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चीन के राजदूत से मुलाकात पर हां-ना कांग्रेस के दिशाहीन होने का संकेत

शायद राहुल की समस्या मुलाकात के समय को लेकर रही होगी

Sanjay Singh Updated On: Jul 11, 2017 01:18 PM IST

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चीन के राजदूत से मुलाकात पर हां-ना कांग्रेस के दिशाहीन होने का संकेत

चीन के राजदूत से मुलाकात पर कांग्रेस की कभी-हां-कभी-ना से एक बार फिर संकेत मिलता है कि हाल के दिनों में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व कितना दिशाहीन हो गया है. राहुल गांधी से संबंधित मामलों पर भी उसे पता नहीं होता है कि सार्वजनिक तौर पर क्या रुख अपनाया जाए.

कांग्रेस ने पहले चीन के राजदूत लू झाओहुई से राहुल गांधी की मुलाकात से इनकार किया. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले पार्टी के कम्यूनिकेशन डिपार्टमेंट के प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला इस खबर को 'फर्जी' बताया और जिन टीवी चैनलों ने इस खबर को प्रसारित किया था उन्हें 'भक्त' करार दिया. लेकिन दोपहर तक पार्टी ने मजबूर होकर शर्मनाक यू-टर्न लिया और चीन के राजदूत के साथ राहुल की मुलाकात को एक 'सामान्य शिष्टाचार बैठक' बताया. यह एक तरह से सेल्फ गोल था.

रणदीप सुरजेवाला ने ही मुलाकात की पुष्टि की

विडंबना यह है कि ऐसी किसी मुलाकात को सार्वजनिक तौर पर सुबह नकारने वाले पार्टी के नेता रणदीप सुरजेवाला ने ही दोपहर में इस खबर की पुष्टि की. दो विरोधाभासी रुख अपनाने के बावजूद सुरजेवाला पूरी तरह बेफिक्र नजर आए, या फिर उन्होंने कम से कम टीवी कैमरों पर ये जाहिर नहीं होने दिया कि उन्हें मुंह की खानी पड़ी है.

ये सब नई दिल्ली में चीनी दूतावास की आधिकारिक वेबसाइट पर 9 जुलाई को प्रकाशित एक सामान्य तथ्यात्मक पोस्ट के साथ शुरू हुआ, जिसमें कहा गया था कि, '8 जुलाई को राजदूत लू झाओहुई ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की और चीन और भारत के मौजूदा संबंधों पर विचार विमर्श किया.'

लेकिन जैसे ही कुछ समाचार चैनलों पर यह खबर हेडलाइन बनी, राहुल गांधी को कुछ कारणों से चीनी राजदूत के साथ अपनी बैठक का खुला प्रचार पसंद नहीं आया. इसके बाद कांग्रेस के प्रवक्ता पूरी ताकत के साथ खबर को नकारने में जुट गए.

राजनीतिक दलों के कामकाज के तरीके को समझने वाले जानते होंगे कि पार्टी प्रवक्ता किसी खबर को 'प्लांट' और 'फर्जी' और जिन चैनलों ने उसे प्रसारित किया उन्हें भक्त करार देने की तब तक हिम्मत नहीं करेंगे जब कि राहुल गांधी अथवा उन्हीं के जैसी हैसियत वाला कोई व्यक्ति उसे मंजूरी न दे.

ये भी पढ़ें: चीनी राजदूत से राहुल की मुलाकात: 'कभी ना, कभी हां' से हुई कांग्रेस की फजीहत

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कुछ ही घंटों में यू-टर्न

इसी तरह कुछ ही घंटों में यू-टर्न लेने और पूरी तरह पलट जाने का फैसला भी ऊपर से ही लिया गया होगा. पार्टी के प्रवक्ता इतने बड़े और इतना शर्मसार करने वाला फैसला खुद लेने का जोखिम नहीं उठा सकते.

यह तथ्य पूरे मसले को और रहस्यमय बना देता है कि कांग्रेस के लू झाओहुई के साथ राहुल गांधी की बैठक से इनकार करने के बाद चीनी दूतावास ने अपनी वेबसाइट से उस पोस्ट को हटा दिया.

राहुल की चीन के राजदूत से मुलाकात की पुष्टि करने से कुछ घंटे पहले सुरजेवाला ने सुबह क्या कहा था, जरा उसे देखें:

'भक्त बनने की चाहत रखने वाला चैनल चीन की यात्रा पर गए 3 केंद्रीय मंत्रियों अथवा जी-20 की बैठक में प्रधानमंत्री की (चीन की राष्ट्रपति के प्रति) गर्मजोशी और तारीफ पर सवाल नहीं उठाएगा. लेकिन फर्जी खबरें दिखाएगा.'

