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DUSU का दंगल: अपने स्टूडेंट विंग के लहराते परचम से कुछ तो सीखे कांग्रेस

कांग्रेस के स्टूडेंट विंग ने बीते कुछ समय के दौरान बेहतरीन प्रदर्शन किया है

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Sep 13, 2017 07:50 PM IST

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DUSU का दंगल: अपने स्टूडेंट विंग के लहराते परचम से कुछ तो सीखे कांग्रेस

दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनाव में चार सालों का सूखा खत्म करने वाले एनएसयूआई के युवा नेताओं से मातृ संगठन कांग्रेस को सीख लेनी चाहिए. सीख क्यों लेनी चाहिए ये बात आप पिछले दिनों अलग-अलग विश्वविद्यालय में एनएसयूआई के नेताओं ने के जबरदस्त प्रदर्शन से समझ सकते हैं. और युवा विंग के इस प्रदर्शन का विस्तार कई राज्यों में हैं.

हाल ही में जय नारायण व्यास यूनिवर्सिटी जोधपुर में एनएसयूआई की कांता ग्वाला ने अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की. पंजाब यूनिवर्सिटी में जशन कांबोज अध्यक्ष बने. उनके अलावा दो और पदों पर एनएसयूआई ने बाजी मारी.

महारानी कॉलेज जयपुर में नेहा यादव अध्यक्ष बनीं. असम यूनिवर्सिटी में छात्र संघ के तीन पदों पर एनएसयूआई के प्रत्याशियों ने बाजी मारी. अब इसके बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी के चुनाव. एक के बाद एक जीत.

इससे ठीक उलट कांग्रेस के चुनाव नतीजों हतोत्साहित करने वाले हैं. चुनाव दर चुनाव कांग्रेस हार रही है. पार्टी शीर्ष नेतृत्व ये समझ नहीं पा रहा है कि आखिर इन मुश्किल परिस्थितियों से कैसे बाहर निकला जाए? पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपने बयानों की वजह से हर कुछ समय बाद चर्चा में आ जाते हैं. और निश्चित रूप से ये चर्चाएं सकारात्मक तो कतई नहीं होतीं. एनएसयूआई के युवा नेताओं का ये प्रदर्शन इसीलिए और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है.

कमाल की बात है, जहां कांग्रेस बीजेपी के खिलाफ माहौल बनाने में नाकामयाब साबित हो रही है, वहीं एनएसयूआई कैंपस में एबीवीपी को बार-बार धूल चटा रही है. देश के अलग-अलग हिस्सों में विश्वविद्यालयों के कैंपस में ऐसा बदलाव क्यों है? इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एनएसयूआई के छात्रनेता रहे डॉ. रमेश यादव कहते हैं, 'पिछली सरकार की अपेक्षा इस मोदी सरकार में शिक्षा महंगी कर दी गई है. स्कॉलरशिप विवाद हुआ. सीटें कम करने का षड्यंत्र भी हुआ. कैंपस में पढ़ाई कर रहे एक छात्र के लिए ये बेहद महत्वपूर्ण बातें हैं.'

रमेश यादव आगे कहते हैं, 'स्वास्थ्य सेवा भी महंगी हो गईं. रोजगार के अवसर ख़त्म हो रहे हैं. वर्तमान सरकार की नीतियों के कारण ही युवा वर्ग खासकर 18-28 वर्ष का वर्ग समूह निराश है. ये वही 18-28 का वर्ग समूह है जो बड़ी आशा के साथ बीजेपी का साथ 2014 से देता आ रहा था. लेकिन अब तक उसके हाथ निराशा ही लगी.'

'इन सब का असर उस मध्यमवर्गीय परिवार के युवा पर पड़ा है, जो देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहा है. इसलिए नौजवान छात्रों ने अपने रुख का इजहार बीजेपी के खिलाफ अपने मताधिकार द्वारा छात्रसंघ चुनावों में दिखाना शुरू कर दिया है.'

यूनिवर्सिटी कैंपस में तो केंद्र सरकार के निर्णयों को लेकर बने गुस्से को एनएसयूआई भले ही भुनाने में कामयाब हो रही हो लेकिन उसकी मातृ संगठन कांग्रेस ऐसा कोई कारनामा कर पाने में नाकामयाब रही है.

कांग्रेस पार्टी में स्टूडेंट विंग से मुख्य राजनीति में प्रवेश करने वाले नेताओं की पुरानी प्रथा रही है. पिछली यूपीए सरकार में मत्री रहे मनीष तिवारी और मीनाक्षी नटराजन जैसे नेता भी एनएसयूआई से निकल कर राष्ट्रीय राजनीति में आए हैं. अब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को चाहिए कि वह इस समय पूरे देश में बढ़ रहे बीजेपी के विजय रथ को रोकने के लिए युवा नेताओं को मुख्य राजनीति में लेकर आए. छात्रसंघ चुनावों अपनी कूवत दिखा चुके इन नेताओं के बढ़े हुए आत्मविश्वास और नए विचारों के साथ कांग्रेस कोशिश करनी चाहिए कि वह पार्टी को तेजी के साथ ढर्रे पर लेकर आए.

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साथ ही राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी को भी युवा नेताओं के साथ ज्यादा सक्रियता दिखानी चाहिए. इसका कारण ये है कि हार की जड़ता ने पार्टी के पुराने नेतृत्व को भी शिथिल कर दिया है. ऐसे में युवाओं के जोश और जुनून के साथ 2019 की तैयारी पूरी ताकत के साथ करनी होगी. क्योंकि अब ज्यादा समय शेष नहीं है. वरना पार्टी की छात्र इकाई की ये उपलब्धियां बेकार चली जाएंगी.

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