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सच्चाई से मुंह न चुराइए साब, सहारनपुर तो सिर्फ बानगी है

राजधानी में उमड़ा जन सैलाब अपने हक की मांग कर रहा था. ये किसी पार्टी के कार्यकर्ता नहीं थे

Rajendra P Misra Rajendra P Misra | Published On: May 22, 2017 10:43 PM IST | Updated On: May 22, 2017 10:53 PM IST

सच्चाई से मुंह न चुराइए साब, सहारनपुर तो सिर्फ बानगी है

रविवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हर तरफ नीली टोपी और नीले झंडे दिखाई दे रहे थे. 'जय भीम' के नारे गूंज रहे थे. सत्ता की राजधानी में उमड़ा जन सैलाब अपने हक की मांग कर रहा था. ये किसी पार्टी के कार्यकर्ता नहीं थे और न ही इस हुजूम को किराए पर लाया गया था. इनमें ज्यादातर पढ़-लिखे युवा थे, जो राजधानी की सड़कों पर अपने हक की लड़ाई लड़ने आए थे.

टीवी चैनलों से गायब था यह प्रदर्शन

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने इस लड़ाई को नजरअंदाज कर दिया. जिस वक्त जंतर-मंतर पर यह प्रदर्शन चल रहा था, मैंने हिंदी न्यूज चैनलों पर सरसरी नजर डाली. एकाध चैनलों को छोड़कर यह खबर गायब थी.

ज्यादातर बड़े चैनलों पर मोदी के तीन साल पूरे होने के मौके पर कार्यक्रम चल रहे थे. अरविंद केजरीवाल के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा की नौटंकी भी जारी थी. दलितों को जनसैलाब सड़कों पर उतरा है, इसकी किसी को परवाह नहीं थी.

लेकिन एल्टरनेटिव मीडिया और सोशल मीडिया पर यह खबर छाई हुई थी. यह जनसैलाब बगैर परंपरागत प्रचार के जंतर-मंतर पर जुटा था और नए दौर के युवा-युवती अपने संघर्ष की कहानी प्रदर्शन के दौरान ही सोशल मीडिया पर साझा भी कर रहे थे.

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पत्रकार दिलीप मंडल ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा, 'आप लोगों ने तो पूरा फेसबुक-ट्विटर ही नीला कर दिया. आज (रविवार) कई लाख तस्वीरों और वीडियो से भर गया इंटरनेट. कौन बेवकूफ है जो चैनल अखबारों को पूछता है. वे मोदी-योगी, भविष्य फल और सास-बहू और क्रिकेट करते रहें. आपका मीडिया बन चुका है.'

तोंदियल पुलिसकर्मियों की दास्तान

न्यूज चैनलों की इस बेरुखी को कई वरिष्ठ पत्रकारों ने भी नोटिस किया. वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की फेसबुक पर की गई टिप्पणी पर गौर किजिए.

'इन कथित राष्ट्रीय न्यूज चैनलों पर भला कौन भरोसा करेगा. दिल्ली के जंतर-मंतर पर रविवार को जनसैलाब उमड़ पड़ा है. ये चैनल एक-एक केंद्रीय मंत्री का इंटरव्यू दिखा रहे हैं, कपिल (मिश्रा) लाइव कर रहे हैं, तोंदियल पुलिसकर्मियों की दास्तान सुना रहे हैं और भी तमाशे पेश कर रहे हैं, पर दलित-बहुजन समाज के लोगों की ऐतिहासिक रैली इनके पर्दे से गायब है. क्या सत्ता के खिलाफ जन-प्रतिरोध कोई खबर नहीं?'

उर्मिलेश ने अपनी फेसबुक पोस्ट में एक बड़ा सवाल उठाया है. क्या वास्तव में जन प्रतिरोध अब मुख्यधारा की मीडिया के लिए खबर नहीं रहा? बहरहाल, यह बड़ी बहस है. इस पर कभी विस्तार से बात की जा सकती है. इस मसले पर बात होगी तो मीडिया के ढांचे, कॉरपोरेट नियंत्रण, सत्ता से मीडिया के अंतरसंबंध और मीडिया हाउसों में सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसे विषयों पर भी बात होगी.

