैर का कोई भी तर्क तलाशने और कहने से बाज नहीं आ रहे.

इस बात के अनेक उदाहरण हैं और ऐसे ही उदाहरणों में से चंद रोज पहले देखने को मिला जब पत्रकार रह चुके आम आदमी पार्टी के एक नेता ने अपने बातों को पेश करने के लिए तर्कों को खूब तोड़-मोड़कर पेश किया. ध्यान रहे कि कुछ माह पहले राजस्थान के एक किसान ने सरेआम आत्महत्या की थी तो इस नेता ने जार-जार घड़ियाली आंसू बहाए थे.

इस नेता ने अपनी बात कहने के लिए तर्कों का जो त्रिभुज बनाया उसके एक सिरे पर यह था कि प्रधानमंत्री का नाम लो और उस नाम पर कीचड़ उछालो. दूसरे बिंदु पर था कि संघ के खिलाफ अफवाह फैलाओ और तर्क के त्रिभुज के तीसरे बिंदु पर ये था कि हिंदू-मुस्लिम एकता की बात कहो.

जनता ने किया है विपक्ष की अफवाहों को खारिज

अब यह बात एकदम ही अलग है कि जो लोग हिंदू-मुस्लिम एकता की बात कहते हैं उन्हें धर्म के नाम पर वोट मांगने से परहेज नहीं है जैसा कि विधानसभा की बवाना सीट पर हुए हाल के उप-चुनाव में दिखा जिसमें आम आदमी पार्टी के एक विधायक ने सरेआम पोस्टर लगवाए जिसमें मुस्लिम मतदाताओं से पार्टी को वोट डालने का निवेदन किया गया था!

संघ के बारे में झूठ और अफवाह फैलाना विपक्षी पार्टियों की पहचान रही है और कोई अचरज नहीं कि आम आदमी पार्टी ने भी यही रीत अपनाई है जबकि इन पार्टियों को मतदाताओं ने चुनाव दर चुनाव खारिज किया है. बहरहाल, इस सिलसिले की चौंकाऊ बात यह है कि लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार की तरफदारी में तर्क यों पेश किए जा रहे हैं मानों उनपर जांच चल रही तो इसमें उनका कोई दोष ही नहीं.

मजे की बात यह कि आम आदमी पार्टी के नेता ने सुझाया कि लालू यादव पर चल रही जांच भले ठीक हो लेकिन उनके परिवार के सदस्यों को जांच के घेरे में लेना ठीक नहीं. हद यह है कि जो पार्टी (आम आदमी पार्टी) भ्रष्टाचार-विरोध के जुमले उछालकर सत्ता में आई थी वह अब इस निचाई पर उतर आई है कि 'अच्छा भ्रष्टाचार' और 'बुरा भ्रष्टाचार' में भेद बताने लगी है.

फोटो. पीटीआई

एकता कायम करने का नजरिया सही नहीं

अगर विपक्षी दलों की एकता का आधार यही है कि अलां आदमी या पार्टी फलां आदमी या पार्टी की तुलना में कम भ्रष्ट है इसलिए जो कम भ्रष्ट है वही हमें स्वीकार है तो फिर विपक्षी दलों को आत्म-परीक्षण करना चाहिए कि आपस में एकता कायम करने का उनका यह नजरिया ठीक है या नहीं.

उन्हें दोष किसी दूसरे के मत्थे पर डालने की जगह पहले अपने दोष देखने चाहिए. आपातकाल के खिलाफ चले आंदोलन की दुहाई देने और उसको विपक्षी एकता की बुनियाद बनाने के लिए इस किस्म के तर्क देना हमारे लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है और ना ही एक चमकदार, बेदाग तथा जीवंत राजनीतिक-व्यवस्था के लिहाज से ही उसे अच्छा कहा जाएगा.

