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बिहार: महागठबंधन की गांठ सुलझने की बजाय उलझती जा रही है

नीतीश के एनडीए उम्मीदवार के साथ जाने के बाद लालू को लगने लगा है कि अब एक बार फिर से वो सोनिया दरबार में अपने नंबर बढ़ाने में सफल हो जाएंगे

Amitesh Amitesh | Published On: Jun 29, 2017 11:10 AM IST | Updated On: Jun 29, 2017 12:19 PM IST

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बिहार: महागठबंधन की गांठ सुलझने की बजाय उलझती जा रही है

जेडीयू के प्रधान महासचिव के. सी. त्यागी के एनडीए में ज्यादा सहज होने वाले बयान और उसके बाद मची सियासी हलचल के बाद के सी त्यागी कह रहे हैं कि गठबंधन 2020 तक अटूट है. उनके मुताबिक, रामनाथ कोविंद को समर्थन देने के फैसले के बाद जिस तरीके से आरजेडी-कांग्रेस के लोगों ने प्रतिक्रिया दी थी. उनको जवाब देना जरूरी हो गया था, जिसके बाद हमने ये बयान दिया था.

अब के सी त्यागी विपक्षी को अपील कर रहे हैं. अपील है अब 17 जुलाई के बाद के लिए सोचें. 17 जुलाई को राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हो जाएगा, जिसके बाद विपक्षी दलों को आगे की रणनीति पर एक जुट होकर काम करने की बात कर रहे हैं.

दरअसल, के सी त्यागी गठबंधन में लगातार उठ रही आग को तात्कालिक तौर पर बुझाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन उनके बयान से महागठबंधन के भीतर की उलझन ही सामने आ रही है.

आरजेडी और जेडीयू के बीच तनातनी तो पहले से ही थी लेकिन, कांग्रेस की तरफ से नीतीश कुमार पर की गई टिप्पणी ने जेडीयू को भीतर से आग बबूला कर दिया है.

जेडीयू नेता के सी त्यागी ने फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में कहा कि गुलाम नबी आजाद जैसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने तो बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार को राजनैतिक अवसरवादी कहना शुरू कर दिया. इसके बाद हमने आजाद को जवाब दिया.

दरअसल, ये पूरी लड़ाई तो राष्ट्रपति चुनाव को लेकर जेडीयू के अलग रवैये से है. लेकिन, ये सबकुछ अचानक नहीं हुआ है. बिहार में महागठबंधन के तीनों दल राष्ट्रपति चुनाव के ही बहाने सही अपनी आगे की पोजिशनिंग कर रहे हैं.

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बात पहले जेडीयू की करें तो उसके नेता नीतीश कुमार ये दिखाना चाहते हैं कि हमने साफ-सुथरी छवि के रामनाथ कोविंद को समर्थन देने का फैसला किया है. ऐसा कर नीतीश कुमार बिहार में भी अपने दलित जनाधार को बरकरार रखना चाहते हैं.

खासतौर से नीतीश की तरफ से संदेश है कि बिहार के गवर्नर रह चुके रामनाथ कोविंद ने राजभवन में एक  ऐसी मिसाल पेश की जो कि बाकी लोगों के लिए भी एक उदाहरण है. नीतीश कुमार के साथ इस दौरान ना ही किसी तरह की कोई खींचतान देखने को मिली, ना ही कभी उन पर पक्षपात का आरोप लगा. नीतीश अब इसी का सिला दे रहे हैं.

लेकिन, इस फैसले से साफ है कि नीतीश कुमार लालू यादव के साथ खड़े नहीं होना चाहते. खासतौर से लालू यादव के दोनों बेटों और परिवार के ऊपर जब से भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, नीतीश काफी असहज भी हैं और उनसे दूरी बनाने की कोशिश भी कर रहे हैं.

