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बुलेट ट्रेन की स्पीड में रोडब्रेकर क्यों बन रही हैं राजनीतिक पार्टियां

बुलेट ट्रेन की योजना भले ही मोदी का सपना हो लेकिन इसके खिलाफ कांग्रेस सहित कई पार्टियां हैं

Amitesh Amitesh Updated On: Sep 14, 2017 04:38 PM IST

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बुलेट ट्रेन की स्पीड में रोडब्रेकर क्यों बन रही हैं राजनीतिक पार्टियां

अहमदाबाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे के साथ बुलेट ट्रेन पर काम शुरू करने की आधारशिला रख रहे थे. उस वक्त पूरा माहौल रोमांच से भर गया. भारत में बुलेट ट्रेन की कल्पना मात्र से ही ऐसा लगा जैसे वर्षों पुरानी मुराद अब पूरी हो रही हो.

पांच साल में दौड़ेगी बुलेट

हालांकि बुलेट ट्रेन के पटरी पर उतरने में अभी पांच साल का वक्त लगेगा, लेकिन, दोनों ही देशों की तरफ से दिखाई जा रही इच्छाशक्ति देखकर अब पांच साल का इंतजार भी कम लगने लगा है. तैयारी है आजादी के 75 साल पूरा होने के मौके पर भारत में पहली बुलेट ट्रेन शुरू करने की.

लेकिन, अहमदाबाद और मुंबई के बीच चलने वाली बुलेट ट्रेन परियोजना की शुरुआत के वक्त ही इस पर सियासत शुरू हो गई है. मोदी तो शिंजो आबे के साथ दोस्ती को परवान चढ़ाकर भारत की ताकत बढ़ाने में लगे हैं. लेकिन, भारत में उनके विरोधी और कुछ सहयोगी भी उनकी रफ्तार पर विराम लगाने की कोशिश कर रहे हैं.

फाइलों से बाहर निकली बुलेट

अबतक जो बुलेट ट्रेन फाइलों में ही घूमती रह गई थी, अब फाइलों से बाहर निकलकर मुंबई-अहमदाबाद के बीच चलने की तैयारी करने लगी है. आस बढ़ी है, भरोसा भी बढ़ा है.

लेकिन, बीजेपी की सहयोगी शिवसेना को शायद भरोसा नहीं हो रहा है. अपनी पार्टी के मुखपत्र सामना के लेख के माध्यम से बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट पर ही सवाल खड़ा किया है. शिवसेना का मानना है कि बुलेट ट्रेन से मुंबई को कोई फायदा नहीं मिलेगा.

बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट की शुरुआत और मेक इन इंडिया के तहते इस प्रोजेक्ट में शुरू हो रहे काम से देश में बड़ी तादाद में रोजगार सृजन की बात कही जा रही है, लेकिन, शिवसेना को ऐसा नहीं लगता. शिवसेना की तरफ से कहा जा रहा है कि कभी भी जापानी कंपनी भारतीयों को रोजगार नहीं देगी.

क्यों विरोध पर उतरी है शिवसेना 

शिवेसना तो सरकार पर हमला करने में एक कदम आगे है. इसके पहले 25 अगस्त को अपने मुखपत्र सामना के लेख में शिवसेना की तरफ से कहा गया कि सरकार रेल हादसे रोकने और यात्रियों के जान-माल पर ध्यान देने के बजाए बुलेट ट्रेन लाने में लगी है. जाहिर है शिवसेना के तेवर सरकार पर तल्ख हैं.

अपनी सरकार के सहयोगियों का जब यह हाल है तो फिर विरोधियों की बात कौन करे. कांग्रेस ने पहले से ही बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को लेकर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है. कांग्रेस की तरफ से देश के अलग-अलग भागों में हो रहे हादसों को लेकर पूरी रेल-व्यवस्था और मोदी सरकार पर हमला हो रहा है.

कांग्रेस का सवाल है जब एक्सप्रेस ट्रेन पटरी पर ठीक से नहीं चल पा रहे हैं तो फिर हाईस्पीड वाली बुलेट ट्रेन का क्या होगा. लेकिन, कांग्रेस की बेचैनी बुलेट ट्रेन को लेकर नहीं, बल्कि अहमदाबाद में बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को लेकर हो रहे इस कार्यक्रम से है. कांग्रेस को परेशानी मोदी के साथ मोदी जैकेट में शिंजो आबे के रोड शो से है.

क्या है कांग्रेस की शिकायत?

कांग्रेस को लगता है कि मोदी ने इस रोड शो का इस्तेमाल अपनी लोकप्रियता बढाने के लिए किया है. अहमदाबाद में बुलेट ट्रेन के लिए भूमिपूजन का कार्यक्रम कराने से कांग्रेस असहज महसूस कर रही है. डर इस बात का है कहीं मोदी फिर से गुजरात में विकास और रफ्तार को धार देकर विधानसभा चुनाव के वक्त वाह वाही ना लूटने लगें.

pm modi shinzo abe

कांग्रेस ने बुलेट ट्रेन और शिंजो आबे के गुजरात दौरे को लेकर कई सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. पार्टी की तरफ से प्रवक्ता मनीष तिवारी ने तो यहां तक कह दिया है कि ''जापानी पीएम को दिल्ली की बजाय अहमदाबाद क्यों बुलाया? क्या बीजेपी और मोदी सरकार इसका फायदा आने वाले गुजरात असेंबली इलेक्शन में लेगी?

क्या व्यावहारिक नहीं है बुलेट ट्रेन?

कांग्रेस ने इस कदम को व्यावहारिक नहीं माना है. कांग्रेस को लगता है कि जापान के प्रधानमंत्री को दिल्ली बुलाया जाना चाहिए था. कांग्रेस की तरफ से बाकी नेताओं ने भी जापानी प्रधानमंत्री को अहमदाबाद बुलाकर पॉलिटिकल माइलेज लेने की कोशिश बताया है.

कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खडगे ने भी बुलेट ट्रेन योजना पर सवाल खड़े करते हुए कहा, 'यह योजना यूपीए सरकार के कार्यकाल में ही परवान चढ़ी थी. 2013 में यूपीए सरकार ने जापान के साथ एक समझौता किया था. मोदी सरकार उसी योजना को आगे बढ़ा रही है. मोदी सरकार को इसमें 3.5 साल का वक्त क्यों लगा.'

बहरहाल मनमोहन सरकार के दस साल के कार्यकाल में फाइलों में पड़ी बुलेट ट्रेन परियोजना को फाइलों से बाहर निकालकर मोदी ने अब धरातल पर ला दिया है. रफ्तार के रोमांच का मजा लेने के लिए भले ही पांच साल लग जाए, लेकिन, अब यह हकीकत में तब्दील होता दिख रहा है. विरोधियों की चिंता जायज भी हो सकती है, क्योंकि लगता नहीं है, इसे मोदी अपनी सरकार की बड़ी उपलब्धि के तौर पर गृह-राज्य गुजरात के चुनाव में भुनाने से परहेज करने वाले हैं.

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