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यूपी चुनाव 2017: गधों के आ गए 'अच्छे दिन'!

अमिताभ बच्चन ने विज्ञापन में कहा है-गधा गाली नहीं, तारीफों की थाली है

Piyush Pandey Updated On: Feb 21, 2017 07:12 PM IST

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यूपी चुनाव 2017: गधों के आ गए 'अच्छे दिन'!

चुनावी मौसम की यही खूबी है. घोड़े, उल्लू, आतंकवादी, राक्षस, सौदागर सब एक कैटेगरी में आ जाते हैं. गधे भी आ गए. जिन गधों को कोई पूछता नहीं, अचानक उनके 'अच्छे दिन' आ गए.

ट्विटर पर चला ट्रेंड

गधा ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा है. हेडलाइंस में छाया हुआ है. न्यूज चैनल की प्राइम टाइम बहस का हिस्सा बना हुआ है. गधों के इतने अच्छे दिन कभी नहीं आए थे. सचमुच !

संयोग देखिए कि अखिलेश यादव ने जिन जंगली गधों के विज्ञापन को आधार बनाकर बड़बोलापन दिखाया तो  उनके साथी राहुल गांधी को उन्हीं की पार्टी के ही एक नेता ने '...' बताया था.

कौन गधा, कौन घोड़ा 

छत्तीसगढ़ से कांग्रेस विधायक आर के राय ने राहुल गांधी के नेतृत्व गुणों पर सवाल उठाते हुए कहा था, ‘मैं गधे को घोड़ा नहीं मान सकता.'

तो पार्टी ने राय को नेता मानने से ही इंकार कर दिया और दुलत्ती मारकर पार्टी से बाहर कर दिया.

वैसे, चुनावी मौसम में गधे का नाम लेना अखिल भारतीय गधा समाज की बड़ी बेइज्जती है. गधे का नाम भले गधा हो लेकिन उसे अंडरएस्टीमेट नहीं किया जाना चाहिए.

उज्जैन में लगने वाले गधा मेला में देश भर के गधा व्यापारी और पालक अपने गधों को लेकर पहुंचते हैं, और एक-एक गधा 25 से 50 हजार रुपए में बिकता है. इतनी कीमत तो कई नेताओं की आज नहीं है !

गधा कहने पर नाराज ना हों

अमिताभ बच्चन साहब विज्ञापन में समझा रहे हैं कि कोई आपको गधा कहे तो नाराज मत होइए.

ये सच है. क्योंकि गधा देश की जनता का पर्यायवाची है. जिस तरह गधा डिमांडिंग नहीं होता, वैसे ही देश की आम जनता डिमांडिंग नहीं होती.

गधे को कैसा भी चारा दे दो-वो उसे ही खाकर पेट भर लेता है. वैसे ही, देश की जनता को कैसे भी वादों का लॉलीपॉप थमा दो-वो चूस लेती है.

गधे को एक बार रास्ता बता दो तो वो बगैर बताए या हांके अपनी जगह पहुंच जाता है.

देश की जनता को बता दो कि चुनाव आए हैं तो वो बिना बताए वोट डाल आती है. बिना ये सवाल किए कि बीते 70 साल में क्या दिया और क्यों रोटी-कपड़ा-मकान ही आज भी प्राथमिक जरूरत है.

नेता घोड़ा और देश की जनता गधा !

गधा आज्ञाकारी होता है, अलबत्ता रेंकते हुए डेंचू डेंचू करता है. देश के लोग भी आज्ञाकारी ही हैं अलबत्ता रेंकते हुए कभी कभी क्रांति-क्रांति करते हैं.

एक लिहाज से देखें तो नेता घोड़ा है, और देश की जनता गधा. वैज्ञानिक दृष्टि से घोड़े में गधे के मुकाबले दो गुणसूत्र ज्यादा होते हैं. यही दो गुणसूत्र से घोड़े राज करते हैं, और गधे सेवा.

घोड़े की किस्मत में स्विस बैंक होता है, और गधे की किस्मत में धोबी-कुम्हार. गधे की किस्मत में बोझ उठाना लिखा है, और यही देश की आम भोली गरीब जनता की किस्मत में भी लिखा है.

घोड़े का चारा गधों पर टैक्स लगाकर वसूला जाता है. दरअसल, इस देश के बड़े नेताओं ने शर्म बेचकर उन 'गधों' को राजनीति का हिस्सा बना दिया है, जो 'गधे' कहलाने लायक भी नहीं है.

अमिताभ बच्चन ने विज्ञापन में कहा है-गधा गाली नहीं,तारीफों की थाली है.

तो जनाब बिलकुल सच है ये. इस देश की जनता गधे की तरह बरसों से लतियाई जा रही है. लेकिन गधा गुण कूट कूटकर भरे होने की वजह से कुछ नहीं बोलती. वो गधों की तरह अपने मालिक की बात पर विश्वास करती है तो उसकी तारीफ होनी ही चाहिए.

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