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बवाना उपचुनाव में आप की बड़ी जीत: बीजेपी ने अपनी लुटिया खुद ही डुबो दी!

केजरीवाल रहस्यमयी चुप्पी के साथ मोदी सरकार से टकराव का रास्ता छोड़ धीरे-धीरे जनता के दरबार की ओर रुख कर रहे थे.

Amitesh Amitesh Updated On: Aug 28, 2017 04:06 PM IST

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बवाना उपचुनाव में आप की बड़ी जीत: बीजेपी ने अपनी लुटिया खुद ही डुबो दी!

दिल्ली की बवाना विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत हुई है. बवाना सुरक्षित सीट से आप उम्मीदवार रामचंद्र ने बीजेपी उम्मीदवार वेदप्रकाश को 24 हजार से ज्यादा वोटों से हरा दिया. इस सीट पर कांग्रेस के सुरेंद्र कुमार तीसरे नंबर पर रहे.

बवाना में उपचुनाव आप के विधायक वेदप्रकाश के इस्तीफे के कारण कराना पड़ा था. आप विधायक वेदप्रकाश ने एमसीडी चुनाव के वक्त आप से इस्तीफा देकर बीजेपी का दामन थाम लिया था. आप छोड़ते वक्त वेदप्रकाश ने केजरीवाल पर खूब निशाना भी साधा था.

जब उपचुनाव हुए तो बीजेपी ने आप के ही पूर्व विधायक वेदप्रकाश को ही टिकट थमा दिया. लेकिन, बीजेपी का यह दांव उल्टा पड़ गया और इतनी बड़ी हार हो गई.

क्यों हार गई बीजेपी?

विधानसभा चुनाव 2015 में बुरी तरह से पीटने के बाद बीजेपी ने अपनी रणनीति बदलकर काम करना शुरू कर दिया था. पार्टी उसी वक्त से दिल्ली नगर निगम यानी एमसीडी के चुनाव की तैयारी में लग गई थी.

बीजेपी आलाकमान अरविंद केजरीवाल के हाथों मिली हार को पचा नहीं पा रहा था. उस वक्त आलाकमान को लगा कि अगर एमसीडी भी हाथ से निकल गई तो फिर दिल्ली पूरी तरह से बीजेपी के हाथ से फिसल जाएगी.

रणनीति बनी और उसी रणनीति के तहत पूर्वांचल के लोगों को लुभाने के लिए भोजपुरी गायक और कलाकार, दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी को दिल्ली बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया. इसके अलावा पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के इशारे पर एक ही झटके में पुराने सभी पार्षदों का टिकट काटकर नए उम्मीदवारों को चुनावी समर में उतार दिया.

बीजेपी का दांव चल गया और सफल रणनीति के तहत पार्टी ने एमसीडी चुनाव में आप और कांग्रेस दोनों को धूल चटा दी.

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यहां तक कि राजौरी गार्डेन विधानसभा उपचुनाव में भी बीजेपी को जीत मिल गई जिसे बीजेपी की दिल्ली में वापसी के संकेत के तौर पर देखा जाने लगा. राजौरी गार्डेन सीट से आप के विधायक जरनैल सिंह के इस्तीफे देकर पंजाब विधानसभा चुनाव लड़ने के कारण उपचुनाव कराना पड़ा था.

राजौरी गार्डेन की जनता ने जरनैल सिंह के इस तरह इस्तीफे देकर चले जाने को अपने दिल पर ले लिया और फिर दिल की आवाज पर ही ‘आप’ को ठिकाने लगा दिया.

लेकिन, इस हार से सबक आम आदमी पार्टी ने तो ले लिया लेकिन, बीजेपी जीत के आगोश में इस कदर मदहोश हो गई कि उसने राजौरी गार्डेन में की गई ‘आप’ की गलती को खुद बवाना में दोहरा दिया. बीजेपी के नेता बवाना के वोटर को समझाने में पूरी तरह विफल रहे कि आखिर इस तरह इस्तीफा दिलाकर आप के विधायक को बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ाने का क्या मतलब. इससे आखिर क्या हासिल होगा.

