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बाबरी मस्जिद मामला: 19 साल पहले की 'गलती' ने मोदी को मुश्किल में डाला

आडवाणी और जोशी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है

Sanjay Singh | Published On: Apr 21, 2017 09:40 AM IST | Updated On: Apr 21, 2017 01:42 PM IST

बाबरी मस्जिद मामला: 19 साल पहले की 'गलती' ने मोदी को मुश्किल में डाला

1998 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी तो लाल कृष्ण आडवाणी गृह मंत्री और मुरली मनोहर जोशी मानव संसाधन मंत्री बने. सरकार बड़े असमंजस में थी कि बाबरी मस्जिद मामले में बीजेपी और संघ परिवार के बड़े नेताओं पर चल रहे आपराधिक साजिश समेत दूसरे मुकदमे वापस लिए जाएं या नहीं.

संघ परिवार और पार्टी के एक हिस्से की राय थी कि उनके नेताओं को 'साजिशन' फंसाया गया है, लिहाजा सरकार और सीबीआई को अदालत में मुकदमे वापस लेने की अर्जी देनी चाहिए. साथ ही बीजेपी के पास नैतिकता की मिसाल पेश करने का विकल्प भी था.

उसके पास यह साबित करने का मौका था कि वह अन्य दलों से अलग है - केंद्र में अपनी सरकार होने के बावजूद उसने सीबीआई और अन्य जांच एजेंसियों के कामकाज में दखलंदाजी नहीं की.

19 साल पहले का फैसला बीजेपी नेताओं पर भारी पड़ा

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यह तर्क दिया गया कि बीजेपी नेता अाडवाणी, जोशी, उमा भारती, विनय कटियार और विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल, विष्णुहरि डालमिया, आचार्य गिरिराज किशोर, साध्वी रितंभरा और अन्य के खिलाफ लगाए गए आरोपों में मेरिट नहीं है. लिहाजा वे आरोप अदालत में टिक नहीं पाएंगे. इसलिए वाजपेयी सरकर ने दूसरा विकल्प चुना.

कुछ समय बाद आडवाणी उप प्रधानमंत्री बन गए. रायबरेली की अदालत ने आडवाणी, जोशी, उमा भारती समेत 21 नेताओं को आपराधिक साजिश के आरोप से बरी कर दिया.

इस फैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने भी बरकरार रखा. रायबरेली की अदालत में आडवाणी, जोशी और उमा भारती समेत 8 के खिलाफ मुकदमा चल रहा है, लेकिन इसमें आपराधिक साजिश का आरोप नहीं है. उधर, लखनऊ की विशेष अदालत में 'अज्ञात लोगों' के खिलाफ बाबरी मस्जिद गिराने के मामले में दूसरा मुकदमा चल रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने अब हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए आडवाणी, जोशी, उमा भारती समेत अन्य नेताओं के खिलाफ आपराधिक साजिश का मुकदमा चलाने का आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने रायबरेली और लखनऊ में अलग-अलग चल रहे मुकदमों को एक साथ क्लब कर दिया है. साथ ही, निचली अदालत को रोजाना सुनवाई कर दो साल में फैसला देने को कहा है.

सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त आदेश के बाद आडवाणी, जोशी और बीजेपी-संघ परिवार के अन्य नेताओं को यह अफसोस हो सकता है कि अगर 1998 में उनकी सरकार आरोप वापस ले ली होती तो आज यह नौबत ही न आती. आखिरकार, कांग्रेस सरकार ने भी तो अपने तमाम नेताओं के खिलाफ मुकदमे वापस लिए हैं.

नैतिकता की मिसाल पेश करने के लिए 19 साल पहले लिया गया बीजेपी सरकार का निर्णय अब आडवाणी, जोशी, उमा भारती और अन्य नेताओं को भारी पड़ रहा है. लेकिन तब और अब में बहुत अंतर है.

1998 में वे सत्ता में थे, लेकिन उनके खिलाफ पहले से मुकदमे दर्ज थे. अब हालात बदल गए हैं. कल तक वे आपराधिक साजिश के आरोप से बरी थे.

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सीबीआई ने बीजेपी नेताओं के खिलाफ मुकदमे की वकालत की?

अब मोदी के नेतृत्व में चल रही बीजेपी की सरकार के अधीन काम कर रही सीबीआई ने उन पर आपराधिक साजिश का केस बहाल करने की वकालत की है. गौर करने वाली बात है कि बाबरी मस्जिद मामले में इन नेताओं के खिलाफ दर्ज शुरुआती मुकदमे में आपराधिक साजिश का आरोप शामिल नहीं था.

