विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

जब गांधी ने कहा: मैं बनिया था, बनिया हूं और बनिया ही मरूंगा!

गांधी के पास अहिंसा और भारत के तमाम धर्म-समुदायों की एकता का सौदा था. वे इसी के सौदागर थे.

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: Jun 12, 2017 12:59 PM IST

0
जब गांधी ने कहा: मैं बनिया था, बनिया हूं और बनिया ही मरूंगा!

‘अतीत हमेशा एक परदेस होता है, वहां चीजों को ओढ़ना-बिछाना कुछ अलग ही रीत से होता है’- ब्रिटिश उपन्यासकार एल.पी हार्टले के उपन्यास द गो-बिट्वीन(1953) की शुरुआती पंक्ति का ढीला-ढाला अनुवाद कुछ ऐसा ही होगा.

खबर आई है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने छत्तीसगढ़ में महात्मा गांधी को ‘चतुर बनिया’ कहा तो द गो विट्वीन की ये पंक्तियां बेसाख्ता याद आ गईं.

गांधी को बनिया कोई पहली बार नहीं कहा गया, न ही उनकी चतुराई को कोई पहली बार लक्ष्य किया गया है. अपने बनिया होने को लेकर गांधी के मन में कोई संकोच ना था. गांधी ने यह भी कहा है कि मैं बनिया था, हूं और आजीवन रहूंगा लेकिन वह गुजरे अतीत की बात है, तब चीजें कुछ दूसरी ही रीत से हुई थीं.

जैसे द गो-विट्वीन उपन्यास का किरदार, बुजुर्ग लियो कॉल्स्टन टूटे और बिसार दिए गए बक्से में पड़ी लाल डायरी के सहारे अपने बचपन को याद करता है, आइए हम भी कुछ किताबों के सहारे उस वक्त को याद करें जब गांधी को चतुर बनिया कहा गया और सोचें कि तब ऐसा कहने के पीछे क्या नीयत काम कर रही होगी.

शायद ऐसा करके हम अतीत के उस परदेस को अपने इस चतुराई भरे वर्तमान से अलग भी कर सकें!

किसने कहा था गांधी को चतुर बनिया?

महात्मा गांधी को चतुर बनिया कहने वाला कोई और नहीं ‘बा’ थीं- खुद महात्मा की जीवनसंगिनी!

चूंकि यह जिक्र दस्तावेजी साक्ष्यों पर कल्पना की चाशनी लपेटकर लिखे चमन नहाल के मशहूर उपन्यास ‘द क्राऊन एंड द लोइनक्लॉथ’ में मिलता है सो ज्यादा ठीक यही कहना लगता है कि इतिहास ने जिसे दर्ज करने से परहेज किया उस छूटे-फटके को उपन्यास ने अपने पन्नों पर जगह दी.

KasturbaGandhi

आज का कोई मनई अपने को आठो पहर गांधी के कठोर अनुशासन की जकड़ में बंधा पाए तो उसके मुंह से भी शायद वही निकले जो 'द क्राउन एंड द लोइनक्लॉथ' के किरदार कस्तूरबा गांधी के मुंह से निकला था... लीजिए पढ़िए, साबरमती आश्रम के कठोर नियम-कायदों से उकता और किंचित दंडित होकर कस्तूरबा जो कुछ कहती हैं वह पूरा जिक्र जो उपन्यास में अंग्रेजी की लिखाई में दर्ज है-

'माई डियर महात्मा! मुझे अपनी डेमोक्रेसी मत सिखाओ! बाकी मर्द और औरतों के लिए तुम हीरो होगे लेकिन मेरे लिए एक चालाक बनिया ही हो...तुम सधे कदमों से मौका ताड़ते रहते हो जब तक कि तुम अपने मन की ना कर सको. ये ठीक है कि तुमने आश्रमवासियों की सहमति से संपत्ति के बारे में नियम बनाया है. आश्रम आई एक भक्तन ने मुझे चार रुपए दिए और मैं जो बेवकूफ सी तुम्हारी सनक का ख्याल रखने में खोई रहती हूं, वे रुपए आश्रम के मुंशी को देना भूल गई. फिर तुमने क्या किया मेरे साथ? तुमने सबके सामने मुझे डांटा, मुझसे पैसे वापस लिए और यंग इंडिया में मेरे खिलाफ दो पन्ने का लंबा-चौड़ा भाषण लिख मारा!'

