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'रोटी की दोस्ती' से यादव वोटबैंक में कमल खिलाएगी बीजेपी

रोटी की दोस्ती से बीजेपी अब यादवों के कुनबे में कमल खिलाने की तैयारी कर रही है

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Jul 31, 2017 04:48 PM IST

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'रोटी की दोस्ती' से यादव वोटबैंक में कमल खिलाएगी बीजेपी

अभी तक बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह दलितों के घर ही भोजन करते थे. दलितों के घर भोजन कर उन्होंने बीएसपी जैसी पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाई. अब शाह की नजर समाजवादी पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक पर है. गैर यादव ओबीसी वोटबैंक पर पकड़ बनाने के बाद अमित शाह अब समाजवादी पार्टी के M-Y फैक्टर से Y को बीजेपी में जोड़ना चाहते हैं.

यूपी के दौरे पर आए अमित शाह ने रविवार को लखनऊ के जुगौली इलाके में बीजेपी कार्यकर्ता सोनू यादव के घर दोपहर का भोजन किया. उनके साथ सीएम योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम केशवप्रसाद मौर्य भी थे. सोनू यादव जुगौली बूथ के अध्यक्ष हैं.

क्या है शाह की रणनीति?

अमित शाह के यूपी दौरे में पहली प्राथमिकता इस बार जाटव और यादवों  को जोड़ने को लेकर थी. पार्टी के रणनीतिज्ञों ने यादव का घर तय किया. सोनू यादव जिस बूथ के अध्यक्ष हैं वहां तकरीबन ढाई हजार वोटरों में अकेले यादव ही 850 हैं. ऐसे में जुगौली की रोड पर बने सोनू यादव के घर लंच कर अमित शाह ये सियासी संदेश देने में कामयाब हो गए कि बीजेपी में यादवों के लिए भी स्थान और सम्मान है.

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यादव सिर्फ खुद को समाजवादी पार्टी के वोटर के तौर पर न समझें. शाह जानते हैं कि पांच साल के समय में समाजवादी पार्टी से जुड़े इस वोट बैंक का अगर एक तिहाई हिस्सा भी बीजेपी के साथ आ गया तो इसका फायदा न सिर्फ 2019 बल्कि अगले विधानसभा चुनाव में भी भरपूर मिलेगा.

हालांकि शिवपाल यादव के बीजेपी में शामिल होने के कयासों पर फिलहाल दोनों तरफ से चुप्पी है. वैसे भी शिवपाल यादव और मुलायम सिंह ने राष्ट्रपति चुनाव में रामनाथ कोविंद का समर्थन कर यादवों को बीजेपी का ही संदेश देने का काम किया है.

यादवों और जाटवों पर जोर

विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी अब यादवों और जाटवों को लेकर खास रणनीति से आगे बढ़ रही है. अब शाह ने भी सोनू यादव के जरिए यादव वोटरों को समझाने की कोशिश की. तभी उन्होंने न सिर्फ सोनू यादवों के पड़ौसियों से हालचाल पूछा बल्कि सीएम और डिप्टी सीएम के साथ लंच कर ये संदेश दिया कि यूपी की नई सरकार में किसी जाति या समुदाय के लिए भेदभाव नहीं है.

कभी ब्राह्मण और बनियों की पार्टी कहलाने वाली बीजेपी ने सबसे पहले केशव प्रसाद मौर्य को यूपी बीजेपी का अध्यक्ष बना कर ये संदेश दिया था कि यहां पिछड़ी जातियों के लिए अवसर के दरवाजे खुले हैं. अब बीजेपी खुद को सर्वसमाज की पार्टी बनाने की राह पर चल पड़ी है.

क्या है अमित शाह इफेक्ट?

यूपी में अमित शाह इफेक्ट भी दिखाई दिया. एसपी, बीएसपी से बागी हुई एमएलसी बीजेपी में शाम‌िल हो गए हैं. एसपी से इस्तीफा दे चुके बुक्कल नवाब और यशवंत स‌िंह के साथ बीएसपी छोड़ चुके एमएलसी जयवीर ‌सिंह बीजेपी में शामिल हो गए.

इस्तीफों की टाइमिंग ऐसी है कि अमित शाह के लखनऊ पहुंचते ही बुक्कल नवाब ने एसपी और विधान परिषद से इस्तीफा दे दिया. जबकि इसके बाद यशवंत सिंह और बीएसपी एमएलसी जयवीर सिंह ने भी पद और पार्टी से इस्तीफा दे दिया. ऐसे में एसपी और बीएसपी के भीतर अपने वर्तमान और भविष्य को लेकर आशंकित बड़े नाम वाले नेता भी अब बीजेपी के जहाज में सवार होने को बेकरार हैं.

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सियासत का स्वभाव ही अपने बनाए समीकरणों को पलटने वाला होता है. यूपी विधानसभा चुनाव में नतीजों ने सत्ता के बदले समीकरणों ने साबित भी किया. बीजेपी को मिली ऐतिहासिक सीटें जबर्दस्त बदलाव का प्रतीक हैं. हालांकि सभी पार्टियां अलग-अलग जातीय समूहों को अपनी पार्टी से जोड़ने के लिए बड़े स्तर पर रणनीति में बदलाव करती आई हैं.

बीजेपी की नई सोशल इंजीनियरिंग 

केशव प्रसाद मौर्य, राजभर समुदाय के ओमप्रकाश राजभर और पटेल समुदाय की अनुप्रिया पटेल का पार्टी में आना बीजेपी की नई सोशल इंजीनियरिंग की मिसाल हैं.

यही वजह है कि अब ब्राह्मण-बनियों की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी पिछड़ों की पार्टी भी नजर आती है. गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों को लुभाने के बाद अब जाटव और यादव वोटबैंक पर है. रोटी की दोस्ती से बीजेपी अब यादवों के कुनबे में कमल खिलाने की तैयारी कर रही है. अमित शाह की ये रणनीति अब समाजवादी पार्टी की नींद उड़ाने के लिये काफी है.

अमित शाह ने कहा भी है कि सिर्फ बीजेपी ही एक ऐसी पार्टी है जहां आखिरी पायदान का कार्यकर्ता भी बड़े पद पर बिठाया जा सकता है जबकि बीएसपी और एसपी में परिवारवाद हावी है.

जाहिर तौर पर जब शिवपाल यादव ही अपने घर की पार्टी में बेगाने हो गए तो ऐसे में दूसरे यादवों के लिये भी सपा से मोहभंग होते ज्यादा देर नहीं लग सकती. जो तबका संस्थापक मुलायम सिंह यादव का वफादार था वो भी अब सपा के नए निजाम के साथ सुर मिलाने से कतरा रहा है. ऐसे में बीजेपी के पास ये सबसे सटीक समय है कि वो सपा के असंतुष्ट यादवों और यादव वोटरों को बीजेपी की तरफ से न्योता भेज सकें.

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