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चुनाव आयोग को क्यों न मिले अपनी इज्जत बचाने के लिए अवमानना की ताकत ?

चुनाव आयोग बुरी तरह से राजनीति का शिकार हुआ है

Subhesh Sharma Updated On: Jun 12, 2017 02:07 PM IST

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चुनाव आयोग को क्यों न मिले अपनी इज्जत बचाने के लिए अवमानना की ताकत ?

हमेशा से विपक्ष और केंद्र में बैठी सरकार के बीच तना-तनी बनी रहती है. ये बात काफी हद तक सही भी है कि अगर केंद्र में बैठी सरकार से अच्छा काम कराना है, तो इसके लिए विपक्ष का मजबूत होना बेहद अहम है. ऐसे में विपक्ष का सरकार पर आरोप लगाना काफी हद तक ठीक भी है. लेकिन आरोप प्रत्यारोप के दौर में चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को बीच में लाना और उसकी विश्वसनियता पर एक के बाद एक ढेरों वार करना सही नहीं है.

चुनाव आयोग को चाहिए कोर्ट जैसी शक्ति

चुनाव आयोग बुरी तरह से राजनीति का शिकार हुआ है और इसके चलते अब नौबत ये आन पड़ी है कि वो सरकार से उन शक्तियों की मांग कर रहा है, जोकि देश की अदालतों के पास होती है. चुनाव आयोग ने कानून मंत्रालय को एक पत्र लिखा है. जिसमें उसने कहा है कि जो लोग निराधार आरोप लगाकर उसकी (चुनाव आयोग) विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हैं, उसे उनके खिलाफ कार्रवाई करने की शक्ति दी जाए.

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राजनीतिक दलों द्वारा ईवीएम को लेकर लगाए गए सवाल पर चुनाव आयोग ने वीवीपैट चुनाव कराने का फैसला किया है

कोर्ट की अवमानना अधिनियम में की संशोधन की मांग

चुनाव आयोग ने कानून मंत्रालय से कहा है कि उसे अवमानना की कार्रवाई के अधिकार दिए जाएं, ताकि वो बेबुनियाद आरोप लगाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर सके. इंडियन एक्सप्रेस पर छपी खबर के मुताबिक, चुनाव आयोग ने कोर्ट की अवमानना अधिनियम 1971 में संशोधन की मांग की है. चुनाव आयोग ने करीब एक महीने पहले कानून मंत्रालय को ये पत्र लिखा था और कानून मंत्रालय अभी उस पर विचार विमर्श कर रहा है.

पाकिस्तान का उदाहरण दिया

पत्र में चुनाव आयोग ने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का भी जिक्र किया है. भारतीय चुनाव आयोग ने इलेक्शन कमिशन ऑफ पाकिस्तान का उदाहरण दिया है, जोकि हर एक उस व्यक्ति के खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी कर सकता है, जो कोई उसकी छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है. पाकिस्तान के मशहूर क्रिकेटर और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के नेता इमरान खान ने विदेशी फंड मामले को लेकर ईसीपी के खिलाफ पक्षपात का आरोप लगाया था, जिसे लेकर ईसीपी ने इमरान खान के खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी किया था.

मांग कितनी जायज है ?

मौजूदा हालातों को देखते हुए चुनाव आयोग की ये मांग जायज लगती है. उसे भी अपना बचाव करने के लिए सरकार की ओर से कोई न कोई हथियार दिया जाना चाहिए, ताकि कोई भी व्यक्ति इसकी छवि को खराब करने से पहले दो बार जरूर सोचे. चुनाव प्रकिया में शामिल होने वाले लाखों लोगों का भरोसा चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर टिका हुआ है.

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इन सभी वोटर्स को भरोसा है कि ये संस्था हमारा वोट को बिना किसी छेड़छाड़ के उसकी मंजिल तक पहुंचाएगी. ऐसे में विपक्षी दलों को चुनाव आयोग पर इस तरह के आरोप लगाने से पहले एक बार जरूर सोच लेना चाहिए, क्योंकि इससे एक आदमी के भरोसे को कहीं न कहीं ठेस पहुंचती है.

कहां से शुरू हुआ बवाल

आपको बता दें कि हाल ही में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और दिल्ली एमसीडी चुनाव में बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिला था. जिससे नाखुश विपक्ष में तिलमिलाहटल महसूस की जा सकती है औ वो बीजेपी की जीत का क्रेडिट चुनाव आयोग दे रहा है. चुनाव आयोग की विश्वनीयता पर सवाल उठाने वाले मुख्य विपक्षी दलों में आप, बसपा, सपा, कांग्रेस, सीपीएम, आरजेडी आदि शामिल हैं.

आप की मंशा हुई जगजाहिर

इन सभी पार्टियों में आम आदमी पार्टी ने चुनाव आयोग को सबसे अधिक टारगेट किया. आप ने दिल्ली विधानसभा में अपना खुद का ईवीएम टेस्ट कंडक्ट कराया और ये तक साबित कर दिया कि ईवीएम मशीन से छेड़छाड़ हो सकती है और हाल ही में हुए चुनावों में ऐसा हुआ है, जिस कारण बीजेपी को इतनी भारी जीत मिली है.

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हालांकि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाली आप और अन्य राजनीतिक दलों की मंशा भी उस वक्त जगजाहिर हो गई जब उन्होंने चुनाव आयोग के ईवीएम ओपन चैलेंज में भाग लेने से साफ मना कर दिया. आप के साथ-साथ कांग्रेस, सपा, बसपा व अन्य विपक्षी दलों ने भी इस ओपन चैलेंज में भाग लेने से इनकार कर दिया था. सीपीएम और एनसीपी के अलावा सब पीछे हट गए थे.

चुनाव आयोग का बच पाना मुश्किल था

देश में कई सौ बार चुनाव हुए और इनमें जीत दर्ज करने के लिए हर बार, हर एक राजनीतिक दल ने जीत हासिल करने के लिए अपनी एड़ी चोटी का जोर लगाया है. जीत का जश्न मनाया गया तो वहीं हार को स्वीकार किया गया. लेकिन इस तरह चुनाव आयोग की छवि पर कभी हमला नहीं किया गया. लेकिन आज के समय के दुष्प्रचार से भरे राजनीतिक माहौल को देखते हुए इस संवैधानिक संस्था का बच पाना मुश्किल ही था.

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