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जस्टिस कर्णन के बहाने जस्टिस वी.रामास्वामी पर महाभियोग चलाए जाने की कहानी

14 मई 1993 को वी.रामास्वामी ने अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी थी

Surendra Kishore Surendra Kishore | Published On: May 22, 2017 08:02 AM IST | Updated On: May 22, 2017 08:02 AM IST

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जस्टिस कर्णन के बहाने जस्टिस वी.रामास्वामी पर महाभियोग चलाए जाने की कहानी

कोलकाता हाईकोर्ट के विवादास्पद जस्टिस सी.एस.कर्णन के बारे में तो जोर-शोर से यह कहा जा रहा है कि वह काॅलेजियम सिस्टम की देन हैं. पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी.रामास्वामी तो काॅलेजियम सिस्टम की देन नहीं थे जिनके खिलाफ 1991 में महाभियोग का प्रस्ताव आया था.

संसद ने उस पर 1993 में विचार भी किया. पर,राजनीतिक कारणों से रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पास नहीं हो सका था. हालांकि उन्हें बाद में इस्तीफा जरूर देना पड़ा. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के कोई भी जज उनके साथ बेंच में बैठने को तैयार ही नहीं थे.

यानी जिसे संसद ने सजा देने लायक नहीं समझा, उसे सुप्रीम कोर्ट ने इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया था. ठीक ही कहा गया है कि सिस्टम कोई भी हो, यदि उसे चलाने वाले ठीक नहीं होंगे तो वह ठीक से नहीं चलेगा.

सुप्रीम कोर्ट ने जजों को नियुक्त करने का अधिकार 1993 में लिया

भारतीय संविधान के बनकर तैयार हो जाने के बाद संविधानसभा के एक प्रमुख सदस्य ने भी यही बात कही थी.

रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग 1991 में आया और सुप्रीम कोर्ट ने जजों को नियुक्त करने का अधिकार अपने हाथ में 1993 में ले लिया. क्या सुप्रीम कोर्ट ने रामास्वामी प्रकरण को ध्यान में रखते हुए ही ऐसा किया था? पता नहीं.

इस मसले पर दोनों पक्ष अदालत की शरण में गए हैं

रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग 1991 में आया

याद रहे कि रामास्वामी को जज बनाने में भी भारी गड़बड़ियां हुई थीं. बाद में उन पर भ्रष्टाचार का भी आरोप लगा.

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रामास्वामी के वकील के रूप में महाभियोग प्रस्ताव पर कपिल सिब्बल ने छह घंटे तक लोकसभा में बहस की थी. दूरदर्शन पर उसे लाइव दिखाया गया था.

कपिल सिब्बल की प्रतिभा को पूरे देश ने पहली बार उसी केस में देखा था. लोकसभा में जस्टिस रामास्वामी के खिलाफ पेश महाभियोग प्रस्ताव ग्यारह मई 1993 को इसलिए गिर गया क्योंकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के 205 सदस्यों ने सदन में चर्चा के दौरान उपस्थित रहते हुए भी मतदान में हिस्सा ही नहीं लिया.

प्रस्ताव के पक्ष में मात्र 196 मत पड़े. ध्यान देने लायक बात यह रही कि महाभियोग प्रस्ताव के विरोध में एक भी मत नहीं पड़ा. यानी जिन सदस्यों ने मतदान में भाग नहीं लिया, वे लोग भी रामास्वामी के पक्ष में खड़े होने का नैतिक साहस नहीं रखते थे.

जानकार सूत्रों ने बताया कि कांग्रेस ने दक्षिण भारत के मतदाताओं के नाराज होने के भय से मत विभाजन में हिस्सा नहीं लिया.

कांग्रेस ने इस कमजोर तर्क के आधार पर मतदान के लिए कोई व्हीप जारी नहीं किया था कि ऐसे मामले में लोकसभा को अर्ध न्यायिक निकाय के रूप में काम करना पड़ता है और सदस्योें की हैसियत जज की होती है. ऐसे में जजों को व्हीप के रूप में निर्देश कैसे दिया जा सकता है ?