गांधी के आचरण में किसने निकाला खोट!

इसके तुरंत बाद कठोर नियम-पालन के हिमायती महात्मा गांधी के आचरण में खोट निकालते हुए कस्तूरबा पलटवार करती हैं कि 'हे मेरे महात्मा पतिदेव! याद करो- अकीदे के साथ दगा नहीं करते, यह अधर्म के बराबर है. मैं तुम्हारे ही शब्दों का व्यवहार कर रही हूं. फिर तुमने अकीदे के साथ समझौता क्यों किया और घाव से अपंग हुए उस मूक बछड़े को क्यों मार दिया, तुम तो अहिंसा के समर्थक हो ना!'

उपन्यासकार ने नोट किया है, 'कस्तूरबा बिल्कुल अपने प्रतिस्पर्धी की जबान में बोलीं, हू-ब-हू एक-एक शब्द ! मोहनदास करमचंद गांधी ने सोचा- मेरा एक दुश्मन तो मेरे अपने ही खेमे में मौजूद है.'

ऊपर के प्रसंग में उपन्यासकार अपनी तरफ से यह भी जोड़ता है कि ‘गांधी ने नियम बनाया था कि साबरमती का कोई भी आश्रमवासी किसी तरह की संपत्ति नहीं रखेगा. जो भी दान-उपहार मिलेगा चाहे वह नकदी हो या कोई वस्तु, उसे तुरंत आश्रम के खजांची के पास जमा करना होगा. नियम को लागू करने से पहले उसपर आश्रमवासियों की सहमति ली जाती थी ताकि मामला लोकतांत्रिक जान पड़े. लेकिन बहुधा होता यही था कि मर्जी महात्मा की चलती थी, नियम-कानून सब उन्हीं का होता था. टोकने पर वे बहस को खूब लंबी खिंचते जाते थे, बहस इतनी लंबी चलती कि सामने वाला थक-हार कर उनकी बात मान लेता था.’

किफायतशारी और हिन्द-स्वराज

लेकिन सवाल उठता है कि गांधी के जिस बनियेपन और चतुराई को कस्तूरबा ने उपन्यास में लक्ष्य किया है, उसका मकसद क्या था?

बेशक पाई-पाई का हिसाब रखने वाले बनिया थे महात्मा गांधी. फिजूलखर्ची की एक पूरी फेहरिस्त बनी हुई थी उनके मन में और जिन बातों को वे फिजूलखर्ची से जोड़ते थे उसके नाम पर फूटी कौड़ी तक खर्च करना उन्हें बर्दाश्त नहीं था. कहीं गहरे में गांधी को लगता था कि इस फिजूलखर्ची और लालच ने ही हिंदुस्तान को गुलाम बनाया है. बड़ा गहरा रिश्ता है गांधी के स्वराज और रुपए-पैसों की किफायतशारी से.

hindswaraj

गांधी-प्रेमी बताते हैं कि गांधीजी ने अनेक चिट्ठियां इस्तेमालशुदा लिफाफों की खाली जगह पर लिखी और फाउंटेन पेन आ जाने के बावजूद सैकड़ों चिट्ठियों को लिखने में दवात में डुबोकर लिखनेवाली कलम का ही इस्तेमाल किया कि खर्चा कम पड़ेगा.

राजनीति में भी कम-खर्ची

कम-खर्ची गांधी की राजनीति से इस हद तक बंधी है कि स्वराज्य के मायने तलाशने के लिए 21 वीं सदी में बारंबार पढ़ी जाने वाली उनकी किताब ‘हिंद-स्वराज’ में आता है-‘जब तक हम हाथ से आलपिन नहीं बनायेंगे तबतक हम उसके बिना काम चला लेंगे. झाड़-फानूस को आग लगा देंगे. मिट्टी के दीये में तेल डालकर और हमारे खेतों में पैदा हुई रुई की बत्ती बनाकर दीया जलाएंगे. ऐसा करने से हमारी आंखे (खराब होने से) बचेंगी, पैसे बचेंगे, हम स्वदेशी रहेंगे, बनेंगे और स्वराज की धूनी रमाएंगे..’

‘करो ज्यादा का इरादा’ और ‘कर लो दुनिया मुट्ठी में’ के इस हसरती वक्त में किसी को यह बात जल्दी समझ में नहीं आएगी कि कमखर्ची गांधी की कोई व्यक्तिगत जिद का मामला नहीं है. उनकी जिंदगी और सोच में किफायतशारी जीवन-जीने के मूल्य और सभ्यता का अनिवार्य सिद्धांत बनकर आती है.

