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जलियांवाला बाग नरसंहार ने बदल दिया था नेहरू परिवार का जीवन

जलियांवाला बाग की घटना ने नेहरू परिवार के लिए रातोंरात सब कुछ बदल कर रख दिया

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Jun 19, 2017 12:57 PM IST

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जलियांवाला बाग नरसंहार ने बदल दिया था नेहरू परिवार का जीवन

जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 को हुए भीषण नरसंहार ने नेहरू परिवार का जीवन प्रवाह ही बदल दिया था. इसी दर्दनाक घटना के बाद आजादी की लड़ाई में शामिल होने को लेकर परिवार की दुविधा समाप्त हो गई थी.

उससे पहले जवाहरलाल नेहरू तो आजादी की लड़ाई में शामिल होने को बेताब थे, लेकिन मोतीलाल नेहरू का मानना था कि ‘मुट्टी भर लोगों के जेल चले जाने से देश गुलामी से मुक्त नहीं हो सकता.’

इस सवाल पर पिता-पुत्र में जारी मतभेद को दूर करने के लिए गांधीजी को इलाहाबाद बुलाया गया था. मोतीलाल ने उन्हें बुलाया था. पर गांधीजी नहीं चाहते थे कि इस सवाल पर पिता-पुत्र में मनमुटाव हो. उन्होंने कहा कि जवाहरलाल को जल्दीबाजी में कोई फैसला नहीं करना चाहिए.

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यह कहकर गांधीजी रॉलेट एक्ट के खिलाफ जारी अपने आंदोलन को गति देने के लिए इलाहाबाद से दिल्ली चले गए. इस संबंध में जवाहरलाल नेहरू की बहन कृष्ण हठी सिंह ने विस्तार से लिखा है.

'जलियांवाला बाग में निहत्थी और निरीह जनता के इस कत्लेआम ने पिताजी के विचारों में आमूल परिवर्तन कर दिया. वह गांधी के प्रबल प्रशंसक और जवाहर के मत के अनुकूल हो गए. उनका विचार परिवर्तन इतने नाटकीय ढंग से हुआ कि वह अच्छी चलती वकालत पर लात मार कर जी जान से राजनीति में कूद पड़े. इतना ही नहीं इस घटना ने हमारे परिवार का जीवन प्रवाह ही बदल कर रख दिया. कहां तो हमारे खाने के टेबल पर बढ़िया किस्म के देसी-विदेशी भोजन के दौर चलते थे और कहां अब बहुत ही सादगीपूर्ण भोजन थालियों में परोसा जाने लगा.'

पिता मोतीलाल नेहरू के साथ जवाहर लाल नेहरू

पिता मोतीलाल नेहरू के साथ जवाहर लाल नेहरू

गांधी जी मोतीलाल नेहरू के बुलावे पर उनसे मिलने गए थे

वह आगे लिखती हैं, 'चार-छह कटोरियों में सालन, दाल, एक-दो सब्जियां, दही, अचार और चटनी के साथ चपातियां या पराठे, चावल और अंत में एक मिठाई बस, यही भोजन था. अब न वह गपशप होती थी और न ही हंसी-मजाक. वकालत छोड़ देने से पिताजी की भारी आय भी बंद हो गई थी. नौकरों की तादाद एकदम घटा दी गई.'

'बिल्लौरी कांच और चीनी मिट्टी के बढ़ियां बर्तन, अस्तबल के उम्दे घोड़े और कुत्ते तथा तरह- तरह की उत्तम किस्म की शराबें आदि सभी विलासिता की सामग्री बेच दी गई.'

'अम्मा और कमला के पास बहुत से कीमती गहने थे- अंगुठियां, बालियां, कर्णफूल, हार, कंगन, कांटे और सभी सोने, हीरे मोती, माणिक पन्ना जड़े हुए. अपने लिए मामूली गहने रखकर अम्मा और कमला बाकी सब बेचने के लिए राजी हो गईं.'