'विदेश मंत्रालय और आईबी सूत्रों को ‘भक्तों’ में खबरें प्लांट करने से पहले ये पुष्टि कर लेनी चाहिए कि सभी पड़ोसी देशों के साथ अब भी हमारे राजनयिक संबंध हैं.'

कांग्रेस को एहसास नहीं है कि दोपहर में दिए गए उसके बहादुरी भरे बयान, 'चीन के राजदूत के साथ राहुल गांधी की बैठक में क्या गलत है'और हाल ही में द्विपक्षीय संबंध बढ़ाने के लिए चीन गए केंद्रीय मंत्रियों के नाम गिनाने से उसकी दाल नहीं गलने वाली है.

आखिरकार ‘भक्तों’ की 'फर्जी' खबर की पुष्टि कर कांग्रेस ने खुद का मजाक तो बनाया ही और अपने नेता के साथ भी बेहद बुरा किया. शायद राहुल की समस्या मुलाकात के समय को लेकर रही होगी. उन्होंने 7 जुलाई को 2 बजकर 11 मिनट पर नरेंद्र मोदी को मजाक उड़ाया था, 'चीन पर हमारे प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं?'

अगले दिन भारत-चीन सीमा पर जारी टकराव के बीच जब कुछ चीनी अधिकारी भारत को गंभीर परिणाम भुगतने का बेतुका बयान दे रहे हों तो कांग्रेस उपाध्यक्ष ने चीनी राजदूत से मुलाकात की. वैसे, राहुल ने चीन के राजनयिक से मिलकर कुछ भी गलत नहीं किया है.

भारत-चीन के संबंधों की खूबी यही है कि सीमा पर तनाव और दोनों पक्षों के परस्पर विरोधी रुख के बावजूद सीमा पर गोली नहीं चली है और राजनयिक और व्यापार जैसे दूसरे द्विपक्षीय संबंध सामान्य रूप से जारी हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने जी-20 और ब्रिक्स की बैठक के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात भी की. बहरहाल, सिर्फ राहुल गांधी ही बता सकते हैं कि वे चीन के राजदूत के साथ अपनी मुलाकात को इतना गोपनीय क्यों रखना चाहते थे. उन्होंने पहले इससे इनकार क्यों किया और जब उनकी पार्टी के अजीब रुख से विवाद खड़ा हो गया तो उन्होंने मुलाकात की पुष्टि करने का फैसला क्यों किया. कोई नहीं जानता कि इस बैठक में क्या बात हुई.

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ऐसी ही बैठक राहुल और अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर के बीच हुई थी

यह जानना दिलचस्प होगा कि कुछ साल पहले एक ऐसी ही बैठक राहुल और अमेरिका के राजदूत टिमोथी रोमर के बीच हुई थी और जब विकीलीक्स ने दोनों के बीच ही बातचीत के मजमून को उजागर किया तो देश की राजनीति में खूब बवाल हुआ था.

दिसंबर 2010 में विकीलीक्स ने खुलासा किया कि कांग्रेस उपाध्यक्ष ने नई दिल्ली में तत्कालीन अमेरिकी राजदूत के साथ बैठक में कहा कि हिंदू उग्रवादी समूह मुस्लिम उग्रवादियों की तुलना में देश के लिए बड़ा खतरा पैदा कर सकते हैं.

द गार्जियन में जेसन बर्क ने लिखा, 'प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार माने जाने वाले (राहुल) गांधी ने टिमोथी रोमर को आगाह किया कि भारत के मुस्लिम समुदाय के कुछ तत्वों में [इस्लामवादी लश्कर-ए-तैय्यबा] के समर्थन के सबूत हैं, लेकिन कट्टरपंथी हिंदू समूहों में वृद्धि से बड़ा खतरा पैदा हो सकता है, जो मुस्लिम समुदाय के साथ धार्मिक तनाव और राजनीतिक टकराव पैदा करते हैं.'

संभवत: यही वजह है कि कांग्रेस नेता खासतौर पर इस बात पर जोर दे रहे थे कि राहुल गांधी को भारत-चीन सीमा पर टकराव को लेकर देश के रुख और हितों का ख्याल था.

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