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दिल्ली विधानसभा: स्पीकर को सजा देने का है अधिकार

संसद व विधानसभा परिसर के भीतर शांति व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी स्पीकर के कंधों पर ही होती है

Suresh Bafna | Published On: Jun 28, 2017 08:49 PM IST | Updated On: Jun 28, 2017 08:49 PM IST

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दिल्ली विधानसभा: स्पीकर को सजा देने का है अधिकार

दिल्ली विधानसभा में आप पार्टी के ही दो असंतुष्ट युवकों द्वारा दर्शक दीर्घा से पर्चे फेंकने व सदन की कार्रवाई में बाधा डालने के आरोप में स्पीकर ने दोनों युवकों को एक महीने की जेल की सजा सुना दी. सदन की कार्रवाई को बिना किसी बाधा के चलाने व सदन की गरिमा को बनाए रखने के लिए संविधान में स्पीकर को अर्द्ध-न्यायिक अधिकार दिए गए हैं.

कुछ सप्ताह पूर्व कर्नाटक विधानसभा के स्पीकर ने दो वरिष्ठ संपादकों को इस आधार पर एक साल जेल की सजा दी कि उनके द्वारा लिखे गए लेखों से विधानसभा सदस्यों की अवमानना हुई है. कुछ साल पहले अंग्रेजी अखबार ‘द हिन्दू’ के पूर्व संपादक एन.राम को भी तमिलनाडु विधानसभा के स्पीकर ने सदन की अवमानना के आधार पर सजा सुनाई थी.

स्पीकर की अनुमति के बिना पुलिस परिसर में प्रवेश नहीं कर सकती

संसद व विधानसभा में सदस्यों को कई तरह के विशेषाधिकार दिए गए हैं, ताकि वे बिना किसी भय के सदन में अपनी बात रख सकें. सदन में सदस्य द्वारा कही गई किसी भी बात के आधार पर उन्हें न्यायालय में नहीं घसीटा जा सकता है.

संसद व विधानसभा परिसर के भीतर शांति व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी स्पीकर के कंधों पर ही होती है. स्पीकर की अनुमति के बिना पुलिस परिसर में प्रवेश नहीं कर सकती है. यदि सदन के भीतर कोई व्यक्ति या समूह अव्यवस्था फैलाने की कोशिश करता है तो स्पीकर उनके खिलाफ उचित कार्रवाई कर सकता है.

दिल्ली विधानसभा में दर्शक दीर्घा में मौजूद जिन युवकों ने सदन की कार्रवाई में बाधा डालने का प्रयास किया, वे सीधे-सीधे अवमानना के दोषी है. चूंकि यह घटना स्पीकर की मौजूदगी में हुई, इसलिए अलग से जांच बिठाने का कोई औचित्य नहीं था. यदि सदन में कोई गंभीर हिंसा की घटना होती है तो ऐसी स्थिति में स्पीकर मामला पुलिस को भी सौंप सकते हैं.

दिल्ली विधानसभा में पर्चे उछालने वाले आरोपी को ले जाते सुरक्षाकर्मी को

दिल्ली विधानसभा में पर्चे उछालने वाले आरोपी को ले जाते सुरक्षाकर्मी (फोटो: पीटीआई)

भारतीय राजनीति का यह दुखद पहलू है कि किसी पार्टी के भीतर जारी गुटीय लड़ाई का नकारात्मक असर विधानसभा के कामकाज पर पड़ रहा है. इस तरह की घटनाअों से लोकतांत्रिक संस्थाअों की गरिमा पर विपरीत असर ही पड़ेगा.

इस संदर्भ में सदन के भीतर सांसदों व विधायकों के आचरण पर भी ध्यान देने की जरूरत है. पिछले एक दशक के दौरान संसद व विधानसभाअों में हंगामों की घटनाअों में लगातार बढ़ोतरी हुई है. कई राज्यों की विधानसभाअों के सत्र औपचारिकता के तौर पर ही बुलाए जाते हैं. बहस की बजाय हंगामों को तरजीह दी जाती है और यह स्थिति सत्ताधारी दल के लिए फायदेमंद होती है, क्योंकि उनको सवालों के जवाब नहीं देने पड़ते हैं.

आप के लिए दिल्ली विधानसभा राजनीतिक अखाड़ा 

संसद व विधानसभाअों में होनेवाले हंगामों से आम आदमी को यह संदेश जाता है कि यही एकमात्र तरीका है, जिसके माध्यम से हम अपनी बात सरकार तक पहुंचा सकते हैं. आप पार्टी की सरकार ने तो दिल्ली विधानसभा को राजनीतिक अखाड़े के रूप में परिवर्तित कर दिया है. पिछले दिनों वोटिंग मशीन के खिलाफ आप पार्टी ने विधानसभा का बेजा इस्तेमाल किया था.

संसद व विधानसभाअों की गरिमा को बनाए रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी सांसदों व विधायकों की ही है. हाल का इतिहास यह बताता है कि सांसद व विधायकगण अपनी यह जिम्मेदारी निभाने में असफल रहे हैं. कई बार यह देखा गया है कि स्पीकर खुद को एक असहाय स्थिति में पाता है.

स्पीकर की निष्पक्षता पर भी कई बार सवालिया निशान लगे हैं और उनके द्वारा लिए गए निर्णयों को न्यायालय में चुनौती दी गई है और कई मामलों में उनके निर्णय न्यायालय द्वारा बदले गए हैं. दल-बदल विधेयक के संदर्भ में स्पीकर की भूमिका कई बार विवादास्पद रही है. स्पीकर की गरिमा को फिर से बहाल करने के लिए दल-बदल विधेयक पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है.

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