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जब जेपी के जुलूस पर पटना में इंदिरा ब्रिगेड ने चलाई थीं गोलियां

इस हिंसक घटना ने आंदोलन की आग में घी का ही काम किया

Surendra Kishore Surendra Kishore | Published On: Jun 05, 2017 07:52 AM IST | Updated On: Jun 05, 2017 07:52 AM IST

जब जेपी के जुलूस पर पटना में इंदिरा ब्रिगेड ने चलाई थीं गोलियां

पांच जून 1974 को पटना के बेली रोड पर सर्वोदय नेता जयप्रकाश नारायण के जुलूस पर इंदिरा ब्रिगेड के लोगों ने गोलियां चलायीं और बम फोड़े थे. बिहार के मजबूत होते जेपी आंदोलन में शामिल लोगों को आतंकित करने के लिए ऐसा किया गया था. इस घटना में कुछ लोग घायल भी हुए थे. जयप्रकाश नारायण को कोई चोट नहीं आई थी क्योंकि जेपी जुलूस के अगले हिस्से में थे. गोलियां पिछले हिस्से पर चलाई गयी थीं.

कांग्रेसी विधायक फुलेना राय के विधायक फ्लैट से इंदिरा ब्रिगेड के लोगों ने गोलियां चला दीं. इस सिलसिले में फुलेना राय और उनके कुछ समर्थक गिरफ्तार भी हुए थे. इस हिंसक घटना ने आंदोलन की आग में घी का ही काम किया.

यह घटना उस समय हुई जब जेपी एक जूलूस में बिहार के राज्यपाल आर. डी. भंडारे को ज्ञापन देकर लौट रहे थे. ज्ञापन पर एक करोड़ 37 लाख लोगों के दस्तखत थे. ज्ञापन में यह मांग की गई थी कि चूंकि बिहार विधानसभा ने अपनी उपयोगिता खो दी है, इसलिए इसे भंग करके दुबारा चुनाव होना चाहिए.

गैर कांग्रेसी दल के एक प्रमुख राष्ट्रीय नेता ने पटना में यह आरोप लगाया कि उन्हें यह सूचना मिली है कि जेपी पर गोलियां चलाने वालों को सरकार की तरफ से 10 लाख रुपए मिले थे.

उन दिनों ही यह खबर आई थी कि कांग्रेस के एक पूर्व सांसद इंदिरा ब्रिगेड के अध्यक्ष हैं. यह भी कहा जा रहा था कि तेलांगना आंदोलन को तोड़ने के लिए 4 दिसंबर 1970 को इंदिरा ब्रिगेड का गठन किया गया था.

हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष डा. शंकरदयाल शर्मा ने कहा था कि इस ब्रिगेड से पार्टी का कोई संबंध नहीं है. याद रहे कि उस दिन का जुलूस पटना के गांधी मैदान में पहुंच कर जनसभा में परिणत हो गया.

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जेपी ने  उस सभा के मंच से यह भी आशंका जाहिर की कि ‘पता नहीं आपसे यह मेरी अंतिम मुलाकात हो. क्योंकि यह सरकार जंगली हो गई है. किसी भी समय कुछ भी कर सकती है.’

महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और गलत शिक्षा नीति के खिलाफ बिहार के छात्रों और युवकों ने 18 मार्च 1974 को आंदोलन शुरू किया था. उस दिन पटना में विधानसभा के घेराव का कार्यक्रम था. बेचैन युवकों की उग्र भीड़ विधानमंडल भवन में जबरन घुसने की कोशिश करने लगी. उस पर पुलिस ने बल प्रयोग किया. भीड़ अनियंत्रित हो गई.

भीड़ में शामिल असामाजिक तत्वों को मौका मिल गया. पटना में बड़े पैमाने पर आगजनी, तोड़फोड़ और लूटपाट हुई. कर्फ्यू लगाना पड़ा.

इस घटना पर जेपी ने अपने बयान में कहा कि हिंसा और आगजनी से क्रांति नहीं होती.

आंदोलनकारियों के नेताओं ने जेपी से मुलाकात की. उनसे आग्रह किया कि वे आंदोलन का नेतृत्व करें. उन्होंने इस शर्त पर नेतृत्व करना मंजूर किया कि आंदोलन पूरी तरह अहिंसक होगा. शर्त मान ली गयी. इसी आंदोलन के सिलसिले में जेपी ने 5 जून को जुलूस का नेतृत्व किया था.

पर इंदिरा ब्रिगेड ने जुलूस पर गोलियां चला कर जेपी आंदोलन के प्रति लोगों का समर्थन अनजाने में बढ़ा दिया.

पांच जून की गांधी मैदान की उस सभा में जयप्रकाश नारायण ने छात्रों से आंदोलन के लिए उनका एक साल मांगा. साथ ही जेपी ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का आहवान किया. उन्होंने कहा कि हमारे आंदोलन का उद्देश्य संपूर्ण क्रांति है. इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तैयारी करनी होगी. छात्र स्कूल-कॉलेज छोड़कर एक साल तक आंदोलन में लग जाएं. क्रांति का लक्ष्य हासिल करने के लिए छात्र-युवक क्रांतिकारी चरित्र भी अपनाएं. याद रहे कि इस आह्वान का थोड़ा -बहुत असर भी हुआ.

विधानसभा को भंग करने की मांग का असर नहीं हुआ तो आंदोलनकारियों ने विधायकों के घेराव का कार्यक्रम चलाया.

जेपी का निर्देश था कि विधायकों का घेराव कर उनसे इस्तीफा मांगा जाए. उनके साथ कोई जोर जबर्दस्ती न हो.

इस्तीफे की मांग के समर्थन में आंदोलनकारियों ने विधानमंडल भवन के घेराव का कार्यक्रम शुरू किया. इस घेराव के दौरान एक दिन आंदोलनकारियों ने एक कांग्रेसी विधायक के साथ बिहार विधानसभा के गेट पर दुर्व्यवहार कर दिया. विधायक का कुर्ता फाड़ा गया. उनके खिलाफ भद्दे नारे लगाये गए और उन्हें रिक्शे से नीचे खींचने की कोशिश हुई.

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आंदोलनकारी चाहते थे कि वे विधानसभा की सदस्यता से तुरंत इस्तीफा लिख दें. जेपी को 13 जून की  इस घटना का पता चला तो उन्होंने 14 जून को ही इस घटना के लिए उस विधायक से क्षमा याचना करते हुए विधानसभा के तत्कालीन स्पीकर हरिनाथ मिश्र को पत्र लिखा. जेपी ने स्पीकर से यह भी आग्रह किया कि उनके पत्र को विधानसभा में पढ़कर सुना दिया जाए.

इस माफीनामे का अच्छा असर हुआ. आंदोलनकारी छात्र-युवक भी सावधान हुए. आंदोलन के विरोधियों को भी थोड़ा संतोष हुआ कि उनके साथ राह चलते बदसलूकी नहीं होगी.

यानी जिस संगठन ने जुलूस पर गोलियां चलाईं, उनके लोगों के साथ भी दुव्र्यवहार न हो, इसका ध्यान रखा था जेपी ने.

दूसरी ओर आम कांग्रेसियों की जेपी आंदोलन के प्रति क्या राय थी, उसकी एक झलक एक विधायक के इस बयान से मिलती है.

तत्कालीन कांग्रेसी विधायक प्रो. शंभु शरण ठाकुर ने आरोप लगाया था कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और एक भारतीय व्यापारी बिहार विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने के लिए विधायकों को पैसे का प्रलोभन दे रहे हैं.

ऐसे राजनीतिक तनाव के बीच जेपी आंदोलन बढ़ता गया. 25 जून 1975 को देश में आपातकाल की घोषणा हो गई. 1977 में जब लोकसभा का चुनाव हुआ तो केंद्र की सत्ता से कांग्रेस का सफाया हो गया.

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