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बाॅबी सेक्स कांड: हत्या को आत्महत्या बना कर सीबीआई ने बड़े नेताओं को बचाया था

बाॅबी हत्याकांड में शामिल लोगों को सजा मिली होती तो पटना का वर्तमान सेक्स कांड शायद नहीं होता

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Mar 01, 2017 11:19 PM IST

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बाॅबी सेक्स कांड: हत्या को आत्महत्या बना कर सीबीआई ने बड़े नेताओं को बचाया था

बिहार में सत्ताधारी नेताओं को बचाने के लिए सीबीआई ने 1983 में हुई बाॅबी की हत्या को आत्महत्या करार देकर उसे रफा-दफा कर दिया था. जांच एजेंसी ने उच्चस्तरीय दबाव के कारण ऐसा किया. यदि श्वेत निशा त्रिवेदी उर्फ बाॅबी हत्याकांड में शामिल लोगों को तब सजा मिल गयी होती तो पटना का ताजा सेक्स कांड शायद नहीं होता.

उन दिनों के एक कांग्रेसी विधायक ने हाल में यह तर्क दिया है कि ‘यदि बाॅबी सेक्स स्कैंडल को हम तब रफा-दफा नहीं करवाते तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता.’ सूत्रों के अनुसार पटना के ताजा सेक्स स्कैंडल को भी उसी तरह रफा-दफा कर देने की कोशिश चल रही है. क्योंकि एक बार फिर ‘लोकतंत्र खतरे में है.’

फिर कोई और स्कैंडल होगा

यदि इसे भी रफा-दफा कर दिया जाएगा तो कुछ समय के बाद एक बार फिर कोई और स्कैंडल होगा. जब भी बड़े नेताओं के पाप सामने आने लगते हैं, लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है.

राजनीति में महिलाओं के शोषण और इस्तेमाल की ऐसी कई कहानियां हैं. बिहार विधानसभा सचिवालय की अति सुंदर महिला टाइपिस्ट श्वेत निशा त्रिवेदी उर्फ बाॅबी को जहर दिया गया जिससे 7 मई 1983 को उसकी मौत हो गयी. उस समय यह आम चर्चा थी कि बॉबी को किसने जहर दिया.

Shwet nisha trivedi alias bobby

श्वेत निशा त्रिवेदी उर्फ बॉबी की हुई रहस्यमय मौत से बिहार की राजनीति में भूचाल आ गया था

बाॅबी बिहार विधान परिषद की सभापति और कांग्रेस नेता राजेश्वरी सरोज दास की गोद ली हुई बेटी थी. हत्या सभापति के पटना स्थित सरकारी आवास में ही हुई. मामले को छुपाने के लिए हड़बड़ी में लाश को कब्र खोदकर दफना दिया गया.

जल्दीबाजी में दो डाक्टरों से निधन के कारणों से संबंधित जाली सर्टिफिकेट ले लिये गये. एक डाक्टर ने लिखा कि आंतरिक रक्त स्त्राव से बाॅबी की मौत हुई. दूसरे ने लिखा कि अचानक हृदय गति रुक जाने से मृत्यु हुई.

कब्र खुदवाकर शव निकलवाया

इस रहस्यमय हत्या के बारे में ‘आज’ और ‘प्रदीप’ अखबार में खबरें छपने के बाद तत्कालीन एसएसपी किशोर कुणाल ने कब्र से लाश निकलवायी. शव का फिर से पोस्टमार्टम हुआ. विसरा में मेलेथियन जहर पाया गया.

सभापति के आवास में रहने वाले दो युवकों को पकड़कर पुलिस ने जल्दी ही पूरे केस का खुलासा कर दिया. खुद राजेश्वरी सरोज दास ने 28 मई 1983 को अदालत में दिए गए अपने बयान में कहा कि बाॅबी को कब और किसने जहर दिया था.

हत्याकांड तथा बाॅबी से जुड़े अन्य तरह के अपराधों के तहत प्रत्यक्ष और परोक्ष ढंग से छोटे-बड़े कांग्रेस के कई नेता शामिल पाये गये थे. जिससे तब की सत्ता और राजनीति में भूचाल आ गया. उन नेताओं की गिरफ्तारी होने ही वाली थी कि करीब सौ कांग्रेस विधायकों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र का घेराव कर के उनसे कहा कि, 'आप जल्द केस को सीबीआई को सौंपिए नहीं तो आपकी सरकार गिरा दी जाएगी.'

Jagannath Mishra

जगन्नाथ मिश्रा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के काफी करीबी नेताओं में शुमार थे (फोटो: फेसबुक से साभार)

राज्य सरकार ने 25 मई 1983 को इस केस की जांच का भार सीबीआई को सौंप दिया. सीबीआई पर भी हाई लेवल दबाव पड़ा और आखिर में केस रफा-दफा हो गया. सत्ताधारी नेताओं को बचाने की हड़बड़ी में सीबीआई ने बेसिर पैर की कहानी गढ़कर कोर्ट में फाइनल रिपोर्ट के तौर पर लगा दी. हत्या को आत्महत्या का रूप दे दिया गया.

