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अरुंधति रॉय-परेश रावल ट्वीट विवाद: ट्वीट तो बहाना था सिर्फ ट्रोल्स को भड़काना था

परेश रावल की पार्टी बीजेपी ने भी उनकी ट्विटर पोस्ट का बहुत गर्मजोशी से स्वागत नहीं किया है

Akshaya Mishra | Published On: May 25, 2017 03:46 PM IST | Updated On: May 25, 2017 03:46 PM IST

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अरुंधति रॉय-परेश रावल ट्वीट विवाद: ट्वीट तो बहाना था सिर्फ ट्रोल्स को भड़काना था

परेश रावल सही हैं. इस अभिनेता और सांसद ने कहा है कि पत्थर फेंकने वालों की बजाए लेखिका अरुंधति रॉय को सेना की गाड़ी से बांधा जाना चाहिये. अब उनको अपना ये विचार आगे ले ही जाना चाहिए.

सरकार के कश्मीर से निपटने के तरीकों के विरोध में आवाज उठाने वाले जो लोग हैं उन सभी लोगों को घाटी के अशांत इलाकों में गश्त लगाने वाले सेना के वाहनों के बोनट्स से बांध देना चाहिए. यह पत्थर-फेंकने वालों और अलगाववादियों को रोकने का एक अच्छा तरीका तो होगा ही साथ ही परेशानियों में घिरे कश्मीर की समस्या का हल भी इससे एक पल में निकल आयेगा.

सरकार को ये सुझाव थोड़ा शर्मनाक किस्म का लग सकता है और इस कारण वो इसे सीधे तौर पर नकार भी सकती है. लेकिन, ये तय है कि इस तरह की राय जताकर अभिनेता परेश रावल को जल्द ही सोशल मीडिया के सुपर हीरो बन सकते हैं.

इसका एक और फायदा होगा. परेश रावल कुछ दिनों के लिए उन्मादी एंकरों के साथ टीवी के प्राइम टाइम पर छा जायेंगे जहां टीवी एंकर उन्हें एक ऐसे सुपरहीरो की तरह पेश करेंगे जो अरुंधति रॉय जैसे भारत विरोधी भारतीयों के नए विनाशक के रूप में सामने आएंगे.

अब जबकि सेना ने एक शॉल निर्माता को जीप से बांधने वाले मेजर को सम्मानित करने का फैसला कर ही लिया है तब तो परेश रावल को अपने इस अंदाज को और जोर-शोर से जारी रखना चाहिए.

अगर आपको मेरी ये बात एक मजाक लग रही है तब मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता. एक सम्मानजनक व्यक्ति जिसका विवादों से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं रहा है वो भला कैसे ऐसी अजीब किस्म की बात कह सकता है?

रॉय पर अपने ट्विटर पोस्ट के साथ परेश रावल ने जानबूझकर या अनजाने में ही सही अपने-आप को बेवकूफी भरी ट्रोल्स की बदसूरत दुनिया में घसीट लिया है और इस प्रक्रिया में खुद को थोड़ा छोटा भी कर लिया है.

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arundhati roy

अरुंधती रॉय बुकर अवॉर्ड विनर और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं

विद्रोहिणी अरुंधति

लोग परेश रावल को एक शानदार और जीवंत अभिनेता के रूप में याद रखना चाहेंगे जो संवेदनशील भूमिका निभाने के लिए जाने जाते थे. रावल की पहचान एक सक्षम अभिनेता की थी न कि ऐसे किसी व्यक्ति की जो हर अगले राष्ट्रविरोधी को ठीक करने के लिये इंटरनेट की दुनिया में किसी अनजान गुंडे की शक्ल में घूम रहा हो.

शायद उनको किसी ने नहीं बताया कि फारूख अहमद डार जिसको सेना की गाड़ी से बांधा गया था कोई कश्मीरी पत्थर-बाज नहीं था कम से कम तब तो नहीं ही था जब उसको सेनाकर्मियों ने वहां खड़े हुए पकड़ा था. सच तो ये है कि फारूख अहमद वहां अलगाववादियों की धमकियों को नजरअंदाज करके श्रीनगर उपचुनाव में वोट डालने के लिए श्रीनगर गया हुआ था जहां से सेना ने उसे पकड़ लिया था.

यदि इस बारे में मीडिया रिपोर्ट्स सही हैं तो डार का स्वागत होना चाहिये था. वो कश्मीरी नौजवान देशहित में अपनी महान सेवा दे रहा था.

शायद डार को असल हालात की जानकारी नहीं थी और उन्हें उस वक्त और ज्यादा सावधान रहना चाहिए था. लेखिका और राजनीतिक कार्यकर्ता अरुंधती रॉय की कश्मीर और भारत सरकार की नीति को लेकर जो विचार हैं उससे अधिकतर भारतीय सहमत नहीं हैं. रॉय के मुताबिक न सिर्फ कश्मीर बल्कि पूरा देश दमनकारी ताकतों के अधीन है.