हम सहारनपुर पर बात क्यों नहीं करते?

दलित युवक-युवतियों के इस प्रदर्शन का फौरी कारण सहारनपुर में हुई जातीय हिंसा थी. सहारनपुर में सवर्ण जातियों ने जिस तरह से हिंसा की, दलितों के घरों को जलाया, इससे हम सभी वाकिफ हैं.

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हमारे देश के लिए यह कोई नई घटना है भी नहीं. बहुजन समाज के खिलाफ भेदभाव और हिंसा की घटनाओं से आजाद भारत का इतिहास भरा पड़ा है. पुलिस-प्रशासन किस तरह दबंग जातियों के साथ खड़ा होता है और कानून व्यवस्था के नाम पर मुकदमे कायम कर कमजोर तबके के लोगों की गिरफ्तारियां होती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है.

लेकिन इस बार हालात कुछ अलग हैं, क्योंकि सहारनपुर की घटना उस उत्तर प्रदेश में हुई हैं जहां अब योगी आदित्यनाथ की हिंदुत्ववादी सरकार है. बीजेपी नेता दावा करते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव में दलित समुदाय ने भी उन्हें वोट दिया था.

योगी से नाराज है दलित समाज

योगी सरकार से इन दलितों को काफी शिकायतें हैं. उनका आरोप है कि योगी आदित्यनाथ की पुलिस दबंग जातियों के साथ खड़ी है और दलितों पर अत्याचार कर रही है. हिंदुत्व के नाम पर सत्ता में आने वाली सरकार के प्रति दलित समाज में इस तरह की भावना पैदा हो रही है, तो यह योगी आदित्यनाथ के साथ ही बीजेपी के लिए भी चिंता की बात है.

बीजेपी अरसे से राम मंदिर आंदोलन के जरिए हिंदू समाज को एकजुट कर राजनैतिक ताकत हासिल करने की कोशिश करती रही है. नब्बे के दशक में हिंदुत्व का रथ तेजी से आगे बढ़ा भी था, लेकिन मंडल आयोग ने उसे रोक दिया था. लेकिन लंबे जद्दोजहद के बाद आखिरकार हिंदुत्व का सिक्का चल गया.

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने हिंदुत्व के साथ विकास के जिस चोले को धारण किया, उसने पार्टी को केंद्र की सत्ता तो दिलाई ही, उत्तर प्रदेश में दलितों और पिछड़ों के अलग-अलग सत्ता समीकरणों को भी ध्वस्त कर दिया. लेकिन सहारनपुर जैसी घटनाओं से बहुजन समाज में पैदा होने वाला असंतोष हिंदुत्व के प्रोजेक्ट पर रोक लगा सकता है. लिहाजा, बीजेपी नेतृत्व को भी इस घटना को हल्के में लेने की भूल नहीं करनी चाहिए.

आखिर क्यों गुस्से में हैं दलित?

हमारे देश में आजादी के बाद भी बहुजन समाज हाशिए पर रहा. इनके नाम पर सियासत होती रही, इन्हें वोट बैंक माना जाता रहा. जब भी इनके हितों की बात होती, सत्ता में बैठे लोग आरक्षण का नारा बुलंद कर अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते. इनके सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक हालात बदलने की शिद्दत से कभी कोशिश नहीं हुई.

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अस्सी के दशक में बहुजन समाज के संस्थापक कांशीराम ने दलितों के दर्द को समझा. उनके 'रोटी और बेटी' और 'रोटी नहीं, सम्मान चाहिए' जैसे नारों से दलित समाज ने खुद को जोड़ लिया. देखते ही देखते उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी एक बड़ी राजनीतिक ताकत बन गई. दलित समाज को सियासी ताकत तो मिली, लेकिन उनके सामाजिक-आर्थिक हालात में बदलाव नहीं आया. यह अलग बात है कि इस दौरान बीएसपी नेता मायावती के धन-दौलत में बेहिसाब बढ़ोतरी हुई.

