S M L

गौरी लंकेश हत्या : वैचारिक चश्मे से देखकर संघ-बीजेपी को दोष देना गलत

पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के तुरंत बाद मीडिया ने जिस तरह वैचारिक चश्मे से देखना शुरू किया, वह ठीक नहीं है

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Sep 08, 2017 02:29 PM IST

0
गौरी लंकेश हत्या : वैचारिक चश्मे से देखकर संघ-बीजेपी को दोष देना गलत

मंगलवार को बेंगलुरु में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई और जल्दी ही इस मुद्दे ने विचारधाराओं की लड़ाई का रूप ले लिया. जांच एजेंसियों ने अभी कायदे से मामले की तहकीकात शुरू भी नहीं की है लेकिन बुद्धिजीवी और मीडिया में जुबानी बंदूक दागी जा रही है, हत्या का दोष भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस को दिया जा रहा है.

इसे सोचकर मुझे फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की की क्लासिक रचना ‘अपराध और दंड’ के इस अंश की याद हो आई : 'बुढ़िया शायद कोई गलती थी लेकिन बुढ़िया कोई मुद्दा नहीं है! बुढ़िया तो बस एक बीमारी थी …. मैं लक्ष्मण रेखा लांघने की हड़बड़ी में था..मैंने जिसकी हत्या की वो कोई मनुष्य नहीं था, वह तो एक सिद्धांत था ! सो, मैंने सिद्धांत की हत्या की, लेकिन मैंने उल्लंघन नहीं किया, मैं इस तरफ ही रहा, मैं बस हत्या भर कर पाया, और जैसा कि हुआ, मैं तो इतना भर भी नहीं कर पाया.'

कथा-नायक रस्कोलनिकोव थके मन से इस टेक पर सोचे जा रहा है, उसने अल्योना इवानोवेना नाम की एक बुजुर्ग औरत का बेवजह कत्ल किया है और सोचने के सिलसिले में अपने इस अपराध को बौद्धिकता का जामा पहना रहा है. ऐसा नहीं कि उसके मन में कोई दोष-भावना बैठी है और इस कारण उसे चिंता खाए जा रही है. उसे घेरने वाली चिंता की वजह बस इतनी भर है कि रस्कोलनिकोव कत्ल का इस्तेमाल अपने फायदे में नहीं कर पा रहा है, अपने मन से दोष-भावना को नहीं निकाल पा रहा.

रस्कोलनिकोव ने अपने अपराध को जायज ठहराने के लिए बेकार दलीलें पेश की थीं लेकिन रस्कोलनिकोव के उलट गौरी लंकेश के हत्यारों को अपराध को बौद्धिकता के जामे में पेश करने का बना-बनाया बहाना मिल गया है. यह हुआ है मीडिया के एक हिस्से, राजनेताओं और बुद्धिजीवियों की दुनिया की विचारधारा के चश्मे से देखने की खास फितरत के कारण.

gauri lankesh

मैं गौरी को बतौर सहकर्मी जानता हूं. हमने 1999 में इनाडू टीवी के लिए काम किया था. गौरी के लिए वे कठिनाइयों के दिन थे. वह बैंगलोर(तब बेंगलुरु नाम नहीं था) से अभी दिल्ली आयी ही थी. उन्हें करगिल युद्ध के दौरान जंग के इलाके में सुमंथ के साथ भेजा गया. सुमंथ हमारे सबसे अच्छे टेक्निकल हेड में एक थे और कैमरामैन के रूप मे दोहरी भूमिका निभा रहे थे.

मैं अभी करगिल से लौटा ही था सो गौरी ने मुझसे वहां के हालात के बारे में जानकारी ली और ‘युद्धक्षेत्र’ की ओर रवाना हो गयीं. गौरी जब लौटीं तो मैं यह देखकर दंग रह गया कि उन्होंने एक पीस-टू-कैमरा (इसमें रिपोर्टर कैमरे को देखते हुए बोलता है) गरुर में तने बोफोर्स तोप के ऐन बगल में खड़े होकर किया है. इसके लिए बड़े हिम्मत, धीरज और बुद्धिमानी की जरुरत थी. ईटीवी ने करगिल युद्ध की जो कवरेज की उसमें गौरी के शॉटस् और पीस टू कमैरा को सबसे बेहतर माना गया.

गौरी के जज्बे और जिंदगी को विचारधारा के पैमाने से मापना एक भूल है. गौरी लंकेश किसी और शै का नाम है, ऐसी चीज जो विचारधारा से कहीं ज्यादा बड़ी है.

उनकी क्रूर हत्या को किसी बात से जायज नहीं ठहराया जा सकता. यह हत्या बिल्कुल पेशेवराना अंदाज में अंजाम दी गई. हत्यारों ने अपनी पहचान छुपाने के सारे इंतजाम किए थे. लेकिन हत्या के बाद जो कुछ हुआ वह भी कोई कम निंदनीय नहीं है—अपराध को तुरंत-फुरंत विचारधारा के जामे में लपेट दिया गया, किसी ने जांच के निष्कर्षों का इंतजार तक नहीं किया.