70 सदस्यीय विधानसभा में आप के पास 65 विधायक थे, ऐसे में एक सीट पर जीत या हार से केजरीवाल सरकार पर क्या फर्क पड़ता. अगर ऐसा नहीं था तो फिर उपचुनाव थोपने की जरूरत ही क्या थी. बीजेपी ने यहीं बड़ी गलती कर दी. बीजेपी एमसीडी चुनाव में जीत के बाद ऐसी बड़ी गलती कर गई जो उसे लंबे वक्त तक कचोटती रहेगी.

बीजेपी यह समझने मे गलती कर गई कि आप विधायक वेदप्रकाश की जीत अपने दम पर नहीं बल्कि अरविंद केजरीवाल के नाम पर हुई थी. 2015 के विधानसभा चुनाव में आप की लहर में जीते वेदप्रकाश का अपना ना कोई जनाधार था और ना ही किसी तरह की संगठन में पकड़.

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बीजेपी को समझने में बड़ी भूल हो गई कि जनाधार विहीन वेदप्रकाश को साथ रखकर वो कुछ हासिल नहीं कर पाएगी. रही-सही कसर बीजेपी के निराश कार्यकर्ताओं ने भी पूरी कर दी. एमसीडी चुनाव में जीत के बाद बीजेपी के भीतर की खींचतान भी खुलकर सामने आ गई थी. मनोज तिवारी के दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद एमसीडी चुनाव में बीजेपी को बड़ी जीत मिली थी.

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लेकिन, इस जीत के बाद आपस में ही बीजेपी नेताओं में जीत का श्रेय लेने की होड़ लग गई थी. नए नवेले पार्षदों के स्वागत के नाम पर मनोज तिवारी के साथ पूर्व बीजेपी अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री विजय गोयल का झगड़ा सबके सामने आ गया था.

जीत की ललक और जीत के बाद के असर को बीजेपी की आंतरिक कलह ने बर्बाद कर दिया था. ऐसे में बवाना में किसी दूसरे परिणाम की अपेक्षा  भी नहीं थी.

बवाना की जीत से आप को मिली संजीवनी!

बवाना विधानसाभा उपचुनाव की जीत अरविंद केजरीवाल के लिए संजीवनी बनकर आई है. अब एक बार फिर से बढ़े मनोबल के साथ आप सरकार विरोधियों पर वार करेगी. लेकिन, यह सबकुछ यूं ही नहीं हुआ है.

केजरीवाल को करीब से जानने वाले मानते हैं कि पिछले कुछ महीनों में उन्होंने अपनी रणनीति बदल दी है. हमेशा विवादों में उलझने और हर मसले पर बोलने के बजाए वो अपने काम को लेकर ज्याद सतर्क हैं. उन्हें इस बात का एहसास हो गया है कि उनका बड़बोलापन उनकी सियासत के लिए नुकसानदेह हो सकता है.

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एमसीडी की हार के बाद केजरीवाल ने चुप्पी साध रखी थी. बड़बोले केजरीवाल की चुप्पी पर चटकारे लिए जाने लगे थे. सोशल मीडिया से लेकर हर प्लेटफॉर्म पर केजरीवाल की चुप्पी की चर्चा थी. लेकिन, गोवा, पंजाब के अलावा दिल्ली नगर निगम की हार ने केजरीवाल को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया था.

केजरीवाल ने अपना संयम नहीं तोड़ा, अपना आपा नहीं खोया. रहस्यमयी चुप्पी के साथ मोदी सरकार से टकराव का रास्ता छोड़ धीरे-धीरे जनता के दरबार में अपने नंबर बढ़ाने में लगे रहे.

अब उनकी इस कोशिश का सकारात्मक परिणाम भी सामने दिख रहा है. भले ही बवाना उपचुनाव को बीजेपी की हार के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन, यह जीत अरविंद केजरीवाल के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है.

 

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