अपने फैसले से उन्होंने साफ भी कर दिया है कि भले ही आरजेडी –कांग्रेस के सहयोग से वो सरकार चला रहे हों, लेकिन, इनके हर फैसले मानने के लिए वो बाध्य नहीं हैं.

लालू की सोनिया के दरबार में नंबर बढ़ाने की कोशिश

दूसरी तरफ, आरजेडी की अपनी अलग रणनीति और अलग सोच है. चारा घोटाले में फंसे लालू यादव के परिवार के ऊपर भी जब से बेनामी संपत्ति के आरोप लगा लगे हैं, तब से वो चारों तरफ से घिर गए हैं. लालू को डर सता रहा है कि इनकम टैक्स की कारवाई के बाद नीतीश कहीं उनसे अलग ना हो जाएं.

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लिहाजा लालू की तरफ से नीतीश को घेरने की कोशिश हो रही है. नीतीश के एनडीए उम्मीदवार के साथ जाने के बाद लालू को लगने लगा है कि अब एक बार फिर से वो सोनिया दरबार में अपने नंबर बढ़ाने में सफल हो जाएंगे. हाल के सियासी घटनाक्रम ने साबित भी कर दिया है कि लालू और कांग्रेस के बीच बनी दूरी फिलहाल खत्म हो रही है और वो कांग्रेस के एक बार फिर से भरोसेमंद हो गए हैं.

दरअसल, महागठबंधन के वक्त लालू से ज्यादा कांग्रेस ने नीतीश पर भरोसा किया था. उस वक्त कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने नीतीश कुमार को महागठबंधन की तरफ से मुख्यमंत्री पद का उम्मीवार प्रोजेक्ट करने में बड़ी भूमिका निभाई थी. नीतीश ने कांग्रेस को साध कर लालू को दवाब में रखा था. लेकिन, अब लालू को एक बार फिर से नंबर बढ़ाने का मौका मिल गया है लिहाजा लालू मीरा कुमार के बहाने अपने दांव में लगे हैं.

लेकिन, राष्ट्रपति चुनाव के बहाने कांग्रेस अब विपक्षी  दलों के बीच अपनी साख चमकाने की कोशिश में है. कांग्रेस को लग रहा है कि नीतीश कुमार के  इस तरह से अलग स्टैंड लेने के बाद विपक्षी दलों के बीच उनकी स्वीकार्यता कम होगी. क्योंकि अब तक नीतीश कुमार विपक्षी दलों के सबसे भरोसेमंद चेहरे के तौर पर उभरकर सामने आ रहे थे. लेकिन, सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस कभी भी इस बात के लिए तैयार नहीं होती कि विपक्ष का नेतृत्व उसकी बजाए कोई और करे.

अब फिलहाल कांग्रेस अपनी पोजिशनिंग कर रही है, जिसमें वो मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में बाकी सभी विपक्षी दलों की अगुआई करे.

लेकिन, महागठबंधन के तीनों दलों की इस कवायद में कहीं मौका हाथ से ना निकल जाए. क्योंकि राष्ट्रपति चुनाव तो महज एक पड़ाव है. आगे आने वाले दिनों में कई ऐसे मौके होंगे जब आरजेडी और कांग्रेस से नीतीश की राह कुछ अलग हो सकती है.

लेकिन, महागठबंधन की अग्निपरीक्षा तब होगी जब लालू के दोनों बेटों के ऊपर भ्रष्टाचार के मामले में अगर केस दर्ज हो जाएगा. नीतीश कैबिनेट में शामिल तेजस्वी और तेजप्रताप पर अगर शिकंजा कसता है तो फिर  नीतीश कुमार के लिए उन्हें अपने कैबिनेट में बरकरार रखना मुश्किल होगा.

जेडीयू नेता इस बारे में  फिलहाल बोलने से बच रहे हैं. लेकिन, इतना जरूर दावे के साथ कह रहे हैं कि नीतीश उस वक्त भी अपनी छवि से समझौता नहीं करेंगे.

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