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मुश्किल में फंसे हताश लालू अब नए साथियों की तलाश में!

हताश लालू नए-नए साथियों की तलाश में भाग रहे हैं

Amitesh Amitesh | Published On: May 18, 2017 03:03 PM IST | Updated On: May 18, 2017 03:09 PM IST

मुश्किल में फंसे हताश लालू अब नए साथियों की तलाश में!

आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव इन दिनों हताश हैं. लालू एक बार फिर मुश्किल भरे दौर से गुजर रहे हैं. लालू की मुश्किल यही है कि उनके दोनों बेटों और बेटी मीसा भारती का नाम इस बार घपले-घोटाले में आने लगा है.

बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव के साथ-साथ उनकी बेटी और राज्यसभा सांसद मीसा भारती पर भी बेनामी संपत्ति के मामले में आरोप लगे है. जब तक बीजेपी की तरफ से आरोप लग रहे थे तब तक लालू हमलावर थे. लेकिन, इनकम टैक्स के छापे के बाद लालू हताश लगने लगे हैं.

अब हताश लालू नए-नए साथियों की तलाश में भाग रहे हैं. इसी कोशिश में लालू अब मायावती को साथ लाना चाहते हैं. आरजेडी सूत्रों के मुताबिक लालू प्रसाद यादव ने बीएसपी अध्यक्ष मायावती को बिहार से राज्यसभा में भेजे जाने का ऑफर दिया है. लालू चाहते हैं कि मायावती अगली बार राज्यसभा में जरूर पहुंचे.

दरअसल, अगले साल अप्रैल में मायावती का राज्यसभा का टर्म पूरा हो रहा है. लेकिन, बीएसपी के साथ इस वक्त विधायकों की इतनी संख्या नहीं बची है जिसके दम पर मायावती दोबारा राज्यसभा पहुंच सकें.

यूपी से दोबारा राज्यसभा के लिए चुने जाने के लिए मायावती को 37 विधायकों की जरूरत होगी जबकि विधान परिषद में पहुंचने के लिए भी 29 विधायकों की जरूरत होगी. लेकिन, यूपी में बीएसपी के पास महज 19 विधायक जीतकर आए हैं. ऐसे में मायावती न राज्यसभा के लिए और न ही विधानपरिषद के लिए ही चुनी जा सकती हैं.

मायावती को लालू दे रहे ऑफर

Mayawati

अब मायावती को लालू यादव ऑफर दे रहे हैं बिहार से राज्यसभा पहुंचने का. लालू की कोशिश है कि मायावती के साथ आने की सूरत में उनके मुस्लिम -यादव समीकरण में दलित भी जुड़ जाएंगे जिससे उनका ग्राफ और ज्यादा बड़ा हो जाएगा.

बिहार में अगले साल राज्यसभा कि छह सीटों के लिए भी चुनाव होना है. केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद और धर्मेंद्र प्रधान का कार्यकाल पूरा हो रहा है जबकि, जेडीयू से प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह, अली अनवर अंसारी, अनिल कुमार सहनी और महेंद्र प्रसाद का कार्यकाल खत्म हो रहा है. संख्या बल के हिसाब से मायवती अगर तैयार हो जाती हैं तो आरजेडी कोटे से उन्हें राज्यसभा सीट मिल सकती है.

लेकिन, लालू की यह कोशिश कितना रंग लाएगी यह सबसे बड़ा सवाल है. क्योंकि इस बार विधानसभा चुनाव में बीएसपी के सफाए के बाद यूपी के भीतर भी उनकी पार्टी के वजूद और भविष्य को लेकर सवालिया निशान लगा हुआ है.

मायावती अपने दलित वोट बैंक को भी एकजुट कर सकने में असफल रही हैं. दलित वोट बैंक में भी काफी हद तक बीजेपी ने इस बार सेंधमारी कर दी है. ऐसे में मायावती को साथ लाकर बिहार में दलित को साधने की लालू की कोशिश के कारगर होने पर संदेह ही नजर आ रहा है.

मायावती जब पूर्ण बहुमत के साथ 2007 में यूपी की सत्ता पर काबिज हुई थी तो उस वक्त भी बिहार के भीतर वो बीएसपी के विस्तार और खास प्रभाव को छोड़ने में सफल नहीं रहीं. यानी मायावती बिहार के भीतर कभी दलितों के नेता के तौर पर अपने-आप को स्थापित नहीं कर सकीं.

'लालू के लिए संकट का समय'

lalu yadav

वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेल्लारी का कहना है कि ‘इस वक्त लालू यादव के लिए संकट का समय है लिहाजा वो नए-नए साथी तलाश रहे हैं.’ कन्हैया भेल्लारी ने फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बातचीत में बताया कि ‘मायावती भले ही लालू यादव के सहयोग से राज्यसभा पहुंच जाएं लेकिन, इससे मायावती का अपना सियासी कद काफी छोटा हो जाएगा.’

यूपी के भीतर ही मायावती की हालत पतली है तो बिहार में लालू के साथ मंच साझा कर वो लालू के हाथ को कितना मजबूत करेंगी इस पर संदेह है.

लेकिन, हताश लालू को हर शख्स में वो अक्स दिखाई दे रहा है जिसके सहारे वो अपनी और अपने वारिसों की डगमगाती नैया को थाम सकें. लिहाजा लालू मायावती से लेकर मुलायम और अखिलेश तक, ममता से लेकर सोनिया तक सबको एक साथ एक मंच पर लाने की तैयारी कर रहे हैं.

आगामी 27 अगस्त को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में आरजेडी बड़ी रैली करने जा रही है. लालू प्रसाद यादव की कोशिश है कि इस रैली के माध्यम से बीजेपी विरोधी दलों का एक बड़ा जमावड़ा किया जाए. इसके लिए लालू ने मायावती को भी इस रैली में आने का न्योता दिया है.

अब देखना है कि लालू यादव की इस बड़ी रैली में उनके साथ कौन होगा. अगर इस रैली में कांग्रेस के नेताओं के साथ-साथ माया, मुलायम, समेत और दूसरे बीजेपी विरोधी दल के नेता मंच साझा करते हैं तो लालू की हताशा थोड़ी कम होगी.

अगर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी लालू की रैली में शामिल हो जाते हैं तो भी लालू के लिए थोड़ी राहत होगी वरना, लालू की हताशा में इजाफा ही होगा. चाहे वो मायावती को साथ लाने की कोशिश कर लें या फिर कोई और तिकड़म. क्योंकि, दागदार लालू के साथ सबके आने पर भी अभी सवाल बना हुआ है.

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