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पिता यशवंत से असहमत होकर सरकार का सुरक्षा कवच बनने की जुगत में जयंत सिन्हा

अपने पिता के आकलन का खंडन करके जयंत ने शायद वही किया है, जो उन्हें सरकार में बने रहने और भविष्य में अच्छा वक्त आने का इंतजार करते हुए करना चाहिए था

Sanjay Singh Updated On: Sep 29, 2017 03:01 PM IST

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पिता यशवंत से असहमत होकर सरकार का सुरक्षा कवच बनने की जुगत में जयंत सिन्हा

पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि यह एक पिता-पुत्र की कहानी है, सीनियर सिन्हा बनाम जूनियर सिन्हा कथा. एक दिन पिता यशवंत सिन्हा के भारतीय अर्थव्यवस्था को 'अस्त-व्यस्त' कर देने के लिए मोदी सरकार, खासकर वित्त मंत्री अरुण जेटली के खिलाफ आग उगलने के बाद, अगले दिन पुत्र जयंत सिन्हा सामने आए और पिता का नाम लिए बिना उनकी सारी दलीलों को खारिज कर दिया.

पिता यशवंत सिन्हा ने इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय पेज पर प्रकाशित अपने लेख में लिखा है, 'अब मुझे बोलना ही चाहिए. अर्थव्यवस्था लगातार नीचे, तबाही की ओर जा रही है. बीजेपी में यह बात बहुत से लोग जानते हैं, लेकिन डर के मारे बोल नहीं पा रहे हैं.'

पिता की चिंता और बेटे के सपने

पुत्र जयंत ने जवाब के लिए सबसे ज्यादा बिकने वाले टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादकीय पेज का चुनाव किया- 'न्यू इंडिया के लिए न्यू इकोनॉमिक्स: खुली, पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और परिवर्तनकारी अर्थव्यवस्था के लिए आधारभूत बदलाव.'

जयंत ने यह लिखते हुए शुरुआत की है, 'भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने पेश चुनौतियों को लेकर हाल में कई लेख लिखे गए हैं. दुर्भाग्य से इन लेखों में चंद तथ्यों के आधार पर एकतरफा नतीजे निकाले गए हैं, और मौलिक ढांचागत सुधारों को समझने में नाकाम रहे हैं, जो अर्थव्यवस्था में बदलाव ला रहे हैं.'

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यशवंत ने यह कहते हुए अपने लेख की शुरुआत की है, 'अगर मैंने अब भी वित्त मंत्री द्वारा अर्थव्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देने के खिलाफ मुंह नहीं खोला, तो अपने राष्ट्रीय कर्तव्य की उपेक्षा करूंगा.'

यशवंत सिन्हा का मानना है कि एक के बाद एक लागू किए गए दो विध्वंसकारी फैसलों ने 'कारोबार में तबाही मचा दी, और उनमें से कई डूब गए और लाखों लोगों की नौकरी चली गई, इधर लेबर मार्केट में आने वाले नए लोगों के लिए मुश्किल से ही कोई अवसर पैदा हो रहे हैं.' जबकि जयंत को यकीन है कि, 'जीएसटी, नोटबंदी और डिजिटल पेमेंट भारतीय अर्थव्यवस्था को विधिवत आकार देने में गेम चेंजर साबित होंगे… ये ढांचागत सुधार ऐच्छिक नहीं हैं, ये ‘न्यू इंडिया’ के निर्माण और अरबों लोगों को जॉब मुहैया कराने के लिए अनिवार्य हैं.'

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पिता यशवंत ने अपने लेख का समापन यह कहते हुए किया है कि, 'प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि उन्होंने गरीबी को बहुत करीब से देखा है. उनके वित्त मंत्री यह सुनिश्चित करने के लिए दिन-रात काम कर रहे हैं कि सारे भारतीय भी इसे उतने ही करीब से देख लें.'

न्यू इंडिया का तर्क

पुत्र जयंत यह कहते हुए अपने लेख का समापन करते हैं, 'तकरीबन हर भारतीय के पास अब भोजन की गारंटी, बिजली, गैस से खाना पकाने की सुविधा, बीमा कवर, छोटे कर्ज और हर मौसम का सामना कर सकने वाली सड़कों के रूप में बुनियादी सुरक्षा आवरण उपलब्ध है. पारदर्शी, नियम से बंधे माहौल में, जो जरूरी सुविधा और फाइनेंस मुहैया कराता है, छोटे और बड़े कारोबारियों को साथ-साथ फलने-फूलने का मौका मिलेगा. हम एक स्वस्थ नई अर्थव्यवस्था बना रहे हैं, जो नव भारत में दीर्घकालिक विकास और जॉब पैदा करने वाली होगी.'

पीएमओ ने जयंत सिन्हा के लेख को ट्वीट किया है और इसका लिंक दिया है-

रेलमंत्री पीयूष गोयल को छोड़कर किसी बीजेपी नेता या मंत्री ने बुधवार को छपे यशवंत सिन्हा के लेख पर एक शब्द नहीं बोला है. अपने लेख में जयंत न्यू इंडिया का जिक्र करते हैं, लेकिन यशवंत ने अपने लेख में न्यू इंडिया या ओल्ड इंडिया का जिक्र नहीं किया है, उन्होंने सिर्फ भारत की आर्थिक दशा के बारे में बात की है, जैसा कि वह आज देख रहे हैं.

क्या पिता-पुत्र में हो गया है अलगाव?

