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लालू यादव पर आए 'भूकंप' का झटका नीतीश कुमार महसूस करेंगे?

लालू यादव की दोबारा पटरी पर आती सियासत इस वक्त हिचकोले खाने लगी है

Amitesh Amitesh | Published On: May 08, 2017 02:44 PM IST | Updated On: May 08, 2017 02:44 PM IST

लालू यादव पर आए 'भूकंप' का झटका नीतीश कुमार महसूस करेंगे?

चारा घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव सदमे में होंगे. सदमा बड़ा इसलिए होगा क्योंकि लालू यादव के खिलाफ अब चारा घोटाले में आपराधिक साजिश का मुकदमा चलेगा. सीबीआई ने लालू के खिलाफ षड्यंत्र का आरोप हटाए जाने के खिलाफ याचिका दायर की थी जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है.

इसके अलावा झारखंड हाईकोर्ट के उस फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया है जिसमें चारा घोटाले से जुड़े मामलों की एक साथ सुनवाई की बात कही गई थी.

अब चारा घोटाले के अलग-अलग मामले में सुनवाई भी अलग-अलग होगी. यानी लालू की उम्मीदों को सुप्रीम झटका लगा है. लिहाजा परेशानी तो बढ़ेगी ही.

लालू के लिए परेशानी इसलिए भी बड़ी है क्योंकि उनके ऊपर इन दिनों एक के बाद एक कई वार हो रहे हैं. पहले से ही बीजेपी नेता सुशील मोदी ने लालू और उनके बेटों के उपर मिट्टी घोटाले से लेकर कई दूसरे मामलों में मोर्चा खोल रखा है.

गलत तरीके से संपत्ति अर्जित करने के मामले में पहले से ही लालू यादव, उनके बेटे-बेटी निशाने पर हैं. इन आरोपों की आंच से बिहार में सरकार पर भी कई बार सवाल खड़े होते रहे हैं. सवाल मुख्यमंत्री पर भी कई बार खड़ा होता है कि आखिरकार नीतीश कुमार इस मुद्दे पर लालू के खिलाफ कार्रवाई करने से क्यों कतराते हैं.

लेकिन, इस घोटाले के आरोपों को लेकर सियासी बवाल थमा भी नहीं था कि जेल में बंद आरजेडी के पूर्व सांसद और हत्या के मामले में सजायाफ्ता शहाबुद्दीन के साथ लालू यादव की बातचीत का ऑडियो टेप सामने आ गया. इस टेप से जगजाहिर हो गया कि अब तक लालू किस तरह से शहाबुद्दीन से निर्देश लेकर काम कर रहे हैं.

लेकिन, यहां भी सवाल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से ही पूछा जा रहा है कि आखिर ऐसे मामलों पर बिहार सरकार कब तक चुप्पी साधे रखेगी? क्या अपनी छवि के मुताबिक नीतीश कुमार आगे कोई कड़ा कदम उठाएंगे? क्या लालू और उनके परिवार के लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में कोई एक्शन होगा या फिर गठबंधन के दबाव और सरकार चलाने की मजबूरी के आगे नीतीश कुमार चुप्पी साधे रखेंगे?

अभी ये सारे सवाल पाटलिपुत्र से लेकर दिल्ली की सियासी फिजाओं में गूंज रहे हैं. लेकिन, चारा घोटाले के जिन्न के एक बार फिर से बाहर आने के बाद लालू मुश्किल में हैं.

Lalu and Nitesh

अब लालू की राजनीति का क्या होगा?

बिहार में महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव हर मुद्दे पर भारी दिखने की कोशिश में थे. बिहार में आरजेडी का दबदबा दिखाने की कोशिश होती रही. लेकिन, अब लगातार हो रहे खुलासे और लालू को मिलते झटकों के बाद लालू और उनकी पार्टी के नेताओं को अपने बड़बोलेपन से बाज आना होगा. ऐसा होगा भी क्योंकि लालू और उनका कुनबा ही फिलहाल  संकट में है.

लालू के साथ मिलकर महागठबंधन की सरकार चला रहे साफ-सुथरी छवि वाले नीतीश कुमार की मुश्किल भी यही है कि उनके सामने दूसरा विकल्प नहीं है. मोदी विरोधी राजनीति के केंद्र में अपने-आप को स्थापित करने की कोशिश में लगे नीतीश कुमार को अब शायद बिहार में सरकार की स्थिरता की चिंता थोड़ी कम होगी. हां इतना जरूर है कि लालू के साथ खड़े रहने के बावजूद अब तक अपने मिस्टर क्लीन की छवि को बरकरार रखने वाले नीतीश के लिए आगे ऐसा कर पाना मुश्किल होगा.

क्या लालू का हाथ छोड़ेंगे नीतीश?

फिलहाल लालू यादव की दोबारा पटरी पर आती सियासत इस वक्त हिचकोले खाने लगी है. खासतौर से तब जबकि नीतीश कुमार की तरफ से लालू  का हाथ छोड़ने को लेकर कयासबाजी बार-बार लगती हो.

LaluYadav

इस कयासबाजी को बल तब और मिल गया है जब बीजेपी विधानमंडल दल के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने नीतीश को समर्थन देने का एक शिगूफा छोड़ दिया.

सुशील मोदी की तरफ से लालू का साथ छोड़ने की सूरत में बीजेपी की तरफ से नीतीश के साथ खड़े होने का बयान जल्दबाजी में दिया गया बयान जरूर लगता है. लेकिन, इस बयान से बिहार की सियासत में आने वाले बदलाव की बयार की आहट सुनाई दे रही है.

अब आगे गेंद नीतीश के पाले में रहने वाला है. क्या नीतीश कुमार एक बार फिर से बीजेपी के साथ आकर बिहार में बदलाव को लेकर बड़ा अभियान चलाएंगे जिसकी परिकल्पना उन्होंने अपने पहले शासन काल में की थी. या फिर, दबाव में आए कमजोर सहयोगी लालू यादव को साथ लेकर चलेंगे.

दोनों ही हालात में नुकसान लालू को ही होने वाला है. दस साल के वनवास के बाद महागठबंधन के साथ दोबारा बिहार की सत्ता में आकर अपने वारिस को स्थापित करने की कोशिश में लगे लालू को देखकर लगता है कि बिहार में बदलाव तो बहुत हुआ है लेकिन, लालू में बदलाव बिल्कुल नहीं हुआ है. लालू ने शायद दोबारा सत्ता में आने के बाद भी अपने अंदर बदलाव की कोशिश बिल्कुल नहीं की है.

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