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'पिता जी ने अपना मकान कांग्रेस को भेंट कर दिया. वह ‘स्वराज्य भवन’ कहलाया. हम लोगों के लिए बना नया और छोटा मकान ‘आनंद भवन’ कहलाया. शुरू में तो मुझे हाथ से कती खादी से बनी साड़ी पहनना जरा भी नहीं सुहाता था. मैं नाक-भौं सिकोड़ती थी. मगर धीरे-धीरे अभ्यस्त हो गई.'

जलियांवाला बाग की घटना ने कितना फर्क डाल दिया था? इस बात का पता मोतीलाल-गांधी संवाद से चल जाता है. वह संवाद इलाहाबाद में हुआ था. तब गांधीजी मोतीलाल के बुलावे पर पहली बार वहां गए थे.

लंबी चर्चाओं के दौरान मोतीलाल नेहरू और गांधीजी ने देश की समस्याओं के अपने-अपने हल प्रस्तुत किए. उनकी चर्चा जवाहरलाल नेहरू पर केंद्रित थी. मोतीलाल नेहरू ऐसे अकाट्य तर्क की खोज में थे जिससे जवाहर को सत्याग्रह, सभा में शामिल होने से रोका जा सके. दरअसल इसीलिए गांधी को उन्होंने अपने यहां बुलाया था. चूंकि गांधी जी पिता-पुत्र में मनमुटाव नहीं चाहते थे, इसीलिए वह मोतीलालजी की बात से सहमत हो गए थे.

पर जलियांवाला बाग की घटना ने नेहरू परिवार के लिए रातोंरात सब कुछ बदल कर रख दिया. अब जलियांवाला बाग की जालिमाना घटना के बारे में कुछ बातें.

डायर ने जलियांवाला बाग पहुंचते ही गोलियां चलानी शुरू कर दी थी

इस घटना की जांच के लिए लॉर्ड विलियम हंटर की अध्यक्षता में समिति बनाई गई थी. लॉर्ड हंटर ने डायर से पूछा कि जब आप बाग में गए तो आपने सबसे पहला काम क्या किया? डायर ने कहा कि मैंने गोलियां चलाईं.

हंटर ने पूछा कि क्या आपने पहुंचते ही तुरंत गोलियां चलानी शुरू कर दी थीं? डायर ने बेहिचक कहा- हां, तुरंत. मैंने इस बारे में सब सोच विचार कर लिया था. मेरी ड्यूटी क्या है, यह तय करने में मुझे तीस सेकेंड से कुछ ही ज्यादा समय लगा.

General Dyer

हंटर ने डायर से पूछा कि क्या आपको उस समय इस बात का ख्याल नहीं आया कि उपयुक्त यह होता कि फायरिंग करने से पहले आप भीड़ को तितर-बितर होने के लिए कहते ?

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इस पर डायर ने कहा कि मैंने ऐसा नहीं किया. मैंने इतना ही महसूस किया कि मेरे आदेश का उल्लंघन किया गया और मार्शल लॉ को तोड़ा गया. इसलिए तुरंत गोली चलाना मेरी ड्यूटी थी.

जब डायर से यह सवाल किया गया कि क्या फायरिंग का उद्देश्य भीड़ को तितर-बितर करना था ,उसने कहा कि नहीं श्रीमान, मुझे तो भीड़ छंटने तक गोली चलाते जाना था. पूछा गया कि जब भीड़ छंटने लगी तो आपने फायरिंग बंद क्यों नहीं की? डायर ने कहा कि भीड़ के पूरी तरह छंटने तक फायरिंग जारी रखना मेरी ड्यूटी थी. हंटर आयोग ने डायर के कृत्य की निंदा की. उसे पद से हटा दिया गया.

इस घटना पर रवींद्रनाथ टैगौर ने नाइटहुड की उपाधि लौटा दी थी. याद रहे कि उस हृदयविदारक घटना में खुद अंग्रेजी सरकार के अनुसार 379 लोग मरे और 1200 लोग घायल हुए थे. पर अन्य सूत्रों के अनुसार मृतकों की संख्या करीब एक हजार थी.

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