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दिल्ली नगर निगम के 'राष्ट्रीय चुनाव' में भी बीजेपी की जीत

यह नीतियों की विजय है या मोदी-विरोध के तौर-तरीकों की पराजय?

Pramod Joshi | Published On: Apr 26, 2017 11:08 AM IST | Updated On: Apr 26, 2017 11:08 AM IST

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दिल्ली नगर निगम के 'राष्ट्रीय चुनाव' में भी बीजेपी की जीत

एक विदेशी वेबसाइट के भारतीय लेखक ने ट्वीट किया, ‘नोटबंदी फेल, सायबर सिक्योरिटी फेल, कश्मीर नीति फेल, नक्सल नीति लापता और स्वच्छ भारत वापस, फिर भी सरकार की पौ-बारह.’ उनके सवालिया विस्मय में एमसीडी परिणाम को भी जोड़ लें तो सवाल बनता है कि आखिर बीजेपी की पांचों उंगलियां घी में क्यों हैं?

जिस संस्था के प्रशासन से बीजेपी खुद इतनी नाराज थी कि उसने अपने किसी भी पुराने पार्षद को टिकट नहीं दिया, उसमें इस गगन-भेदी विजय का मतलब क्या है? यह नीतियों की विजय है या मोदी-विरोध के तौर-तरीकों की पराजय?

वस्तुतः यह एमसीडी का चुनाव था ही नहीं. यह लोकसभा चुनाव की तरह राष्ट्रीय मुद्दों का चुनाव था. इस लिहाज से यह स्थानीय मुद्दों की पराजय है और स्थानीय निकायों के लिए गलत संदेश. इसके लिए राजनीतिक दल भी जिम्मेदार हैं.

यह पहला मौका है, जब एमसीडी के चुनावों ने इतने बड़े स्तर पर देशभर का ध्यान अपनी ओर खींचा. परीक्षा थी इसमें शामिल तीन प्रमुख दलों और एक उदीयमान दल की, जिसे अभी मान्यता भी नहीं मिल पाई है. योगेन्द्र यादव का स्वराज्य इंडिया प्रभावहीन रहा.

New Delhi: Delhi BJP President Manoj Tiwari campaigns for party candidates ahead of MCD elections in New Delhi on Sunday. PTI Photo (PTI4_9_2017_000068B)

चुनाव प्रचार करते मनोज तिवारी

क्या ये बीजेपी के 'उन्मादी राष्ट्रवाद' की जीत है?

इस चुनाव में दिल्ली के लोगों की परीक्षा भी थी, जिन्हें देश के सबसे विवेकशील वोटरों में गिना जाता है. होना तो यही चाहिए था कि वोटर नगर निगम के चुनाव में साफ-सफाई और दूसरे नागरिक मसलों पर ध्यान देता, पर उसने कहीं और देखना पसंद किया.

एक और सवाल बनता है कि क्या यह बीजेपी के ‘उन्मादी राष्ट्रवाद’ की जीत है? क्या कश्मीर, पाकिस्तान और माओवादी हिंसा से नाराज जनता की प्रतिक्रिया है? क्या देश की जनता ‘लिबरल राजनीति’ से नाराज है?

ऐसा नहीं, तो क्या वजह है कि एमसीडी की इनकम्बैंसी के ताप से ‘मोदी के जादू’ ने न केवल बीजेपी को बचाया, जबर्दस्त जीत भी दिला दी? दिल्ली में बिजली-पानी मुफ्त देने वाली ‘आप’ किस वजह से धूल-धूसरित हुई?

सवाल यह भी है कि मोदी का जादू आज बोल रहा है तो वह सन 2015 में क्यों नहीं बोला? उस वक्त तो मोदी की लोकप्रियता आज से भी ज्यादा थी? इसके लिए हमें आम आदमी पार्टी के क्रिया-कलाप के बारे में विचार करना होगा.

सन 2015 में मोदी के जादू की अनदेखी करके वोटर ने ‘केजरीवाल के जादू’ की तरफ देखा था. वोटर को केजरीवाल से ज्यादा बड़ी उम्मीदें थीं. ये उम्मीदें मुफ्त बिजली-पानी की नहीं राजनीतिक शुचिता और नैतिक मूल्यों की थी.

आम आदमी पार्टी के तमाम अच्छे फैसलों पर पार्टी की रीति-नीति हावी हो गई. एक वैकल्पिक राजनीति का जिस तरीके से अवसान हुआ, उसने जनता को नाराज किया. यह पार्टी दूसरे दलों से अलग साबित नहीं हुई. अगले कुछ दिनों में इसके अस्तित्व के लिए कुछ बड़ी चुनौतियाँ खड़ी हो जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

ArvindKejriwarl

बीजेपी की ये जीत न अंतिम है न निर्णायक

आम आदमी पार्टी के अलावा हमें कांग्रेस पर भी नजर डालनी होगी. दिल्ली ही नहीं दूसरे राज्यों के सीनियर नेता कांग्रेस छोड़कर बीजेपी की शरण ले रहे हैं. यह जहाज के डूबने का संदेश है.

मोटे तौर पर राष्ट्रीय राजनीति सन 1971 की याद दिला रही है. एक तरफ वह ‘गरीबी हटाओ’ का दौर था, वहीं ‘राष्ट्रवादी उभार’ भी उसी दौर की देन है. हमें नहीं भूलना चाहिए कि सन 1973-74 आते-आते जनता के बीच निराशा की भावना भी बढ़ती गई.

यह मोदी सरकार की परीक्षा की घड़ी भी है. उसे मिल रही भारी सफलता वोटर की ‘भारी अपेक्षाओं’ की निशानी भी है. मोदी सरकार के विरोधी अब एकजुट भी होंगे. राष्ट्रीय स्तर पर ‘इन्द्रधनुषी गठबंधन’ की बातें होने लगी हैं. बीजेपी की यह जीत न तो अंतिम है और न निर्णायक. जिस तरह आम आदमी पार्टी को लेकर जनता की उम्मीदें टूटीं वैसा ही भाजपा के साथ भी हो सकता है.

इन नतीजों का विश्लेषण होने में अभी कुछ समय लगेगा, पर इसके दो संदेश साफ हैं. पहला अरविंद केजरीवाल की राजनीति ढलान पर उतर गई है. दूसरे सन 2014 के लोकसभा 2015 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा है.

इस त्रिकोणीय संग्राम में बीएसपी और जेडीयू जैसी पार्टियां परिदृश्य से लगभग गायब हो गईं. तीन साल पहले तक दिल्ली में बीजेपी और कांग्रेस दो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक ताकतें थीं. अब तीन हैं और इस चुनाव के बाद भी तीन रहेंगी.

देखना होगा कि आने वाले वक्त में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में से कौन सी पार्टी मुख्य विपक्ष की भूमिका निभाएगी. बीजेपी की यह सफलता इस साल के अंत में होने वाले गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधान सभा चुनाव पर भी असर डालेगी. फिलहाल ‘मोमेंटम’ उसके साथ है.

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