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स्वच्छ नेता की छवि नहीं खोना चाहते नीतीश

नीतीश कुमार को पता है कि अब सरकार में बने रहने के लिए लालू को उनकी जरूरत पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा है

Sanjay Singh Updated On: Jul 01, 2017 02:45 PM IST

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स्वच्छ नेता की छवि नहीं खोना चाहते नीतीश

पिछले साल नवंबर में नोटबंदी लागू होने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों से अलग हटकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस कदम का समर्थन किया था. नीतीश ने अपनी सभी आम सभाओं में यह भी कहा था कि काले धन पर लगाम लगाने का नोटबंदी का मकसद तभी सफल हो सकता है जब इसके बाद बेनामी संपत्ति के खिलाफ जंग छेड़ी जाए.

बेनामी संपत्ति के आरोपों में घिरा लालू परिवार

अगले कुछ महीनों में कुछ ऐसा होता दिखाई दिया. मोदी सरकार के बेनामी संपत्ति पर किए गए प्रहार का पहला हाई प्रोफाइल निशाना बने नीतीश कुमार के बिहार में गठबंधन पार्टनर आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और उनका परिवार.

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नीतीश कुमार के लिए दिक्कत यह थी कि अवैध जरियों से बिहार और देश के दूसरे हिस्सों में लगभग 1,000 करोड़ रुपए की बेनामी संपत्तियां खरीदने के आरोप उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और कैबिनेट के एक अन्य मंत्री तेज प्रताप और राज्यसभा सदस्य मीसा भारती समेत लालू परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ लगे थे.

नीतीश के लिए अपनी मांग से पीछे हटना नामुमकिन

इससे नीतीश और उनकी कैबिनेट के सबसे सीनियर सहयोगियों और असेंबली में संख्या के आधार पर वरिष्ठ गठबंधन पार्टनर एक असहज स्थिति में आ गए. बेनामी संपत्ति और इसके मालिकों पर फोकस्ड अटैक नीतीश की मांग थी. जब इस मसले पर चिंतित केंद्र सरकार की एजेंसियों ने सख्ती से कार्रवाई करना शुरू किया तो नीतीश अपनी मांग से पीछे हटने का जोखिम नहीं ले सकते थे.

न ही वह अपनी सरकार बचाने के लिए लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के समर्थन में खड़े होते दिखाई देना चाहते थे. जेडीयू अध्यक्ष और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को यह भी पता है कि अब सरकार में बने रहने के लिए लालू को उनकी जरूरत पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा है.

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मोहम्मद शहाबुद्दीन की रिहाई और उसके बाद के घटनाक्रमों ने नीतीश को बेहद मुश्किल हालातों में धकेल दिया था. अब अपने पार्टनर पर लगे बेनामी संपत्ति के आरोपों ने उनकी सरकार को परेशानी के बिलकुल अलग लेवल पर पहुंचा दिया है. लालू की आरजेडी और उसके समर्थकों में नीतीश और उनकी पार्टी जेडीयू के इस मसले पर लगातार चुप्पी को लेकर गहरा गुस्सा है.

नीतीश के लिए स्वच्छ छवि बनाए रखना अहम

गवर्नेंस का रिकॉर्ड, अपेक्षाकृत स्वच्छ राजनीति और कानून, व्यवस्था को कायम रखना नीतीश की खासियत है. उन्होंने भले ही गठबंधन किए हों, उन्हें तोड़ा हो, फिर से दूसरी पार्टी के साथ गठजोड़ किया हो या मित्रों से दुश्मन बने लोगों को फिर से दोस्त बनाया हो, लेकिन, वह अपनी स्वच्छ और मजबूत नेता की छवि को खोना नहीं चाहते हैं.

लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के बीच राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार ‘बिहार की बेटी’ मीसा कुमार को लेकर छिड़े शब्द युद्ध, तेजस्वी के फेसबुक पोस्ट पर जेडीयू चीफ का नाम लिए बगैर किए गए तीखे तंज को एक ही संदर्भ में देखा जा सकता है. राष्ट्रपति चुनाव की उम्मीदवारी ने महीनों से चले आ रहे दोनों पार्टियों के बीच के मतभेद को खुलकर जाहिर करने का मौका दे दिया है.

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कांग्रेस नेतृत्व के उपेक्षा करने से नीतीश ने बनाई दूरी

बिहार सरकार में गठबंधन के एक और सहयोगी कांग्रेस की जेडीयू से शिकायतों की लिस्ट और भी लंबी है. यह हकीकत है कि कांग्रेस तब से नीतीश कुमार को रिझाने की कोशिशें कर रही थी जब वह एनडीए का हिस्सा थे.

2015 में विधानसभा चुनाव से पहले लालू की आरजेडी के नीतीश का नेतृत्व स्वीकारने से पहले ही कांग्रेस ने उन्हें महागठबंधन के मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर दिया था. नीतीश ने उस वक्त लालू को कांग्रेस की राज्य में हैसियत से ज्यादा सीटें दिलाने के लिए राजी कर लिया था.

फ़र्स्टपोस्ट ने कई जेडीयू नेताओं से बात की जिन्होंने बताया कि नीतीश कुमार के सोनिया और राहुल गांधी के सीधे संपर्क में होने के बावजूद कई मौकों पर उनकी राय को कांग्रेस द्वारा अनदेखा किया गया.

गुलाम नबी आजाद भले ही मौजूदा वक्त में जेडीयू के लिए खलनायक में तब्दील हो गए हों, लेकिन शायद नीतीश और कांग्रेस नेतृत्व के बीच आपसी मतभेद के बीज महीनों पहले किसी और ने नहीं बल्कि खुद राहुल गांधी ने बोए हैं.

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