विपक्ष की एकता की पैरोकारी करने वाले ऐसे लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि भारत अब आगे बढ़ चुका है और ऐसी सोच अब किसी के गले नहीं उतरती. विपक्षी एकता के लिए पेश किए गए उपर के तर्क की गहराई से परीक्षा करें तो नजर आएगा कि इसमें दरअसल कहा यह जा रहा है कि सार्वजनिक धन को हथियाना खराब नहीं है और भारत जैसे महान देश के लोगों यह बात मान लेनी चाहिए.

गहरे विश्लेषण से नजर आएगा कि इसमें यह भी कहा जा रहा कि इस किस्म की सोच को हर किसी को मान लेना चाहिए भले ही देश रसातल में चला जाए. मतलब विपक्ष की एकता हर कीमत पर कायम होनी चाहिए, यहां तक की देश की कीमत पर भी!

विपक्ष की अतार्किक सोच

इस पूरे प्रसंग का भौंडापन एक और बात से भी उजागर होता है बल्कि यह कहना ज्यादा ठीक है कि प्रसंग का भौंडापन अपने सारे रग-रेशे के साथ उजागर होता है और ऐसा इसलिए होता है कि भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यानी 1857 के वाकये की नजीर दी जा रही है और उसकी तुलना आज के वक्त से की जा रही है.

विपक्षी दलों की एकता की पैरोकारी कर रहे लोगों के साथ यही दिक्कत है- वे चाहते हैं कि हम उनकी कही हुई किसी भी बात पर यकीन करें, हम मान लें कि हालात 1857 वाले हैं. भले ही ऐसा कहना-सोचना स्वार्थ और अतार्किक सोच की ऊपज हो.

बात यहीं खत्म नहीं होती. विपक्षी एकता की चल रही कहानी में नीतीश कुमार का नाम घसीटा जा रहा है. कहा जा रहा है कि विपक्षी एकता का चेहरा नीतीश कुमार थे लेकिन उन्होंने दगा किया इसलिए अब विकल्प ढूंढ़ना होगा और यह विकल्प हमें शरद यादव के रूप में मिल गया है.

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अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए फैलाया जा रहा है एकता का भ्रम

सोचिए कि यह बात उस व्यक्ति के मुंह से निकल रही है जिसकी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अभी हाल-हाल तक दुनिया की हर चीज को अपनी रहनुमाई में लेने के लिए तैयार दिख रहे थे जिसमें यह भी शामिल था कि वे प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी का विकल्प बनकर उभर सकते हैं सो उनके नाम पर पूरे विपक्ष को एकमत हो जाना चाहिए चाहे पसंद हो या ना हो क्योंकि वही (दिल्ली के मुख्यमंत्री) विपक्ष के नेता के रूप में स्वाभाविक विकल्प हो सकते हैं.

दरअसल विपक्षी एकता के इस पैरोकार और उसकी पार्टी की फांस भी इस नुक्ते में हैं. दोनों ने जान लिया है कि दिल्ली में जारी आम आदमी पार्टी के कुशासन के कारण अब उन्हें कोई भी गंभीरता से नहीं लेता इसलिए कोई ना कोई बहाना तो तलाशना पड़ेगा.

इस बहानेबाजी के तहत ही एक भ्रमपूर्ण विपक्षी एकता की बात की जा रही है ताकि आम आदमी पार्टी अपनी चमड़ी बचा ले और जरुरत के वक्त सारा दोष विपक्षी पार्टी के स्वघोषित नेता के ऊपर डालकर ऊंचे सिद्धांतों की बात करती हुई फिर से लोगों के सामने आ खड़ी हो.

किसी और की जगह अपने भले के लिए विपक्ष को इस मोर्चे से खुद ही सोचने की जरुरत है.

(लेखक आरएसएस के छात्र संगठन एवीबीपी की तरफ से जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष पद का चुनाव जीतने वाले अब तक के एकमात्र व्यक्ति हैं. वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में काउंसल हैं.) 

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