रॉय बस्तर के माओवादियों के हर तरह के कामों की भी समर्थक रही हैं. वो न केवल मौजूदा सरकार की बल्कि पुरानी सरकारों की भी निंदा करती रहीं हैं. वो कई चीजें ऐसी भी कहती हैं जिनका स्वाद अक्सर बाकी भारतीयों के लिए स्वादिष्ट नहीं होता.

लेकिन हम इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते हैं कि वे जो कुछ भी सोचती हैं उसे कहने की हिम्मत भी रखती हैं. वो 140 अक्षरों वाले शूट-एंड-स्कूट गेम में शामिल नहीं होती हैं. वो अपनी बात को जोरदार तरीके से एक लंबे लेख में लिखती हैं जो न सिर्फ बहुत ही प्रभावी बल्कि स्पष्ट होता है.

यदि किसी को बुरा लगता है तो उन्हें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता. जबकि कई लेखक राजनीतिक हवा की दिशा भांप कर अपनी जगह बदल कर 'सही' कर लेते हैं लेकिन अरुंधती रॉय ऐसा नहीं करतीं और ये बहुत बड़ी बात है... है या नहीं?

वो एक विश्वास से भरी हुई भारतीय नागरिक हैं जैसा हम सभी होना चाहते हैं. वो शुद्ध रूप से एक लेखिका और एक सर्जक हैं. वो रचनाधर्मी ही कैसा जो किसी साधारण या पेश की गई बात को एक अलग नजरिये से देख न सके...भले ही ऐसा करने पर उन्हें थोड़ा विद्रोही ही क्यों न मान लिया जाए.

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Paresh Rawal

परेश रावल हिंदी फिल्मों के अभिनेता और बीजेपी सांसद हैं

जीवंत अभिनेता

इसी संदर्भ में परेश रावल अपनी ही फिल्म 'ओएमजी' यानि 'ओ माई गॉड' में उनके निभाए किरदार कांजी पर गौर कर सकते हैं. खरी-खरी बोलने वाली जुबान के साथ बुद्धिमान, तर्कसंगत, अ-भक्तिपूर्ण और दुस्साहसिक कांजी भाई अंध-श्रद्धा का चोला ओढ़ कर बनीं और हमारे चारों ओर फैली ऐसी स्वयंभु संस्थाओं से दो-दो हाथ करते हैं.

अगर उनके पास अपनी खुद की तार्किक सोच समझ नहीं होती और अपनी इस सोचने समझने की क्षमता पर भरोसा नहीं होता तो उनके या उनके किरदार के भीतर किसी लोकप्रिय सत्ता को चुनौती देने की ताकत नहीं होती. न ही इतनी निर्भीकता की वे अपनी छवि को खतरे में डाल पाते. अरुंधति रॉय जैसे लोगों में यही गुण मौजूद है और वो कांजी जैसे लोगों से कहीं ज्यादा बेहतर तरीके और सलीके उनका इस्तेमाल करना जानते हैं.

रावल को ये बात समझनी चाहिए क्योंकि वो एक रचनात्मक व्यक्ति हैं और बेहद प्रतिभाशाली भी हैं. हो सकता है कि एक ऐसा राजनीतिक दल जो सेना और राष्ट्र के बारे में स्पष्ट विचार रखता है के एक सदस्य के रूप में वो कुछ ऐसा बोलने को मजबूर हो गये हैं जैसा वो आमतौर पर नहीं बोलते हैं. किसी विवाद में नाम न आने के कारण वे शायद कुछ अलग-थलग सा महसूस कर रहे थे.

दूसरी तरफ उनका निशाना भी एक जाना-पहचाना चेहरा होना चाहिए था. फिर, भला रॉय से बेहतर कौन हो सकता है? शायद रावल का ये व्यवहार वक्त के तकाजे को ध्यान में रखकर ही रखा गया है ताकि वे ट्रोलर्स को उनकी खुराक दे दें और उनमें गुस्सा पैदा कर सके. जिसका इस्तेमाल ये ऑनलाइन आर्मी अपना गुस्सा जाहिर करने और लोगों पर हमला करने को कर सकें.

आखिरकार, ऐसे लोगों की जिंदगी दूसरों पर हमला किये बिना बिलकुल बेमानी हो जाती है.

सच कहें तो परेश रावल की पार्टी बीजेपी ने भी उनकी ट्विटर पोस्ट का बहुत गर्मजोशी से स्वागत नहीं किया है. शायद पार्टी को महसूस हो गया है कि भारतीय सेना का समर्थन तक तो ठीक है लेकिन उनकी कार्रवाईयों पर किसी तरह का फैसला ट्रोलर्स के विवेक के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है.

पत्थरबाजों से निपटने के लिए जिंदा इंसानों को गाड़ियों से बांधना नैतिक रूप से किसी भी तरह से सही रणनीति नहीं हो सकती है. इस तरह के मामलों और ऐसी ट्रोल्स जितनी दूर रहें उतना अच्छा है. उम्मीद है कि परेश रावल को भी ये बात समझ में आ जाये.

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