जानकार लोग बताते हैं कि रामास्वामी के महाभियोग से बच जाने के कारण भी बाद के वर्षों में अदालतों में भ्रष्टाचार बढ़े.

खरीददारी का काम जस्टिस रामास्वामी ने नहीं किया

मार्क्सवादी सांसद सोमनाथ चटर्जी द्वारा प्रस्तुत महाभियोग प्रस्ताव पर लोकसभा में 10 मई 1993 को सात घंटे तक बहस चली. कपिल सिब्बल ने  मुख्यत: यह बात कही कि खरीददारी का काम जस्टिस रामास्वामी ने नहीं बल्कि संबंधित समिति ने किया था.

लोकसभा में कपिल सिब्बल ने जोरदार तर्क पेश किया

लोकसभा में कपिल सिब्बल ने जोरदार तर्क पेश किया

लोकसभा में जब-जब कपिल सिब्बल ने कोई जोरदार तर्क पेश किया तो कांग्रेसी सदस्यों ने खुशी में मेजें थपथपाईं. विधि मंत्री हंस राज भारद्वाज टोका टोकी के बीच कपिल सिब्बल का ही पक्ष लेते रहे.

महाभियोग की विफलता के बाद सुप्रीम कोर्ट के अधिकतर साथी जजों ने रामास्वामी के साथ बेंच मेें बैठने से इनकार कर दिया. आखिरकार 14 मई 1993 को वी.रामास्वामी ने अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी.

उन्होंने यह भी कहा कि ‘लोकसभा में मेरे खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव के गिर जाने से मेरे दृष्टिकोण की पुष्टि हुई है. साथ ही भविष्य में निहित स्वार्थ वाले तत्वों द्वारा निंदा और उनके बेतुके हमले से निर्भीक और स्वतंत्र विचारों वाले न्यायाधीशों के सम्मान की रक्षा संभव हुई है.’

अब जरा उन आरोपों पर गौर करें. नवंबर 1987 और अक्टूबर 1989 के बीच पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में वी.रामास्वामी ने अपने आवास व कार्यालय के लिए सरकारी निधि से पचास लाख रुपये के गलीचे और फर्नीचर खरीदे.

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यह काम निविदा आमंत्रित किए बिना और नकली तथा बोगस कोटेशनों के आधार पर किया गया. दरअसल ये फर्नीचर खरीदे ही नहीं गये थे. पर कागज पर खरीद दिखा दी गई. यह खर्च राशि, खर्च की सीमा से बहुत अधिक थी.

जस्टिस रामास्वामी ने चंडीगढ़ में अपने 22 महीने के कार्यकाल में गैर सरकारी फोन काॅलों के लिए आवासीय फोन के बिल के 9 लाख 10 हजार रुपये का भुगतान कोर्ट के पैसे से कराया.

मद्रास स्थित अपने आवास के फोन के बिल का भी पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से भुगतान कराया. वह बिल 76 हजार 150 रुपये का था. इसके अलावा भी कई अन्य गंभीर आरोप वी.रामास्वामी पर थे.

जब बीजेपी ने भी वी.रामास्वामी के खिलाफ नोटिस दिया

रामास्वामी को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आतंकवादियों के खिलाफ मुकदमे निपटाने के लिए मुख्य न्यायाधीश बनवा कर चंडीगढ़ भेजा था. ऐसा संवेदनशील काम जिसके जिम्मे हो, उस पर ऐसा आरोप? पर उन्होंने वहां चीफ जस्टिस के रूप में भी आतंकवादियों के मुकदमों को लेकर कोई उल्लेखनीय काम नहीं किए. वे जब तक रहे टाडा के अभियुक्त धुआंधार जमानत पाते रहे.

फरवरी 1991 में राष्ट्रीय मोर्चा, वामपंथी दल और बीजेपी के 108 सांसदों ने मधु दंडवते के नेतृत्व में लोकसभा में वी.रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की नोटिस दी. तब रवि राय लोकसभा के स्पीकर थे.

