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विकास पुरुष और सुशासन बाबू के बाद नीतीश कुमार का तीसरा अवतार

नीतीश समाज सुधारक की भूमिका में ज्यादा दिखाई देने लगे हैं.

Alok Kumar | Published On: Jun 06, 2017 08:07 AM IST | Updated On: Jun 06, 2017 08:07 AM IST

विकास पुरुष और सुशासन बाबू के बाद नीतीश कुमार का तीसरा अवतार

विकास पुरुष की छवि के साथ नीतीश ने शुरुआती दो कार्यकाल बिताए. इन दस वर्षों में सड़कों का जाल बिछा. कानून-व्यवस्था भी दुरूस्त हुई. थानों में नेताओं की धमक खत्म हुई. नौकरशाहों को छूट दी गई.

पर तीसरी पारी में नीतीश विकास पुरुष या सुशासन बाबू के बदले दार्शनिक और समाज सुधारक ज्यादा नजर आने लगे हैं. ऐसा सालभर आरजेडी के साथ सरकार चलाने के अनुभव के बाद महसूस होने लगा है. इस दौरान हत्या और हिंसा बढ़ी है. मुझे एनसीआरबी का नहीं पता पर पिछले एक महीने के दौरान यहां रहते हुए आंकड़ों की जानकारी जरूर है.

बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, मधुबनी, सीवान, छपरा और राजधानी पटना नब्बे के दशक के दर्शन करा रहे हैं. तब के डॉन की तरह कोई मिनी नरेश, सम्राट अशोक या छोटन शुक्ला तो नहीं दिखाई दे रहा लेकिन असंगठित हत्याएं बढ़ गई हैं. हो सकता है आंकड़ों के आधार पर मैं गलत साबित हो जाऊं और कोई कह दे कि औसत देखें तो पिछले 15 साल में मर्डर कम हुए हैं.

Nitish Kumar

मंद होती विकास की गति 

अपराध से इतर विकास की गति मंद पड़ती नजर आ रही है. शिक्षा का हाल तो रूबी और गणेश भईया बता ही रहे हैं.

कल-कारखानों में तेजी आई नहीं है. सरकारी कंपनियों को छोड़ दें तो निजी निवेश बेहद कम है. हालांकि हाल ही में टीसीएस ने पटना में कॉल सेंटर खोलकर बड़ी लकीर खींची है. पर इसका क्रेडिट भी बीजेपी लेने पर तुली हुई है क्योंकि केंद्र में उनकी सरकार है. बाढ़-बरौनी में बिजली घर के नए यूनिट लगें हो या छपरा-मोकामा रेलवे वैगन फैक्ट्री में फिर से सुगबुगाहट दिखी हो, ये सब सरकारी कंपनियों के प्रयास हैं.

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शुरुआत में नीतीश कुमार खुद कहा करते थे कि निवेश लाने के लिए कानून-व्यवस्था, माल ढुलाई यानी सड़क और बिजली की जरूरत है. सड़क और बिजली के मामले में प्रगति हो गई लेकिन नए निवेश और रोजगार के मौके नहीं बन पाए.

शायद, इसलिए कि तीसरी पारी में कानून-व्यवस्था फिर सोचने पर मजबूर कर रही है. रंगदारी और वसूली बड़ी बाधा है. ऊपर से सिंगल विंडो सिस्टम आज तक लागू नहीं हो पाया.

Patna: Citizens make a state level human chain to support liquor prohibition called by CM Nitish Kumar in Patna on Saturday. PTI Photo(PTI1_21_2017_000063B)

सिर्फ भावनात्मक मुद्दों को क्यों उठा रहे हैं नीतीश? 

ऐसे में बतौर नेता नीतीश ने रणनीति बदल ली है. अचानक मुद्दों से हट कर वह भावनात्मक मामलों पर जोर देने लगे हैं. इसकी शुरुआत शराबबंदी से हुई. इसकी आड़ में उन्होंने आधी आबादी को सॉलिड वोट बैंक के तौर पर साधने की कोशिश की.

हालांकि ये बात दीगर है कि शराबबंदी ने लाइन होटल, मोटल और दुकानों पर काम करने वाले हजारों को रातों-रात बेरोजगार कर दिया और इनमें से अधिकतर छोटे-मोटे अपराधी हो गए.

आजकल शराब नीतीश के हर सार्वजनिक संबोधन का हिस्सा है. शराब के बाद गंगा प्रेम उफान मार रहा है. उन्होंने गंगा के गाद को मुद्दा बनाया है. गंगा बिहार के बीचो-बीच गुजरती है. गंगा में श्रद्धा रखने वालों की कमी भी नहीं है. उन्हें ये मुद्दा भा रहा है.

लेकिन भावनात्मक मुद्दे यहीं खत्म नहीं होते. नीतीश दहेज प्रथा के खिलाफ मुहिम चलाने वाले हैं. उन्होंने अपने मंत्रियों से कहा है कि दहेज वाले शादी समारोह में न जाएं. वो साल के आखिर में दहेज के खिलाफ बड़ा आयोजन भी करने वाले हैं.

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नीतीश का समाज सुधारक अवतार  

विपक्ष का आरोप है कि असली मुद्दों से ध्यान बंटाने के लिए नीतीश ये सब कर रहे हैं. चुनाव में लालू के साथ जाने के बावजूद उन्हें वोट मिले क्योंकि वोटर को लगा कि स्टीयरिंग नीतीश के हाथ में होगी. अब स्टीयरिंग फिसल रही है तो मुद्दे भी बदल रहे हैं.

वहीं, कुछ लोग नीतीश को मोदी से प्रभावित बताने लगे हैं. गंगा-गाय-पाकिस्तान-काला धन इन सब मुद्दों पर वैचारिक एका उत्सुकता पैदा कर रही है कि बिहार की भावी राजनीति किस और जाने वाली है.

नीतीश की राह मोदी से अलग रहेगी या साथ ये नहीं मालूम पर नीतीश सुशासन बाबू और विकास पुरुष की तुलना में समाज सुधारक की भूमिका में ज्यादा दिखाई देने लगे हैं.

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