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कांग्रेस को भी एक ‘मोदी’ चाहिए

कांग्रेस पार्टी को निराशा से निकालने के लिए नरेंद्र मोदी जैसा ही नेता चाहिए

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Mar 16, 2017 09:02 PM IST

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कांग्रेस को भी एक ‘मोदी’ चाहिए

2009 का लोकसभा चुनाव हो रहा था. यूपीए-1 का कार्यकाल समाप्त हो चुका था. पर्याप्त एंटी इंकंबैंसी थी. सबको लग रहा था कि ये सरकार तो गई. बीजेपी ने देशभर में चुनाव अभियान चलाया था सरकार के खिलाफ. लाल कृष्ण आडवाणी ने काले धन के खिलाफ देशभर में यात्रा निकाली थी.

मुझे याद है बिहार के बक्सर जिले के किला मैदान में लाल कृष्णा आडवाणी का कार्यक्रम था. वहां पर अपने भाषण के दौरान आडवाणी का जोर इस बात पर था कि देश के विकास में बड़ी बाधा काला धन है.

उन्होंने भरोसा दिलाया कि अगर उनकी सरकार आती है तो काले धन को लाने के लिए पूरे इंतजाम करेगी जिससे देश के लोगों की मेहनत का पैसा वापस आ सके. सब तरफ आडवाणी की इस यात्रा की चर्चा भी हो रही थी. लोग कह रहे थे कि आडवाणी कुछ कमाल करेंगे.

आडवाणी ने लगाया था पूरा जोर

एल.के.आडवाणी (Photo. PTI)

आडवाणी के पूरा जोर लगा देने के बावजूद जब नतीजे आए तो एनडीए को सिर्फ 159 सीटें ही मिलीं.

अब इससे आगे आइए 2014 के लोकसभा चुनावों में. इस बार पार्टी के अगुवा थे नरेंद्र मोदी. इस चुनाव में भी काला धन बड़ा मुद्दा था.

मोदी ने भी एक जबरदस्त कैंपेन इसके विरोध में चलाया था. हालांकि सत्ता में कांग्रेस के दस साल गुजर जाने के बाद भी अच्छे से अच्छे राजनीतिक समीक्षक बीजेपी को पूर्ण बहुमत नहीं दे रहे थे.

लेकिन चुनाव नतीजों ने देश के राजनीतिक इतिहास की तस्वीर ही बदल दी. बीजेपी अकेले दम बहुमत लेकर आई. सारी समीक्षाएं धरी की धरी रह गईं.

अब ऐसा नहीं है कि नरेंद्र मोदी को राजनीति की समझ लाल कृष्ण आडवाणी से ज्यादा थी या फिर उन्होंने राजनीतिक बसंत ज्यादा देखे थे लेकिन वोट खींचने की जो कला मोदी में है वो समकालीन या पुरानी भारतीय राजनीति में शायद ही किसी नेता के पास हो. मोदी रैली में उमड़े लोगों को वोटों में तब्दील करने की कला वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में किसी भी दूसरे भारतीय राजनेता से बेहतर तरीके से जानते हैं.

अब आते हैं कांग्रेस की बात पर. पांच राज्यों के चुनाव में भले ही कांग्रेस यूपी और उत्तराखंड में हारी हो लेकिन पंजाब में उसने प्रचंड बहुमत से सत्ता हासिल की तो मणिपुर और गोवा में सिंगल लारजेस्ट पार्टी बनकर आई. मणिपुर में तो पार्टी बीते 15 सालों से सत्ता में थी ऐसे में ये नतीजे इतने भी बुरे नहीं हैं. लेकिन कांग्रेस ऐसा महसूस करा रही है जैसे उसका सबकुछ लुट गया हो.

पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह और मणिपुर में ओकराम इबोबी सिंह जैसे नेताओं ने ये दिखाया है कि कितनी भी लहर हो अपनी राजनीतिक छवि के जरिए उसे टाला जा सकता है.

दरअसल कांग्रेस पार्टी को बीजेपी के ही दो बड़े नेताओं से सीख लेने की जरूरत है कि कैसे एक ही मुद्दे को उठाकर दोनों ने अलग-अलग नतीजे पाए.

नरेंद्र मोदी 2014 में पीएम बने थे. और उसके बाद लगभग तीन सालों होने को हैं लेकिन यूपी चुनाव के पहले तक भी शायद ही ऐसा कोई निर्णय दिख रहा था जिसकी वजह से ऐसा लगे कि कोई जनता पर बहुत असर पड़ा हो. लेकिन जब चुनाव प्रचार की बारी आई तो किसी भी जगह ऐसा नहीं लगा कि विपक्षी पार्टियां किसी भी स्तर पर मोदी को घेर पा रही हों. मोदी ने इन चुनावों में एक बात और सिद्ध की है और वह है कि चुनाव सिर्फ वादों से नहीं बल्कि इरादों से जीते जाते हैं.

अपनी धुन में लगे रहे मोदी 

Modi-UPElection

मोदी जब यूपी चुनाव प्रचार में व्यस्त थे तब उन्हें भी बिहार और दिल्ली के नतीजों की याद तो आ ही रही होगी. मीडिया में भी गाहे-बगाहे इसकी चर्चा हो जाती थी. लेकिन मोदी अपनी धुन में लगे रहे. नतीजे सबके सामने हैं.

ऐसे में कांग्रेस पार्टी को भी नरेंद्र मोदी की तरह ही एक ऐसे जुझारू नेता की जरूरत है जो जीत-हार विरत होकर बस अपनी धुन में जनता के बीच लगा रहे. जिसे ये भरोसा हो कि जनता उसकी बातों पर भरोसा करेगी. एक ऐसा नेता जो चुनाव के बीच भी वोटों की धारा मोड़ने में सक्षम हो. लेकिन दुखद रूप से कांग्रेस में दूर-दूर तक अभी कोई ऐसा नेता दिखाई नहीं देता.

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