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क्या आम आदमी पार्टी का खेल खत्म हो गया?

केजरीवाल ने अपनी ही कही बातों की अनदेखी की, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा है

Mridul Vaibhav | Published On: Apr 26, 2017 09:20 PM IST | Updated On: Apr 26, 2017 09:20 PM IST

क्या आम आदमी पार्टी का खेल खत्म हो गया?

दिल्ली महानगर निगम के चुनाव नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि आने वाला समय आम आदमी पार्टी के लिए बहुत मुश्किलों से भरा होगा. कई राजनीतिक विश्लेषक तो यह भी मान रहे हैं कि अब आम आदमी पार्टी का सियासी खेल खत्म हो गया है.

इन चुनाव नतीजों से यह भी साफ हो गया है कि आम आदमी पार्टी और इसके प्रमुख नेता अरविंद केजरीवाल के पास जो जनबल था, वह अब उनका साथ छोड़कर भाजपा के साथ चला गया है. इस समय में अरविंद केजरीवाल के विरोधी तो उन पर हमला कर ही रहे हैं, उनके अपने साथी भी उन पर भयंकर हमले कर रहे हैं.

क्या है बेरुखी की वजह?

आम आदमी पार्टी का एमसीडी चुनाव में प्रदर्शन बहुत खराब रहा है और उसने 270 में से महज 48 सीटें ही जीती हैं. इन चुनाव नतीजों से ठीक पहले केजरीवाल के पुराने साथी और आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में एक और आजकल स्वराज अभियान चला रहे योगेंद्र यादव ने केजरीवाल को एक खुला पत्र लिखा था.

यादव ने पत्र लिखकर रामलीला मैदान में किए गए राइट टू रिकॉल  वादे की याद दिलाई है. यादव ने लिखा है, दिल्ली में अाप 70 में से 67 सीटें जीतने के दो साल में ही इस रेफरेंडम में हार जाते हैं तो नैतिकता की मांग है कि आप ईवीएम जैसा बहाना नहीं बनाएं और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दें.

अापकी सरकार दिल्ली में रिकॉल के सिद्धांत के अनुसार दुबारा जनमत से विश्वास मत हासिल करे. दिल्ली में जिन दिनों आम आदमी पार्टी बन रही थी तब अरविंद केजरीवाल ने सरकारों के लिए रिकॉल की बात बहुत बढ़चढ़कर कही थी.

अपने ही साथियों के निशाने पर आए केजरीवाल

दिल्ली एमसीडी के चुनाव में ऐतिहासिक पराजय के बाद पंजाब सहित कई राज्यों से अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के बारे में उन्हीं के साथी तीखे प्रश्न उठ रहे हैं.

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संगरूर एमपी भगवंतसिंह मान ने आप के शीर्ष नेतृत्व पर प्रश्न उठाए हैं और कहा है कि वह गलतियों पर गलतियां कर रही है और पावरगेम में फंस गई है.

उन्होंने एमसीडी चुनाव में भी पार्टी की रणनीति को गलत बताया है. मान के अनुसार ईवीएम को दाेष देना और अपनी गलतियों को नहीं देखना भारी भूल है.

अलका लांबा ने भी की इस्तीफे की पेशकश

कांग्रेस की युवा नेता रहीं अलका लांबा इस समय आप की विधायक हैं और उन्होंने अपने इलाके में चुनाव हारने के बाद इस्तीफा देने की पेशकश कर डाली.

लेकिन केजरीवाल या सिसोदिया जैसे बड़े नेताअों ने ऐसी किसी औपचारिक नैतिकता की भी जिम्मेदारी दिखावटी तौर पर भी नहीं दिखाई.

केजरीवाल के पुराने साथी और आम आदमी पार्टी के अनुभवों के कारण राजनीति को ही अलविदा कह चुके मयंक गांधी ने ट्वीट किया, 'दिल्ली महानगर निगम में भारतीय जनता पार्टी के कुशासन के बावजूद बीजेपी को इतनी सीटें मिलने से साफ है कि आप सरकार दिल्ली के लोगों में बहुत बदनाम हो चुकी है.'

आम आदमी को नहीं भा रहे केजरीवाल

ये चुनाव नतीजे ऐसे समय आए हैं, जब कुछ ही दिन पहले आम आदमी पार्टी की राजौरी गार्डन विधानसभा उपचुनाव में जमानत जब्त हो गई थी और यहां भाजपा ने जीत दर्ज की थी.

तो क्या वाकई आम आदमी पार्टी का खेल खत्म हो गया है? यह सही हो या न हो, लेकिन आगे ही राहें इस पार्टी के लिए बहुत मुश्किलों भरी हैं.

लेकिन इन नतीजों से पर सबसे जोरदार टिप्पणी अन्ना हजारे की रही. उन्होंने कहा, अगर केजरीवाल उनकी बताई राह पर चलते तो आज यह हालत नहीं होती. कथनी और करनी के अंतर ने केजरीवाल की लुटिया डुबो दी.

अरविंद और उनके मंत्रियों ने पहले गाड़ियां ले लीं, फिर बंगले ले लिए और बाद में तनख्वाहें बढ़ा लीं.

क्या कहते हैं राघव चड्ढा?

हालांकि आप प्रवक्ता राघव चड्‌ढा यह कहते हुए सुनाई दिए कि दिल्ली एमसीडी का चुनाव बहुत छोटा था और सामने बहुत धनबल था.

आम आदमी पार्टी सरकार के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा है कि यह ईवीएम के कारण हुई हार है.

कुल मिलाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस तरह यह पार्टी उभरी और एक नया नैतिकतावाद खड़ा किया और सरकार बनी, उसके बाद आम आदमी पार्टी जिस तेजी से शीर्षासन करने लगी, उसने जनता में उसका सारा भरोसा खत्म कर दिया.

क्या आप की पोल खुल रही है?

सच में तो वे एक पीतल की चीज लेकर आए थे, जिस पर सोने की पॉलिश थी, जिसने लोगों को अचानक लुभाया, लेकिन अब पीतल उघड़ आया है.

इस पीतल को उघड़ने में कुछ समय लगा, लेकिन पहले प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव आदि अलग हुए.

अन्ना आंदोलन से जुड़ी किरण बेदी और अन्य कई नेता तो केजरीवाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भांपकर ही उनका साथ छोड़ गए, हालांकि बाद में बेदी भाजपा में चली गईं और केजरीवाल के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरीं और अब पुडुचेरी की उपराज्यपाल हैं.

जनता ने दी सजा

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आम आदमी पार्टी और केजरीवाल के बारे में सोशल मीडिया और अन्य स्रोतों से जो टिप्पणियां आ रही हैं, उनमें एक बात बहुत साफ है कि उन्होंने सादगी, गांधीवाद और सुशासन के जो वादे किए थे, उन पर वे नहीं चले.

साथ ही उन्हें 12000 रुपए की वह थाली उसी तरह महंगी पड़ी जिस तरह दिल्ली विधानसभा के उप चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दस लाख का कोट बीजेपी को महंगा पड़ा था.

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