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यह हिंदू नहीं, राष्ट्रीय आतंकवाद है

वल्लभगढ़ हत्याकांड पर देश की चुप्पी बेहद डराने वाली है

Rakesh Kayasth Updated On: Jun 24, 2017 05:08 PM IST

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यह हिंदू नहीं, राष्ट्रीय आतंकवाद है

हरियाणा के वल्लभगढ़ में भीड़ ने चलती ट्रेन में दो भाइयों पर जानलेवा हमला किया. वजह क्या थी-उनकी दाढ़ी, उनकी टोपी या बीफ खाने का शक? जितनी मुंह उतनी बातें. लेकिन तथ्य ये है कि ईद की खरीदारी करने निकले दोनों भाइयों में से एक ने मौके पर ही दम तोड़ दिया और दूसरा अस्पताल में मौत से जूझ रहा है.

खबर जितनी डरावनी है, उससे ज्यादा डराने वाली है, इस पर चुप्पी. एकाध बयानों को छोड़कर सरकारी हलकों में सन्नाटा है. केंद्र सरकार चुप, हरियाणा सरकार चुप, रेल मंत्रालय चुप. कुछ राष्ट्रीय अखबारों ने छोटी सी खबर छापी है तो कुछ ने सिर्फ पुलिस का बयान. मरने वालों के रिश्तेदारों का कोई पक्ष नहीं. मरने वाले का नाम जुनैद था.

इससे पहले अखलाक, पहलू और जफर नाम के तीन और व्यक्तियों को इसी तरह  भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला. मुद्दा वही, कहीं बीफ होने का शक तो कहीं खुले में शौच कर रही महिलाओं की तस्वीर खींचने से रोका जाना. शुरुआत अखलाक से हुई थी. तब देश भर में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी. लेकिन अब ऐसा लगता है कि देश को इन खबरों की आदत पड़ गई है.

हिंसा को जायज ठहराने की खतरनाक प्रवृति

इसमें कोई शक नहीं है कि हाल के दिनों में भीड़ की हिंसा का शिकार बने लोग एक ही समुदाय के थे. वजह एक ही थी और वो है- नफरत. सोशल मीडिया पर आनेवाली प्रतिक्रियाओं को देखे तो साफ समझ में आता है कि समाज किस दिशा में जा रहा है. हिंसा पर चिंता जताने वाली प्रतिक्रियाएं भी हैं. लेकिन उतनी ही प्रतिक्रिया ऐसे लोगों की है, जो घुमा-फिराकर भीड़ की इस हिंसा को वैध ठहरा रहे हैं और उल्टा सवाल ये पूछ रहे हैं कि आखिर इस घटना को इतना तूल क्यों दिया जा रहा है.

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में राह चलते लोगों को सरेआम पीट-पीटकर मार दिया जाना अब कोई राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है. क्या लोग अब सचमुच इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि अपने परिवार में होनेवाली मौत के अलावा किसी और की मौत उन्हे विचलित नहीं करती? सवाल ये है कि अगर मरने वाले का नाम जुनैद की जगह जयराम होता क्या तब भी इतनी ही ठंडी प्रतिक्रिया होती?

भीड़ तंत्र के हवाले देश

भीड़ एक बहुत खतरनाक चीज है, जिसका इस्तेमाल सत्ता तंत्र हमेशा अपने फायदे के लिए करता आया है. यह प्रवृति किसी एक पार्टी या विचारधारा तक सीमित नहीं है. 1984 के दंगे याद कीजिए और 1992 का बाबरी कांड. भीड़ तंत्र हमेशा इस देश में मौजूद रहा है- बेलगाम और विध्वंसक.

भीड़ के इस्तेमाल का सबसे बड़ा फायदा ये है कि आखिर में गुनहगार कोई साबित नहीं होता. देश इस समय भीड़ तंत्र के हवाले है. कहीं उकसावे की वजह से तो कहीं स्वत:स्फूर्त तरीके से जिसे सामूहिक उन्माद या मास हीस्टीरिया कहते हैं.

ram mandir

राष्ट्रीय स्वभाव बना नफरत

यह ठीक है कि पिछले कुछ दिनों में भीड़ की ये हिंसा एक समुदाय विशेष के खिलाफ रही है. लेकिन जो लोग ये सोचते हैं कि मामला सिर्फ हिंदू-मुसलमान का है, वे गलत है. अगर नफरत राष्ट्रीय स्वभाव बनेगा तो आग में कोई एक समुदाय नहीं बल्कि पूरा देश जलेगा.

सरकारी नौकरियों में आरक्षण मांग रहे जाटों की हिंसा का शिकार आखिर कौन लोग हुए? गुजरात के पाटीदार आंदोलन में हुई हिंसा से नुकसान किसका हुआ? हिंसा करने वाले भी हिंदू थे और हिंसा का शिकार भी हिंदू.

उत्तर प्रदेश में स्वयंभू गोरक्षकों की हिंसा की आंच कई हिंदुओं तक भी पहुंची. ग्रेटर नोएडा में मुसलमान होने के शक की वजह से हिंदू व्यापारियों की पिटाई हुई. यही कहानी मेरठ में भी दोहराई गई जब भीड़ ने एक बीजेपी नेता को ही बुरी तरह पीटा. नफरत की चिंगारी एक बार भड़कती है तो फिर ये तय कर पाना मुश्किल हो जाता है कि उसकी आंच में कौन जलेगा और कौन उससे बच पाएगा.

पाकिस्तान की राह पर भारत

हिंदू आतंकवाद एक ऐसा शब्द है, जिसके आते ज्यादातर लोगो को दौरा पड़ जाता है. मैंने हिंदू आतंकवाद शब्द का प्रयोग कभी नहीं किया. बावजूद इसके कि अजमेर ब्लास्ट में आरएसएस से जुड़े लोगों को अदालत ने सजा दे दी. मालेगांव और समझौता ब्लास्ट के तार सीधे-सीधे कुछ हिंदू संगठनों से जुड़े. इस समय देश में जो कुछ चल रहा है कि वह एक तरह का राष्ट्रीय आतंकवाद है.

राष्ट्रीय आतंकवाद तब पैदा होता है, जब देश की बड़ी आबादी आहिस्ता-आहिस्ता कट्टर होती चली जाती है. हिंसा समाज के बड़े तबके का स्वभाव बन जाता है और हिंसा के प्रतिकार को वह कायरता के चिह्न के रूप में देखने लगता है.

पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.  पाकिस्तान शुरू में मुसलमानों का देश बना. लेकिन नफरत पूरे पाकिस्तानी समाज में अंदर तक रची-बसी था. धीरे-धीरे पाकिस्तान मुसलमानों से सुन्नियों का देश हो गया और अब वह पंजाबी सुन्नियों का देश बन चुका है.

लाखों लोगों को मिटाकर नफरत नहीं मिटी. क्या भारत अब पाकिस्तान के नक्शे-कदम पर नहीं चल पड़ा है. विचारधाराओं से उपर उठकर देश के हर जिम्मेदार नागरिक को इस सवाल पर गंभीरता से सोचना चाहिए.

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