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छप्परफाड़ चुनावी जीत के बाद भी जब-जब सावधानी हटी, दुर्घटना घटी!

गरीबी हटाओ के नारे के बल पर इंदिरा गांधी ने 1971 में लोकसभा की 352 सीटें जीती थीं

Surendra Kishore Surendra Kishore | Published On: Mar 20, 2017 07:57 AM IST | Updated On: Mar 20, 2017 07:57 AM IST

छप्परफाड़ चुनावी जीत के बाद भी जब-जब सावधानी हटी, दुर्घटना घटी!

उत्तर प्रदेश में बीजेपी की छप्परफाड़ चुनावी जीत के बाद कुछ पिछली ऐसी ही जीतें याद आती हैं. उनमें से अधिकतर मामलों में जब भी किसी सत्ताधारी दल को सत्ता के मद ने घेरा, अगले चुनाव में वह दल राजनीतिक व चुनावी तौर पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया.

उसका सबसे बड़ा उदाहरण 1984 का लोकसभा चुनाव था. तब कांग्रेस को लोकसभा में 404 सीटें मिली थीं. पर अगले पांच साल तक सत्ताधारी दल से ऐसी -ऐसी गलतियां हुई कि 1989 के लोकसभा चुनाव में सत्ता उसके हाथ से निकल गई. सीटों की संख्या 404 से घटकर 197 हो गई.

1983 में आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में मशहूर फिल्मी हस्ती एन.टी.रामा राव के दल ने कुल 294 में से 202 सीटें जीत ली थीं. कांग्रेस को तब सिर्फ 60 सीटें ही मिल सकी थीं.

जीते के बाद भी हार हो सकती है

एन.टी.रामाराव से जब यह पूछा गया कि ऐसे कैसे हो गया तो उन्होंने कहा था कि कांग्रेसकर्मी हर प्रकार की बुराइयों के आदी हो चुके थे. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर इशारा करते हुए रामा राव ने कहा था कि कोई चाहे जितना भी लोकप्रिय क्यों न हो, यदि वह जनता का काम भूल जाएगा तो उसे जाना ही पड़ेगा.

इस देश की राजनीति की विडंबना है कि यही फार्मूला कुछ साल के बाद खुद एन.टी.आर. पर भी लागू हो गया. एक नाटकीय परिस्थिति में उन्हें भी सत्ता से हटना पड़ा.

Indira Gandhi

जयप्रकाश आंदोलन ने इंदिरा सरकार की नींव हिला दी थी

इससे पहले इंदिरा गांधी के नेतत्व वाली कांग्रेस पार्टी ने सन 1971 के लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत से विजय हासिल की थी. उसके बाद तो उन्होंने राज्यों में अपनी पसंद का मुख्यमंत्री थोपना शुरू कर दिया.

अन्य कई तरह के काम हुए जिन कामों में सर्वोदय नेता जयप्रकाश नारायण को भी एकाधिकारवाद की बू आई. नतीजतन बिहार में आंदोलन शुरू हुआ जो देश के दूसरे हिस्सों में भी फैला और फिर बौखलाई इंदिरा सरकार ने 1975 में देश में आपातकाल लगा दिया. आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में इदिरा गांधी सत्ता से बाहर हो गईं.

कभी कांग्रेस भी जीती थी 352 सीटें

याद रहे कि गरीबी हटाओ के नारे के बल पर इंदिरा गांधी ने 1971 में लोकसभा की 352 सीटें जीती थीं. जबकि 1967 में कांग्रेस को सिर्फ 283 सीटें ही मिल सकी थीं. पर इंदिरा गांधी इस जनादेश का सम्मान नहीं कर सकीं. बल्कि आरोप लगा कि उन्होने जनादेश का अपमान किया.

इस घटना से देश की पूरी राजनीति को सबक लेना चाहिए था, पर खुद जनता पार्टी के नेता भी इंदिरा गांधी से सबक नहीं ले सके. जनता ने जनता पार्टी को 1977 के लोकसभा चुनाव में 295 सीटें दी थीं.

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हार के बाद शानदार जीत हासिल की थी कांग्रेस ने

कुछ अन्य सीटें भी उसके सहयोेगी दलों को मिली थीं. पर 1977 में सत्तासीन हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की कई मामलों में जिद और चरण सिंह तथा जग जीवन राम की पदलोलुपता ने समय से पहले ही ‘जनता प्रयोग’ को विफल कर दियां.

लालू भी बने थे पिछड़ों के मसीहा फिर भी हार हुई ना

सन् 1991 में इसी तरह की भारी चुनावी सफलता बिहार में मिली थी. सन् 1991 में जनता दल को देश भर में लोकसभा की 59 सीटों पर विजय मिली थी जिसमें सबसे बड़ा येागदान बिहार से था.

बिहार में जनता दल को 54 में से 32 सीटें मिली थीं. मंडल आरक्षण के कारण जो विवाद पैदा हुआ था, उसी के कारण लालू प्रसाद पिछड़ों में लोकप्रिय हुए थे. लालू प्रसाद ने मंडल आरक्षण के विरोधियों का उनसे भी ज्यादा तगड़ा विरोध करके पिछड़ों का दिल जीत लिया था.

Lalu Yadav

पिछड़ी जातियों पर लालू ने सबसे ज्यादा ध्यान दिया

पर वे पिछड़ों की उम्मीदों पर जब खरे नहीं उतरे तो धीरे-धीरे पिछड़ों के एक हिस्से ने भी उनका साथ छोड़ना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे उनकी राजनीतिक ताकत घटती चली गई .उसका लाभ नीतीश कुमार और बीजेपी को मिला.

देश के कुछ अन्य हिस्सों में भी जनादेश का उल्लंघन करने वाले नेताओं को बारी-बारी से चुनावी झटके मिलते रहे हैं. तमिलनाडु इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है. वहां की दो प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं.उन्हें पिछले शासक की कमजोरियों का लाभ मिलता रहता है.

पर उन कमजोरियों का लाभ उठाने के बावजूद नया शासक पिछले दल की हार से कोई सबक नहीं सीखता. डी.एम.के बनाम ए.आई. डी.एम.के. के बीच राजनीतिक मैच दसियों साल से वहां चल रहा है.

वाम सरकार को हटाना लगता था नामुमकिन

कभी लगता था कि बंगाल की वाम सरकार कभी सत्ता से हटेगी ही नहीं. पर उसके अहंकार और कुशासन ने उसे भी ले डूबा. हालांकि अब उसी तरह के आरोप तृणमूल कांग्रेस की सरकार पर भी लगाए जा रहे हैं.

इसके विपरीत केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार जनता से किए गए वायदों को पूरा करने की भरसक कोशिश कर रही है. इसलिए उसकी लोकप्रियता घट नहीं रही है.

उम्मीद की जानी चाहिए कि उत्तर प्रदेश की नई सरकार भी जनोपयोगी काम करेगी ताकि उस समस्याग्रस्त राज्य को विकट स्थितियों से बाहर निकाला जा सके.

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