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भीम आर्मी: क्या नए नेताओं से लौटेगी दलित राजनीति की खोई धार?

दलित युवा अब अपने सवालों के लिए बहुजन समाज पार्टी के अलावा नए विकल्पों की तरफ भी देख रहे हैं

Rakesh Kayasth | Published On: May 23, 2017 07:52 AM IST | Updated On: May 23, 2017 07:52 AM IST

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भीम आर्मी: क्या नए नेताओं से लौटेगी दलित राजनीति की खोई धार?

दिल्ली के जिस जंतर-मंतर से अन्ना हजारे का आंदोलन शुरू हुआ था, उसी जंतर-मंतर पर रविवार को बड़ी तादाद में देशभर से आये दलित जुटे. जैसा कि आमतौर पर होता है, ज्यादातर न्यूज चैनलों पर यह खबर नहीं थी. दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े दावों के अंबार लगे थे.

सही संख्या कितनी थी, इस बारे में अलग-अलग अनुमान हैं. संख्या जो भी हो, लेकिन असली बात यह है कि यूपी चुनावों में बीएसपी की करारी हार के बाद से यह दलितों का पहला शक्ति प्रदर्शन था और वह भी किसी राजनीतिक दल के बैनर के बिना.

नए दलित नेतृत्व का उभार

कड़े सुरक्षा इंतजाम के बीच हुए इस कार्यक्रम में ना तो मायावती का कोई पोस्टर था, ना हाथी का कोई निशान. नौजवानों में गजब का जोश था. उनके सिर पर भीम लिखी नीली टोपियां थीं और साथ ही दिखाई दे रहे थे, सैकड़ों की तादाद में भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर के मुखौटे.

गौर से देखें तो इन तस्वीरों में एक नई कहानी छिपी है. इस कहानी की शुरुआत करीब डेढ़ साल पहले जिग्नेश मेवाणी के नेतृत्व में गुजरात के ऊना में हुए आंदोलन से हुई थी और अब यह आगे बढ़ती नजर आ रही है. मतलब साफ है- दलित युवा अब अपने सवालों के लिए बहुजन समाज पार्टी के अलावा नए विकल्पों की तरफ भी देख रहे हैं.

कौन हैं, चंद्रशेखर आजाद `रावण’?

दलित समाज के बीच तेजी से लोकप्रिय होता नया नाम है, चंद्रशेखर आजाद का, जो खुद रावण कहलाना पसंद करते हैं. कानून की डिग्री रखने वाले चंद्रशेखर आजाद की उम्र करीब 30 साल है और वे भीम आर्मी के कर्ता-धर्ता हैं.

यह संगठन उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में दलित उत्पीड़न के खिलाफ अपने ढंग से लड़ाई लड़ने का दावा करता है. संगठन का कहना है कि उसका तरीका पूरी तरह सांवैधानिक है, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर आत्मरक्षा के लिए जवाबी कार्रवाई करने से उसे कोई परहेज नहीं है.

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जिग्नेश मेवाणी और चंद्रशेखर आजाद  'रावण '(तस्वीर: जिग्नेश मेवाणी के फेसबुक वाल से)

चंद्रशेखर ने दलितों के सम्मान और सुरक्षा को अपना मुद्दा बनाया है. चंद्रशेखर का कहना है कि रावण ने अपनी बहन शूर्पनखा के अपमान का बदला लेने के लिए सीता हरण किया था. इसके बावजूद उसने सीता को पर्याप्त सम्मान दिया इसलिए रावण वो को खलनायक नहीं बल्कि नायक मानते हैं.

सहारनपुर में दलितों के घर जलाए जाने के बाद भड़की हिंसा के लिए प्रशासन ने भीम आर्मी के लोगों को भी दोषी ठहराया था. कई कार्यकर्ता गिरफ्तार किए गए और अब भी जेल में बंद हैं. चंद्रशेखर के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया गया. जंतर-मंतर का कार्यक्रम मुकदमे वापस लेने और दलितों के घर जलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर था.

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गुजरात के ऊना का आंदोलन भी दलितों की पिटाई के विरोध में था. यानी उत्पीड़न के खिलाफ युवा नेताओं की अगुआई में छोटे-छोटे आंदोलन खड़े हो रहे हैं. इन आंदोलनों के सवाल राजनीतिक हैं, लेकिन बैनर गैर-राजनीतिक हैं.

ऊना के आंदोलन ने जिग्नेश मेवाणी को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी थी और अब सहारनपुर की घटना के बाद चंद्रशेखर आजाद रातों-रात दलित नौजवानों के हीरो बन चुके हैं.

लौट रहे हैं दलित मूवमेंट के तीखे तेवर

जिग्नेश मेवाणी हों या चंद्रशेखर आजाद `रावण’, नौजवान दलित नेताओं के तेवर तीखे हैं. वे ब्राह्मणवादी व्यवस्था को उसी तरह ललकार रहे हैं, जिस तरह बीएसपी के शुरुआती दिनों में कांशीराम और मायावती ललकारा करते थे.

मेवाणी के आंदोलन के दौरान गुजरात के दलितों ने मरे हुए जानवरों के खाल उतारने से इनकार कर दिया था और खेती के लिए जमीन दिए जाने की मांग बुलंद की थी.

चंद्रशेखर आजाद भी दावा कर रहे हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तरह जल्द ही पूरे भारत में भीम आर्मी की शाखाएं खोली जाएंगी और प्रशासन ने साथ नहीं दिया तो दलितों पर अत्याचार करने वालों से अपने तरीके से निपटा जाएगा.

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भीम आर्मी का दिल्ली चलो अभियान का पोस्टर (तस्वीर: जिग्नेश मेवाणी के फेसबुक वाल से)

इतना ही नहीं भीम आर्मी इस बात की धमकी भी दे रही है कि मांगे ना माने जाने की सूरत में बड़ी संख्या में दलित सार्वजनिक समारोह में हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाएंगे.

मायावती ने शुरुआती तीखेपन के बाद अपनी रणनीति बदली थी और बहुजन से सर्वजन पर आ गई थीं. इस बदलाव का मकसद अपर कास्ट के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाकर सत्ता हासिल करना था. इस कोशिश में वे कामयाब भी रहीं. लेकिन दलित राजनीति अपनी धार खो बैठी. युवा नेता कुंद पड़ चुकी दलित राजनीति पर फिर से धार चढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.

दलित राजनीतिक के अनुकूल हैं मौजूदा हालात

दरअसल पिछले दो-तीन साल के घटनाक्रम को देखें तो साफ है कि परिस्थितियां हार्डकोर दलित मूवमेंट के अनुकूल हैं.

केंद्र और कई राज्यों में बीजेपी की सरकार बनने के बाद ऊंची जातियों ने अपना पुराना वर्चस्व हासिल करने की कोशिशें तेज कर दी हैं. संघ परिवार से जुड़े संगठन भी अपना एजेंडा लागू करने की कोशिश कर रहे हैं.

इसी कड़ी में जगह-जगह से दलितों की उत्पीड़न की खबरें आ रही हैं. अपनी राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे दलित समाज के लिए अस्मिता का सवाल एक बार फिर से सामने आ गया है. ऐसे में आक्रमकता का बढ़ना और नए रास्तों की तलाश की बेचैनी स्वभाविक है.

आसान नहीं है रास्ता

आंदोलन चाहे जिग्नेश मेवाणी का हो या फिर चंद्रशेखर आजाद रावण का, इनके आगे का रास्ता क्या होगा, यह अभी साफ नहीं है. इन आंदोलनों से अगर कोई राजनीतिक जमीन तैयार होती है, तो वह किसके काम आएगी? मायावती दलितों के बीच भी अपनी साख खोती जा रही हैं.

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जंतर-मंतर पर भीम आर्मी के समर्थक कुछ इस अंदाज में दिखे (तस्वीर: फेसबुक से)

यूपी चुनाव के बाद उन्होने अपने तीन दशक पुराने साथी नसीमुद्दीन सिद्धिकी को पार्टी से निकाल बाहर किया. बदले में नसीमुद्दीन ने उनपर करप्शन के संगीन इल्जाम लगाये. केंद्र सरकार की एजेंसियां उनके पीछे पड़ी हैं, वो अलग.

इतना ही नहीं अपने भाई आनंद कुमार को एक तरह से उत्तराधिकारी घोषित करके मायावती ने तय कर दिया है कि वो तमाम पार्टियों की तरह वंशवाद की राह पर ही चलेंगी.

ऐसे में नए दलित नेताओं का क्या होगा? चुनावी राजनीति के सबसे बड़े दलित नायक कांशीराम कहा करते थे- ‘सत्ता वह चाबी है, जो कई ताले खोल सकती है.’ क्या नए दलित नेता चुनावी राजनीति में उतरकर सत्ता की चाबी हासिल करने की कोशिश करेंगे? भारत में दलित वोटरों की तादाद लगभग बीस फीसदी है.

लेकिन वे अकेले कुछ नहीं कर सकते. दलित, ओबीसी और मुसलमानों को साथ जोड़ने की वैचारिक कवायद बरसों से चल रही है. लेकिन मौजूदा हालात में दूर-दूर तक इस कोशिश के कामयाब होने कोई आसार नहीं दिखते.

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ओबीसी का बहुत बड़ा तबका बीजेपी के साथ है. यूपी चुनाव के दौरान बीजेपी ने गैर जाटव दलितों के वोट हासिल करके यह बता दिया कि जमीनी स्तर पर वह कितनी मुस्तैद और संगठित है.

ऐसे में दिल्ली के जंतर-मंतर या ऊना में जुटी आंदोलनकारियों की भीड़ सिर्फ भीड़ बनकर रह जाए तो कोई ताज्जुब नहीं होगा. आजादी के बाद से बीएसपी देश का पहला और आखिरी दलित आंदोलन रहा है, जिसने अपने लोगो की ताकत को वोट में बदलकर सत्ता की चाबी हासिल की.

क्या कोई दूसरा बीएसपी पैदा होगा, क्या तमाम छोटे आंदोलन बीएसपी को मजबूत करेंगे या फिर ये आंदोलन समय के साथ अपनी मौत मर जाएंगे? सवाल कई हैं और पक्का जवाब किसी के पास नहीं.

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