इसके आधार पर उन्होंने ‘भारत क्यों गुलाम हुआ’ जैसे कठिन सवाल का एक सहज उत्तर तैयार किया था. लीजिए एक दिलचस्प वाकये से गुजरते हुए इस उत्तर को एक बार फिर से पढ़िए.

बनियों ने बनाया देश को गुलाम

हुआ यों कि उन दिनों गांधी छुआछूत की प्रथा और दलित आबादी की दीन-दशा को लेकर एक अभियान चला रहे थे और इसी अभियान के दौरान उनका महाराष्ट्र के धूलिया में आना (1927) हुआ. गांधी का आना सुन वहां के स्थानीय सौदागर जिनमें ज्यादातर बनिया जाति के थे, बड़े उत्साहित हुए कि हमारे समुदाय का एक जगत्प्रसिद्ध आदमी धूलिया आया है.

उन्होंने गांधी की जाति को चिह्नित करते हुए उन्हें एक मानपत्र दिया, इसरार हुआ कि आपको हम बनिया समुदाय के लोगों के बीच भी कुछ कहना चाहिए. और फिर वही हुआ जैसा गांधी ऐसे अवसरों पर पहले भी करते आए थे.

वे इस वक्त तक आईसीएस करने वालों के बीच आईसीएस की नौकरी की लानत-मलानत कर चुके थे और काशी में राजे-महाराजे को भरी सभा में उनके मुंह पर तड़क-भड़क की जिंदगी के लिए खरी-खोटी सुना चुके थे. धूलिया के बनियों की सभा में भी गांधी ने कुछ ऐसा ही किया.

गांधी ने क्यों कहा, सिर्फ वैश्यों के कारण भारत गुलाम बना?

वैश्यजन की उस सभा को संबोधित करते हुए गांधी ने कहा-'ब्राह्मण, क्षत्रियों या फिर शूद्रों के कारण नहीं सिर्फ वैश्यों के कारण भारत गुलाम बना. भारत का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जब बनियों ने भारत से मुंह फेर अंग्रेज सौदागरों का साथ दिया. जो सौदागर यहां व्यापार की फिराक में पहुंचे वे अपने कारोबार की हिफाजत के लिए योद्धा बने और कारोबार के सहारे कायम अपनी प्रभुता की रक्षा के लिए ब्राह्मण भी बने. अंग्रेजों में ये सारे ही गुण थे लेकिन अंग्रेजों की इस लाहासिल कमाई को देख हम अचंभे में पड़े और अपना धर्म भूल गए. हम कायर बन गये, बनिया का असली काम खेती, गोधन की हिफाजत और व्यापार भूलकर हमने अपनी मातृभूमि के साथ दगा किया. सच्चा बनिया बनकर ही आप इस स्थिति को बदल सकते हैं.'

गांधी: एक बनिये का लालच

गांधी ने दो बड़े मशहूर मौकों पर अपने बारे में खुद कहा है कि मैं बनिया हूं. गांधी की चतुराई पर तो खैर उनकी नजर जाती रही है जो एक न एक अर्थ में गांधी से असहमत थे जैसे कि जिन्ना और जिन्ना से भी ज्यादा विन्स्टन चर्चिल, लेकिन गांधी ने खुद के बनिया होने को अपने ‘लालच’ से जोड़ा है.

परखा उनके लालच को भी जाना चाहिए कि एक बनिए के रूप में उनका लालच किन बातों के लिए था और किस हद तक था.

बात मशहूर नमक-सत्याग्रह के वक्त की है जब पहली बार निहत्थे गांधी के आगे वह ब्रिटिश साम्राज्य का झुका जिसके विस्तार के आसमान में सूरज कभी डूबता नहीं था. फौज-फाटे और कूटनीति की कोई चाल काम ना आई. तब देश और विदेश दोनों जगह लोगों ने हैरत से देखा था कि कैसे भारत के वायसराय लार्ड इर्विन को सत्याग्रहियों के अगुआ एक संत के आगे अपनी महिमा और गरिमा की रक्षा में झुकना पड़ा.

गांधी-इर्विन समझौता गांधी की तरफ से ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में ठोंकी गई आखिरी कील थी.