ऑफिस में बैठे-बैठे फाइनल रिपोर्ट

उससे पहले इस केस के अनुसंधान के सिलसिले में सीबीआई की टीम ने कभी पटना पुलिस से संपर्क नहीं किया. सीबीआई ने अपने आॅफिस में बैठे-बैठे ही फाइनल रिपोर्ट तैयार कर दी. अगर किसी फिल्म की कथा लिखने वाले से मदद ली गई होती तो सीबीआई को अधिक तार्किक कहानी मिल जाती.

सीबीआई ने अपनी फाइनल रिपोर्ट में लिखा कि बाॅबी ने सेंसिबल टेबलेट खाकर आत्महत्या कर ली क्योंकि उसके प्रेमी ने उसे धोखा दिया था. सीबीआई ने यह भी लिखा कि अस्पताल के रास्ते में बाॅबी को दस्त हो रहा था.

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डॉक्टर बताते हैं कि सेंसिबल टेबलेट खाने से भयानक कब्जियत होती है. मेडिकल इतिहास के अनुसार 84 सेंसिबल टेबलेट खाकर भी मरीज जिंदा बच चुका है, तो क्या बाॅबी ने 85 या कहें 100 टेबलेट खाई होगी? जब आत्महत्या के लिए बेहतर और आसान तरीके मौजूद हैं तो कोई इतने अधिक टेबलेट खाने की जहमत भला क्यों उठाएगा?

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पटना सेक्स रैकेट की जांच की मांग को लेकर विरोधी विधानसभा में नीतीश सरकार को घेर रहे हैं (फोटो: पीटीआई)

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट या विसरा जांच रिपोर्ट में कहीं भी सेंसिबल टेबलेट का नामोनिशान नहीं मिला था बल्कि मेलेथियन का अंश पाया गया. सीबीआई ने कहा कि पटना फारेंसिक लेबोरेटरी में रखे किसी अन्य के विसरा का मेलेथियन बाॅबी के वेसरा में मिल गया होगा.

दूसरी ओर पटना फोरेंसिक लेबोरेट्री के अफसर ने लिख कर दिया कि सीबीआई को हमारे यहां से किसी ने ऐसी कोई बात नहीं कही. यहां ऐसी लापरवाही नहीं बरती जाती कि एक-दूसरे का विसरा आपस में मिल जाए.

सीबीआई ने पत्र को आधार बनाया

बाॅबी की आत्महत्या की कहानी को सही साबित करने के लिए सीबीआई ने एक ऐसे पत्र को आधार बनाया जिसका अस्तित्व ही नहीं था.

सीबीआई के अनुसार बाॅबी ने 6 मई 1983 की रात में अपने प्रेमी रतन जगवानी के नाम यह पत्र लिखा कि, 'मैंने आत्महत्या के लिए जहर खा लिया है. सीबीआई के अनुसार रतन बाॅबी से शादी करने के लिए तैयार नहीं था. बाॅबी ने यह पत्र निर्भय को इसलिए दिया कि वह इसे जगवानी को दे दे. निर्भय ने दूसरे दिन यह कथित पत्र रतन को दे दिया, जिसे पढ़ने के बाद रतन ने निर्भय को वापस लौटा दिया.

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आश्चर्य है कि निर्भय ने यह पत्र कैसे राजेश्वरी सरोज दास से छिपाए रखा ! सीबीआई के अनुसार बाॅबी की मौत के बाद राजेश्वरी और निर्भय ने मिलकर इस पत्र को बाॅबी के अन्य कागजात के साथ जला दिया. यदि आत्महत्या की बात सही होती तो यह पत्र राजेश्वरी के बचाव के काम आ सकता था. फिर उन्होंने इसे क्यों जला दिया? सीबीआई की इस कहानी पर किसी को विश्वास नहीं था. सच्चाई तो यह थी कि वैसा कोई पत्र था ही नहीं.

Rajeshwari saroj das

बाॅबी बिहार विधान परिषद की सभापति और कांग्रेस नेता राजेश्वरी सरोज दास की गोद ली हुई बेटी थी

याद रहे कि, बाॅबी की मौत के तीन दिन बाद रतन की शादी होने वाली थी. हालांकि जांच में लगी पटना पुलिस के एक अफसर के अनुसार बाॅबी ऐसी लड़की नहीं थी जिसका किसी एक व्यक्ति से स्थायी और भावनात्मक संबंध हो.

सबूत छिपाने के आरोप

सवाल यह भी है कि सबूत छिपाने के आरोप में सीबीआई ने राजेश्वरी सरोज दास पर केस क्यों नहीं किया?

सीबीआई की फाइनल रिपोर्ट में अन्य कई विरोधाभास थे. इसके बावजूद सीबीआई के जांच अधिकारी के एन तिवारी ने पटना के विशेष न्यायिक दंडाधिकारी एच पी चक्रवर्ती की अदालत में फाइनल रिपोर्ट लगा दी. अदालत ने 18 मई 1984 को आखिरकार इस केस को बंद कर दिया.

पूर्व वीसी देवेंद्र प्रसाद सिंह सहित पटना के कुछ गणमान्य व्यक्तियों ने एच पी चक्रवर्ती के इस फैसले के खिलाफ पटना हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की. हाईकोर्ट ने उसे खारिज कर दिया.

याद रहे कि तब तक जनहित याचिका का दौर शुरू नहीं हुआ था.

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