अटकलों का बाजार गरम है: क्या गौरी की हत्या इसलिए हुई कि वह व्यवस्था-विरोधी थीं? गौरी का रुझान हिंदुत्ववादियों के विरोध में था तो क्या वह दक्षिणपंथियों के उभार के कारण मारी गईं? उसने नक्सलियों के लिए परेशानी खड़ी की, कर्नाटक सरकार के साथ मिलकर उसने कुछ नक्सलियों को वापस मुख्यधारा में जोड़ा था, तो क्या गौरी की हत्या इस वजह से हुई? क्या यह विडंबना नहीं है कि हाथों-हाथ एक अपराध को बौद्धिकता के जामे में लपेट दिया जाता है जबकि इलाज की यह तरकीब खुद बीमारी से कहीं ज्यादा बुरी है?

siddharamaiah

चलिए, घड़ी भर को मान लेते हैं कि गौरी ने हिंदू दक्षिणपंथियों के खिलाफ रुख अपना रखा था. लेकिन कर्नाटक में सरकार किसकी है? यह बात बिल्कुल जानी हुई है कि गौरी के आमतौर पर कर्नाटक सरकार से और खासतौर पर मुख्यमंत्री सिद्धरमैया से अच्छे ताल्लुकात थे. क्या उन्होंने कभी अपने ऊपर हमले की आशंका जताते हुए कोई शिकायत दर्ज कराई?

ट्वीटबाजों और सोशलमीडिया के ट्रोल्स ने गौरी के खिलाफ जहर उगला लेकिन गौरी ने उसे तथाकथित दक्षिणपंथियों की बदजुबानी माना. एक व्यवस्था-विरोधी पत्रकार का अंतिम-संस्कार राजकीय सम्मान से किया जा रहा है, इस विडंबना पर आप क्या कहेंगे? क्या उसका व्यवस्था-विरोध चुनिंदा था कि इसकी व्यवस्था का तो विरोध करना है लेकिन उसकी व्यवस्था का विरोध नहीं करना है ?

ये सारे सवाल जाजय हो सकते हैं लेकिन इन सारे सवालात में एक कमी है. ये सारे सवाल सिर्फ अटकलबाजी हैं, इन्हें अर्धसत्य या अनुमान भर कहा जा सकता है, ठीक उसी तरह जैसे कि आरएसएस-बीजेपी के खिलाफ मीडिया और संघ-परिवार के वैचारिक विरोधियों के मुंह से चलने वाला निंदा-कर्म. दक्षिणपंथ के खिलाफ जारी यह हंगामा सिर्फ सियासी जुमलेबाजी है.

इस सियासी जुमलेबाजी के शोर में यह सच दब गया है कि सूबे की सरकार की भूमिका संदेह के घेरे में है. दुनिया के नक्शे पर बेंगलुरु की धाक सूचना-प्रौद्योगिकी की दुनिया में जौहर के कारण है लेकिन इसी बेंगलुरु में अपराधियों को खुली छूट मिली हुई है. बेंगलुरु में अपराधियों को खुली छूट देने के लिए सिद्धारमैया और उनके साथियों को शर्म से डूब मरना चाहिए.

निगरानी और हिफाजत के क्या इंतजाम किए गए हैं जिनकी बिनाह पर कहा जाए कि आगे बंगलुरु में ऐसे अपराध नहीं होंगे? ऐसे सवाल शायद ही कभी पूछे गए, हत्या के बाद मामले की पूरी सूई इसी एक बात पर अटक गई कि दक्षिणपंथ के उभार के दिन हैं और असहिष्णुता बढकर अपने चरम पर जा पहुंची है.

गौरी की हत्या कोई पहला मामला नहीं है जब किसी अपराध के बारे में फैसला विचारधारा के चश्मे पहनकर सुनाया जा रहा है. गौगुंडों ने नोएडा में 2014 में जब अखलाक की हत्या की तो फैसले विचारधारा के चश्मे पहनकर ही सुनाए जा रहे थे. हत्या की वह बड़ी घिनौनी घटना थी लेकिन उस घटना ने पोल खोली कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के राज में पुलिस और प्रशासन किस खस्ताहाली के शिकार हैं.

लेकिन जैसा इस मामले में हो रहा है, उस वक्त भी बुद्धिजीवियों का एक तबका जवाब किसी और से नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ही मांगने पर उतारू था. किसी ने रुककर यह पूछने की जहमत ना उठाई कि जहां अखलाक की हत्या हुई उसमें क्या अखिलेश ने इलाके के दारोगा तक को भी किसी तरह दंडित करने की कोशिश की या नहीं.

Kerala RSS Worker Murder

(फोटो: फेसबुक से साभार)

ठीक इसी तरह केरल में संघ-परिवार और सीपीएम के बीच सियासी मतभेद के कारण जो सिलसिलेवार हत्याएं हो रही हैं उन्हें विचारधारा के चश्मे से देखा जाए तो उसे भोलेपन की हद ही कहा जाएगा. क्या कोई कह सकता है कि वाम-राजनीति के चरमपंथी तेवर में अगर कोई हत्या होती है तो वह दक्षिणपंथी राजनीति के उन्माद में हुई हत्याओं से कहीं ज्यादा जायज है?

इसमें कोई शक नहीं कि बुद्धिजीवियों के एक तबके ने हत्या के एक घिनौने अपराध को विचाराधारा का चश्मा पहनाने की हड़बड़ी दिखाई और ठीक वही तर्क अपनाया जो अपराध और दंड के किरदार रस्कोलनिकोव ने अपनाया था.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi