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जब नेताओं को हार जीत से कोई फर्क नहीं पड़ता था..

तब राजनीति रोजगार या उद्योग नहीं थी बल्कि सेवा थी.

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Mar 06, 2017 07:48 AM IST

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जब नेताओं को हार जीत से कोई फर्क नहीं पड़ता था..

पचास और साठ के दशकों के अनेक नेता चुनावी हार को भी खेल भावना से स्वीकार कर लेते थे.

अब जमाना बदल गया है. राजनीति में पूंजी और वंशवाद के बढ़ते असर के इस दौर में चुनाव हारने पर कई नेताओं को ऐसा लगता है मानो उनका सोने का जहाज डूब गया.

स्वामी राम देव ने संभावना जताई है कि उत्तर प्रदेश चुनाव में इस बार कई दिग्गज हारेंगे. क्या वे भी पहले के नेताओं की तरह ही अपनी हार को खेल की भावना से स्वीकार करने के लिए अपने दिल को मना सकेंगे? पता नहीं.

हाल के दशकों में चुनावी हार-जीत को लेकर अधिकतर नेताओं की प्रतिक्रियाएं पूर्व अनुमानित लाइन पर ही होती रही हैं.

अधिकतर दल छप्परफाड़ जीत पर इतरा जाते हैं .सत्ता में आने के बाद गलत-सही काम करने लगते हैं. पर, हारने पर उसके लिए किसी और को जिम्मेदार ठहरा देते हैं.

उत्तर प्रदेश का चुनाव नतीजा आने के बाद इस बार भी यही सब होने की उम्मीद है.

बड़े-बड़े नेता भी चुनाव हारे हैं

कांग्रेस पार्टी जब कहीं कोई चुनाव जीतती है तो वह उसका श्रेय तुरंत अपने सर्वोच्च नेता को दे देती है. हारने पर संगठन को दोषी ठहरा दिया जाता है.

या फिर मीडिया के तथा कथित कुप्रचार को. साठ-सत्तर के दशकों में विदेशी शक्तियों को जिम्मेदार ठहराया जाता था.

डॉ.अंबेडकर, आचार्य नरेंद्र देव , मोरारजी देसाई ,दीन दयाल उपाध्याय सहित कई बड़े नेता समय-समय पर चुनाव हारे. पर हार को लेकर उनके तर्क आज के नेताओं जैसे नहीं थे

Ram Manohar Lohia

डॉ.राम मनोहर लोहिया ने तो 1962 में हारने के लिए ही चुनाव लड़ा था. डॉ.लोहिया ने अपने दल के प्रचार के लिए फूलपुर में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़ा था.

डॉ.लोहिया उससे पहले 1957 का चुनाव भी चंदौली में कांग्रेस के त्रिभुवन नारायण सिंह से हार चुके थे. फिर भी तब उन्हें लोकसभा में जाने की कोई जल्दीबाजी नहीं थी.

लोकसभा में जाने से पहले वे अपने दल और उसके सिद्धांतों से लोगों को अवगत कराना चाहते थे. यदि कोई प्रधानमंत्री के खिलाफ चुनाव लड़ेगा तो जाहिर है कि उसके दल का मुफ्त में प्रचार हो जाएगा.

नरेंद्र देव ने कांग्रेस से दिया था इस्तीफा

आचार्य नरेंद्र देव ने जब 1947 में कांग्रेस पार्टी छोड़ी तो उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया. उनके साथ ही उनकी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े अन्य विधायकों ने भी सदन की सदस्यता से इस्तीफा दिया था.

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आचार्य नरेंद्र देव (बाएं)

खाली हुई सीटों से आचार्य जी के साथ-साथ वे भी उप चुनाव लड़े. आचार्य नरेंद्र देव सहित सभी हारे. पर इसका उन्हें कोई अफसोस नहीं था. क्योंकि वे पद की नहीं बल्कि सिद्धांत और नैतिकता की राजनीति करते थे.

इस्तीफा देने की उनकी कोई मजबूरी भी नहीं थी. फिर उन्होंने इस्तीफा भी दिया. आजादी की लड़ाई के दिनों कांग्रेस के भीतर ही रह कर आचार्य नरेंद्र देव की कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी काम कर रही थी.

कांग्रेस के टिकट पर ही ‘सोशलिस्ट कांग्रेसी’ चुनाव लड़ते थे. पर आजादी के बाद कांग्रेस ने कहा कि दोहरी सदस्यता अब नहीं चलेगी. फिर आचार्य जी तथा अन्य कांग्रेस से अलग हो गए.

मोरारजी देसाई भी चुनाव हार चुके थे

मोरारजी देसाई 1952 के आम चुनाव में बंबई विधानसभा का चुनाव हार गए थे. उनके योगदान को देखते हुए हार के बावजूद विधायकों ने देसाई को नेता चुना और वे मुख्यमंत्री बने. बाद में मोरारजी उप चुनाव में जीत कर विधायक बने थे.

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डॉ. भीमराव अंबेडकर

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डॉ. अंबेडकर 1952 में उत्तरी बंबई से लोकसभा चुनाव हारे. 1954 में वह भंडारा से लोकसभा उप चुनाव भी हार गए.

कल-बल-छल से दूर थे तब नेतागण

विनोदानंद झा बिहार के एक बड़े नेता व स्वतंत्रता सेनानी थे.1937 की सरकार में वे संसदीय सचिव थे. 1961 में बिहार के मुख्यमंत्री भी बने थे. पर वह 1952 में विधानसभा चुनाव हार गए थे.

उन दिनों के अधिकतर नेता आम तौर पर चुनाव जीतने के लिए ‘कल-बल-छल’ के इस्तेमाल से दूर ही रहते थे. यह तो आज का चलन है. तब राजनीति रोजगार या उद्योग नहीं थी. बल्कि सेवा थी. अपवादों की बात और है.

दीन दयाल उपाध्याय ने भी देखा हार का मुंह

दीन दयाल उपाध्याय 1963 में जौन पुर से लोकसभा का उप चुनाव लड़ रहे थे. उससे पहले 1962 में अशोक मेहता देवरिया में लोकसभा का चुनाव हार गए थे.

उपाध्याय जी चुनाव हार गए थे. जीतने के लिए उन्हें सिर्फ जातीय तत्वों के समक्ष अपना सिर झुकाना था. इसके लिए वे तैयार नहीं थे.

आज तो अधिकतर उम्मीदवार सामान्यतः इस तरह की बुराइयों का सहारा लेते हैं. इसके बावजूद जब वे हारते हैं तो उन्हें बहुत दुःख होता है. उन्हें लगता है कि उनका राजनीतिक जीवन ही खतरे में पड़ गया. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि आज का लोकतंत्र सिर्फ चुनावी जनतंत्र बन कर रहा गया है.

सत्ता परिवर्तन के संकेत उत्तर प्रदेश से मिल रहे हैं. यदि संकेत सही हैं तब तो अनेक बड़े नेताओं की हार सुनिश्चित है. फिर तो उनके दुःख की कल्पना की ही जा सकती है

कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज को 1967 में एक छात्र नेता ने हरा दिया था पर वे आज के नेताओं की तरह दुःखी नहीं हुए.

कई बड़े नेता चुनाव हारे

1971 में जब इंदिरा गांधी के पक्ष में चुनावी हवा बही तो प्रतिपक्ष के अनेक बड़े नेता धराशायी हो गए. सत्तर के दशक में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भी त्रिभुवन नारायण सिंह मणिराम क्षेत्र में विधानसभा उप चुनाव हार गए.

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AtalBihariVajpayee

1984 की कांग्रेसी आंधी में तो अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये ,हेमवती नंदन बहुगुणा और कर्पूरी ठाकुर भी लोकसभा का चुनाव हारे.

कर्पूरी के जीवन की वह पहली चुनावी हार थी. एस.के.पाटिल को 1967 में हरा कर जाइंट कीलर बने जार्ज फर्नांडिस 1984 में बंगलोर में लोकसभा चुनाव बुरी तरह हारे.

1977 चुनाव में तो अनेक ‘राजनीतिक बरगद’ गिर गए थे. इंदिरा गांधी सहित ऐसे नेता भी हारे जिनकी हार के बारे में किसी ने कभी सोचा तक नहीं था.

1988 के इलाहाबाद के लोकसभा उप चुनाव में बोफोर्स की हवा में कांसी राम, वी.पी.सिंह से हार गए थे. इस देश में चुनावी हार की इस तरह की अन्य अनेक घटनाएं हो चुकी हैं.

हार की इन कहानियों की पृष्ठभूमि में उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश के अगले चुनाव में पराजित होने के बावजूद बड़े नेता भी अपनी हार को खेल की भावना से ही लेंगे.

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