बीजेपी के लिए यह सुनहरा मौका था. उसने समावेशी हिंदुत्व के नारे को आगे किया और नतीजा सबके सामने है. उत्तर प्रदेश में बीजेपी की जबरदस्त जीत हुई. सूबे में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में हिंदुत्ववादी सरकार विराजमान हो गई. लेकिन हिंदू समाज के अंतर्विरोध पहले की तरह अब भी मौजूद हैं जो हमेशा से सामाजिक टकराव को जन्म देते रहे हैं. सहारनपुर की घटना को इसी परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए.

दलितों ने क्यों किया धर्म परिवर्तन?

सहारनपुर की जातीय हिंसा के बाद करीब 180 दलित परिवारों ने धर्म परिवर्तन कर बौद्ध धर्म अपना लिया. उन्होंने हिंदू देवताओं की मूर्तियों को नदी में बहा दिया. सवाल उठता है कि जब योगी सरकार समावेशी हिंदुत्व की बात कर रही है तो दलितों को इस तरह का कदम क्यों उठाना पड़ा? इस सवाल का जवाब जानने के लिए इतिहास में झांकना जरूरी है.

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने पूरी जिंदगी हिंदू धर्म में रहते हुए अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया. लेकिन अपने जीवन के आखिर दौर में उन्होंने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया था.

आजादी के आंदोलन के दौरान अंबेडकर के साथ घटित हुए एक वाकये से उस वक्त के सामाजिक हालात को समझा जा सकता है. अंबेडकर की एक किताब है ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’, जो मूलत: उनका एक भाषण है जिसे वे दे नहीं सके थे. इस भाषण को बाद में एक किताब के रूप में प्रकाशित किया गया.

अंबेडकर ने भी धर्म बदला था

अंबेडकर ने इसे 1936 में लाहौर के जात-पात तोड़क मंडल के सम्मेलन के लिए लिखा था. उन्होंने अपना भाषण पहले ही भेज दिया था. मंडल ने उनसे ऊंची जातियों की आलोचना को संपादित कर हल्का करने का आग्रह किया. लेकिन अंबेडकर ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. लिहाजा, जात-पात तोड़क मंडल ने अपना सम्मेलन रद्द कर दिया गया और अंबेडकर अपना यह भाषण नहीं दे सके.

जात-पात तोड़क मंडल हिंदू समाज के अंदर सुधार के अभियान में लगा था. लेकिन उसे ऊंची जाति के हिंदुओं की आलोचना करने वाला अंबेडकर का भाषण मंजूर नहीं था. यह आज के दौर की भी सच्चाई है.

हम समाजिक बदलाव की बात तो करते हैं, लेकिन दिखावे से आगे बढ़ने को तैयार नहीं होते. पूरी बात का निचोड़ यह है कि अगर हिंदू समाज में बुनियादी बदलाव नहीं होते तो सहारनपुर जैसे कांड आगे भी होते रहेंगे.

कुछ लोगों का मानना है कि दलित समाज जब पूरी तरह निराश हो जाता है, जब उसे लगने लगता है कि हिंदू धर्म में रहते हुए उसके सामाजिक-सांस्कृतिक हालात नहीं बदलने वाले हैं, तब वह सामूहिक रूप से धर्म परिवर्तन करता है. लेकिन मैं इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता.

दरअसल, धर्म परिवर्तन दलितों के संघर्ष का एक हथियार है, जिसके जरिए वे हिंदू समाज को आईना दिखाते हैं. शायद अंबेडकर ने भी हिंदू समाज के ठेकेदारों को आईना दिखाने के लिए ही बौद्ध धर्म अपनाया था.

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