क्या सीबीआई ने अपना रवैया बदल लिया है? क्या वह बदले हुए हालात में आरोप रद्द करने की अर्जी दे सकती थी? क्या सीबीआई ने खुद से ऐसा रुख अपनाया या फिर उसे सरकार से निर्देश मिले थे?

ये सवाल अटकलबाजी माने जाएंगे, लेकिन यह तथ्य है कि सीबीआई ने बीजेपी नेताओं के खिलाफ आपराधिक साजिश के तहत मुकदमा चलाने की वकालत की.

कानूनी मामलों में वित्त मंत्री अरुण जेटली की राय सरकार में बहुत मायने रखती है. उन्होंने उमा भारती की मोदी कैबिनेट से इस्तीफे की संभावना से इनकार किया है. कांग्रेस की मांग को खारिज करते हुए जेटली ने कहा कि अगर चार्जशीट दाखिल होना ही पैमाना है तो कांग्रेस के कई मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को पद छोड़ देना चाहिए था.

बीजेपी नेताओं पर आपराधिक मामला चलाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अयोध्या में राम मंदिर के मसले पर बहस और तेज हो जाएगी. उत्तर प्रदेश में तीन चौथाई बहुमत से बीजेपी की सरकार बनने और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की अदालत के बाहर सुलह की सलाह से मंदिर का मुद्दा पहले से ही सुर्खियों में है.

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अब आडवाणी की प्रतिक्रिया क्या होगी?

lk advani, manohar joshi

आडवाणी और जोशी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. वे इस मसले पर सार्वजनिक बयान देंगे या उन्हें जो भी कहना है वह कोर्ट में कहेंगे, ये देखना बाकी है.

यह देखना भी रोचक होगा कि सीबीआई कितनी शिद्दत के साथ बीजेपी नेताओं के खिलाफ केस की पैरवी करती है. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि कम से कम एक गवाह हर रोज अदालत में पेश हो.

बीजेपी के लिए राम मंदिर आस्था का मसला रहा है. आडवाणी बीजेपी के फाउंडिंग-फादर होने के साथ ही पार्टी के कर्णधार रहे हैं. उन्होंने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा निकाली जिसके बाद ही बीजेपी की सियासी तकदीर ने करवट ली.

1984 में दो लोकसभा सीटें पाने वाली बीजेपी 1991 में 120 पर पहुंच गई. 187 सीटें हासिल कर बीजेपी 1996 में लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी और 13 दिन के लिए सरकार भी बनाई. इसके बाद 1998 में बीजेपी के नेतृत्व में केंद्र में पूरे पांच साल चलने वाली गठबंधन सरकार बनी.

यही वजह है कि पार्टी में अब भी आडवाणी का सम्मान है और वे पार्टी की हर बैठक में मोदी और अमित शाह के साथ मंच पर विराजमान दिखते हैं. और, यही मोदी की समस्या भी है.

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वरिष्ठ नेताओं पर लगे आरोपों से कैसे निपटेगी मोदी सरकार

यह बीजेपी के लिए कतई अच्छा नहीं होगा कि केंद्र सरकार अडवाणी और जोशी के खिलाफ मुकदमे में जोर लगाते दिखे और अदालत में सीबीआई की दलीलों के चलते पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को जेल की हवा खानी पड़ जाए.

अगर ऐसा होता है तो बीजेपी का यह कहना काफी नहीं होगा कि सीबीआई एक स्वतंत्र जांच एजेंसी है और उसने कानूनी तरीके से पहले से चल रहे मुकदमे की पैरवी की.

यही नहीं, नवंबर महीने में आडवाणी 90 साल के हो जाएंगे. लखनऊ की अदालत में एक आरोपी की तरह उनकी पेशी के अलग सियासी निहितार्थ निकलेंगे. लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों में एक के बाद एक बेहतरीन प्रदर्शन इस बात के सबूत हैं कि लोग विकास और हिंदुत्व के मिलन पर मुहर लगा रहे हैं.

चूंकि मामला राम मंदिर का है, मोदी सरकार अपने मार्गदर्शकों के खिलाफ उसी मुद्दे पर स्टैंड लेती दिखेगी जिसने हिंदुत्व, छद्म धर्मनिरपेक्षता, मुस्लिम तुष्टीकरण जैसे मसलों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया है.

uma bahrti. lk advani

उमा भारती ने पहले ही कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उमा भारती ने कहा कि 'कोई साजिश नहीं थी. सब कुछ खुल्लम-खुल्ला था. मैंने राम मंदिर आंदोलन में हिस्सा लिया और वहां मौजूद थी. लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि मुझ पर साजिश का आरोप लगाएं. अगर ऐसा होता है तो सोनिया गांधी के खिलाफ 1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए मुकदमा चलाया जाना चाहिए.'

साफ है कि मोदी सरकर के लिए हालात बेहद जटिल हैं.

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