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स्पीकर ने  इसकी सत्यता की जांच के लिए 12 मार्च 1991 को तीन जजों की समिति बना दी. सुप्रीम कोर्ट के जज पी.बी.सावंत के नेतृत्व में गठित इस न्यायिक समिति के सामने रामास्वामी ने अपना पक्ष रखने से इनकार कर दिया. सावंत समिति के अन्य सदस्य थे

बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पी.पी.देसाई और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ओ.चिनप्पा रेड्डी. पी.बी.सावंत समिति ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा था कि ‘जस्टिस वी.रामास्वामी ने अपने पद का जानबूझ कर दुरुपयोग किया.

पी.बी सावंत

पी.बी सावंत

महाभियोग प्रस्ताव गिर जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट में अजीब उलझनपूर्ण स्थिति पैदा हो गई थी. अंतत: रामास्वामी के इस्तीफे के बाद ही उलझन समाप्त हुई. सन् 1992 के दिसंबर में ही सावंत समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश कर दी थी. उसके बाद से ही सुप्रीम कोर्ट के एक जज आर.पांडियन को  छोड़कर कोई भी जज रामास्वामी के साथ एक बेंच में काम करने को तैयार ही नहीं हो रहे थे.

दरअसल कांग्रेस का रामास्वामी के साथ गहरा संबंध रहा. तब रामास्वामी का बेटा तमिलनाडु में कांग्रेस का विधायक था. कपिल सिब्बल तब भी कांग्रेस में ही थे.

रामास्वामी और विवाद का आपसी संबंध पुराना था. सन् 1971 में पहली बार एक ऐसे विवाद की खबर मद्रास से आई थी जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश ने अपने दामाद की सिफारिश करके उसे जज बनवा दिया.

वे नवनियुक्त जज यही वी.रामास्वामी ही थे. तब इस अनियमितता के कारण काफी बवाल हुआ था. 41 साल की उम्र में ही जब रामास्वामी  जज बने तो उनकी कोई निजी प्रैक्टिस नहीं थी. वकालत की डिग्री लेने के बाद रामास्वामी, सरकारी वकील वीरा स्वामी के साथ प्रशिक्षु वकील थे.

कांग्रेसी सांसद आर.प्रभु रामास्वामी के पक्ष में थे

कानूनी मामलों के देश के सधे हुए पत्रकार मनोज मिट्टा ने लिखा था कि ‘मद्रास हाईकोर्ट के जज के रूप में भी रामास्वामी का कार्यकाल विवादास्पद रहा. घर के पिछवाड़े वे 10 भैंसों वाली डेयरी चलाते थे जो उनकी व्यावसायिक बुद्धि का परिचायक था. सन् 1986 में उन्होंने फैसला करने के लिए एक ऐसा मामला चुना जिसमें उनकी पत्नी सरोजिनी भी एक पक्ष थी.’

रामास्वामी के खिलाफ जब लोकसभा में महाभियोग लाया जा रहा था तो तमिलनाडु के एक कांग्रेसी सांसद आर.प्रभु, रामास्वामी के पक्ष में नई दिल्ली के राजनीतिक हलकों में काफी सक्रिय थे.

पूर्व कांग्रेस सांसद आर प्रभू

पूर्व कांग्रेस सांसद आर.प्रभु

उन्होंने यह प्रचार अभियान चला रखा था कि रामास्वामी के खिलाफ यह ‘उत्तर भारतीय साजिश’ है. इसी आधार पर उन्होंने तमिलनाडु के सांसदों को गोलबंद भी कर लिया था. शायद तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव भी ऐसा ही चाहते थे.

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अब मद्रास हाईकोर्ट में जज के रूप में रामास्वामी ने किस तरह आर.प्रभु के पक्ष में एक फैसला किया था, उसकी कहानी मनोज मिट्टा से सुनिए,‘ अपने ही नायडु समुदाय से संबद्ध कुछ फैसलों को लेकर भी रामास्वामी को आलोचना झेलनी पड़ी.

समाचार पत्र ‘सिगप्पु नाडा’ को रामास्वामी के एक फैसले की आलोचना करने पर अदालत की फटकार सुननी पड़ी. फैसले में कहा गया था कि किसी कंपनी को बंद करने की कार्रवाई में श्रमिकों की राय जरूरी नहीं है. इस मामले से संबद्ध कंपनी कांग्रेसी सांसद आर.प्रभु के नायडु परिवार की थी.’

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