तो क्या इसका मतलब यह है कि 54 साल के जयंत निकट भविष्य में नव-भारत का उदय देख रहे हैं और मौजूदा समस्याएं केवल संक्रमणकालीन हैं, जो कि उनके 84 साल के पिता यशवंत नहीं देख पा रहे हैं? क्या इसका मतलब यह है कि पिता-पुत्र में अलगाव हो गया है? क्या इसका मतलब यह है कि आईएएस से राजनेता बने कुशल प्रशासक पिता वर्तमान से तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं? वो स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि वह अपने समय में चाहे जितने भी प्रतिभासंपन्न और अच्छे रहे होंगे, वो समय अब बीत चुका है?

हो सकता है कि वाजपेयी सरकार में विदेश और वित्त मंत्री के पद पर रहने के कारण उन्हें गहरा संस्थागत ज्ञान हो, लेकिन मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान उन्हें सलाह लेने के काबिल नहीं समझता. क्या इसका मतलब यह है कि बेटा- आईआईटी का पूर्व छात्र, व्यावसायिक प्रशासक व सलाहकार से राजनेता बने जयंत पहचान नहीं पा रहे हैं कि उनके पिता का ज्ञान कितना विस्तृत है. वह लंबे समय तक महत्वपूर्ण भूमिका में रहे हैं और बुरे समय की आहट बेहतर तरीके से भांप सकते हैं?

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सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या यशवंत सिन्हा समझ नहीं पा रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली के खिलाफ ऐसी बातें बोल कर वह अपने बेटे का राजनीतिक भविष्य खराब कर रहे हैं, जो कि पहली बार सांसद और नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री बने हैं.

जिन लोगों ने यशवंत सिन्हा की राजनीति को करीब से देखा है, और जयंत सिन्हा का उत्थान देखा है, उनका कहना है कि पिता-पुत्र में किसी मुद्दे पर मतभिन्नता हो सकती है, लेकिन दोनों में बहुत अच्छे रिश्ते हैं. पिता नोएडा में वर्षों पहले बनाए अपने घर में रहते हैं, बेटा लुटियंस में विशाल बंगले में रहता है. इस भौगोलिक दूरी की बात छोड़ दें तो दोनों एक दूसरे की स्थिति से बेपरवाह नहीं रहते.

यह पहली बार नहीं है जब सिन्हा ने प्रधानमंत्री मोदी, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और वित्तमंत्री अरुण जेटली के खिलाफ मुंह खोला है. उन्होंने अपने विचार को पूरे दम और तर्कों के साथ रखने की ख्याति हासिल की है. लेकिन वह कम से कम फरवरी 2016 के बाद से खामोश थे, जब उन्होंने गोवा में एक कॉनक्लेव में पीएम मोदी के राजनीतिक भविष्य के बारे में 'गलत तरीके से उद्धृत' टिप्पणी की थी. इस टिप्पणी को बीजेपी नेतृत्व और पार्टी समर्थकों में अच्छी नजर से नहीं देखा गया. खुद से ओढ़ी एक खामोशी के डेढ़ साल बाद अब सिन्हा ने कहा है कि, 'अगर वह वित्त मंत्री द्वारा अर्थव्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देने के खिलाफ अब भी नहीं बोलेंगे तो अपने राष्ट्रीय कर्तव्य से कोताही करेंगे.'

जयंत सिन्हा की तरक्की

कितनी रोचक बात है कि बीते साल जुलाई महीने तक,यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत अरुण जेटली के अधीन कनिष्ठ वित्त मंत्री के तौर पर काम कर रहे थे.

जूनियर सिन्हा ने वित्त मंत्रालय में अपने काम से असर छोड़ा है. उन्हें महत्वपूर्ण काम सौंपा गया था, वह वरिष्ठ अधिकारियों से मिलते थे, विभिन्न मसलों पर कारोबारियों की अगुवाई करते थे और मंत्रालय से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर सरकार का नजरिया तय करते थे. इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि जब जुलाई 2016 में उन्हें वित्त से नागरिक उड्डयन मंत्रालय में जूनियर मंत्री के तौर पर भेजा गया तो इस खबर ने हेडलाइंस में जगह बनाई थी, जबकि उस मंत्रिपरिषद फेरबदल में 19 नए मंत्री बनाए गए थे और नौ कैबिनेट समेत 13 राज्यमंत्रियों, जिनमें कुछ स्वतंत्र प्रभार वाले थे, के विभाग में बदलाव किया गया था.

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फर्स्टपोस्ट ने तब कहा था कि इतिहास में किसी अन्य राज्यमंत्री को उस लोकप्रियता का एक छोटा हिस्सा भी हासिल नहीं हुआ था, जो उन्होंने हासिल किया था और ना ही वैसी सार्वजनिक बहस को जन्म दिया था, जैसी उनके स्थानांतरण से पैदा हुई थी.

मार्च 2014 में चलते हैं, जब 2014 के संसदीय चुनाव के दौरान 75 साल से ऊपर के नेताओं को रिटायर कर दिए जाने के बारे में आरएसएस की तरफ से आए एक अलिखित आदेश के बाद यशवंत सिन्हा ने चुनावी राजनीति से खुद को अलग कर लिया था और झारखंड में हजारीबाग सीट से अपने बेटे की उम्मीदवारी को आगे बढ़ाया. जयंत हजारीबाग से जीत गए. प्रधानमंत्री मोदी ने उनमें वह प्रतिभा देखी जो उन्हें अपनी सरकार के लिए चाहिए थी. जयंत में पार्टी के साथ ही सरकार में, जहां आमतौर पर प्रतिभा का टोटा है, तरक्की करने के लिए सारे गुण थे.

भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा पर अपने पिता के आकलन का खंडन करके जयंत ने शायद वही किया है, जो उन्हें सरकार में बने रहने और भविष्य में अच्छा वक्त आने का इंतजार करते हुए करना चाहिए था.

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