जब गांधी ने खुद को बोला बनिया

नमक-सत्याग्रह की सफलता के बाद भारत में अदना-अव्वल शायद ही कोई होगा जिसे यकीन हो कि ब्रिटिश साम्राज्य अब भी अजेय है.

समझौते के बाद गांधी की लोकप्रियता अपने चरम पर थी और चहुंओर हो रही सराहना की इस घड़ी में कांग्रेस के सियासी प्रतिद्वन्द्वी मुस्लिम लीग ने उन्हें दिल्ली के एक जलसे में बोलने का न्यौता दिया. लीग कांग्रेस को हिन्दुओं का संगठन और गांधी को हिंदुओं का नेता कहती थी. इसी को लक्ष्य कर लीग के जलसे में गांधी ने अपने भाषण की शुरुआत इन मशहूर शब्दों से की-

'मैं एक बनिया हूं और मेरे लालच की कोई सीमा नहीं. हमेशा से मेरी दिली ख्वाहिश रही है कि मैं 21 करोड़ नहीं बल्कि 30 करोड़ हिंदुस्तानियों की तरफ से बोलूं (यह तब के हिन्दुस्तान की आबादी में हिंदू-मुस्लिम की संख्या का संकेत है)..हिंदू-मुस्लिम एकता के जतन करूं.. इस एकता को हासिल करना मेरी जिंदगी का मकसद रहा है और इसकी कोशिश करते हुए मेरी जान चली जाए तो मेरे आत्मा को संतोष होगा!'

gandhinamak

इस वाकये को अपनी किताब ‘गांधीज पैशन’ में नोट करने वाले स्टेनले वोल्पोर्ट सहित गांधी-कथा सुनाने वाले कई और विद्वानों ने लिखा है कि गांधी की यह बात अक्षरशः सही साबित हुई, गांधी हिंदू-मुस्लिम एकता की अपनी कोशिशों के आरोप में ही गोडसे की गोलियों का निशाना बने.

गांधी का अलग था तरीका

दूसरी दफे जब गांधी ने खुद को बनिया बताकर अपना सामान बेचने की जुगत लगाई थी तो ब्रिटिश साम्राज्य अपने उपनिवेश हिंदुस्तान के जन-धन को विश्वयुद्ध की आग में झोंक चुका था. क्या हिंदुस्तान को हिटलरशाही के खिलाफ चल रहे युद्ध में शामिल होना चाहिए- यह सवाल उस घड़ी स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं को गहरे मथ रहा था. और, अहिंसाव्रती गांधी ने नेताओं को चेताते हुए वर्धा में कांग्रेस कार्यकारिणी से कहा-

'अगर मैं हिंदुस्तान का वायसराय होता तो साम्राज्य (ब्रिटिश) की रक्षा में उसे तलवार उठाने को ना कहता.. कैसे मंजूर कर सकता हूं मैं तलवार उठाना.. मैं बनिया पैदा हुआ, मैं बनिया ही रहूंगा और बनिया रहते ही मरूंगा, व्यापार मेरा पेशा है, मैं आपके और पूरी दुनिया के साथ एक सौदा कर रहा हूं, मेरे पास एक बेशकीमती मोती है... मैं अहिंसा का व्यापारी हूं, जो इसकी कीमत दे सकते हैं उन्हें यह मोती हासिल होगा, आपने वादा किया था कि आप स्वराज सिर्फ अहिंसा से हासिल करेंगे... लेकिन आज आप उस रास्ते से हट रहे हैं.. इस मोल-भाव से तो आपको पूर्ण स्वतंत्रता ना हासिल होगी!'

गाधी बनिया थे, आजीवन बनिया रहे और उन्हीं के शब्दों में कहें तो वे मरे भी सच्चे बनिया बनकर-उनके पास अहिंसा और भारत के तमाम धर्म-समुदायों की एकता का सौदा था. वे इसी के सौदागर थे.

लेकिन, जैसा कि होता आया है- यह सब अतीत की बात है और अतीत हमेशा परदेस होता है, वहां लोग चीजों को अलग ही ढंग से ओढ़ते-बिछाते हैं. इसे भूलते हुए कोई चाहे तो अतीत से चतुराई कर सकता है लेकिन याद रहे जब आप अतीत पर पत्थर चलाते हैं तो वह पलटकर आप पर तोप से गोले भी बरसा सकता है!

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi