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ममता बनर्जी के लिए खतरे की घंटी है अमित शाह का बंगाल दौरा

मोदी-शाह को मालूम है कि 2019 में उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि जनता की उम्मीदों का होगा

Sreemoy Talukdar | Published On: Apr 28, 2017 04:45 PM IST | Updated On: Apr 29, 2017 08:39 AM IST

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ममता बनर्जी के लिए खतरे की घंटी है अमित शाह का बंगाल दौरा

अमित शाह की पश्चिम बंगाल की तीन-दिवसीय यात्रा से साफ है कि 2019 के चुनावी युद्ध की शुरुआत हो गई है. सिर्फ ममता बनर्जी का राज्य ही बीजेपी अध्यक्ष का गंतव्य नहीं है. उनके 15 दिवसीय सांगठनिक दौरे में पश्चिम बंगाल, ओडिशा, गुजरात, तेलंगाना और लक्षद्वीप भी शामिल हैं.

उनके इस दौरे का मकसद ऐसे राज्यों में बीजेपी के पांव पसारना है जहां वह कमजोर है. जिन राज्यों में बीजेपी पहले से सत्ता में है, वहां अपनी ताकत को और बढ़ाना भी इसका लक्ष्य है. बहरहाल, बंगाल को बिना वजह अमित शाह की यात्रा का पहला पड़ाव नहीं चुना गया है.

विपक्ष नहीं, जनता की उम्मीदें होंगी चुनौती

फुल टाइम राजनीतिज्ञ होने के नाते नरेंद्र मोदी और उनके विश्वसनीय जनरल अमित शाह को अच्छी तरह मालूम है कि 2019 के चुनाव में उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती एकजुट विपक्ष नहीं, बल्कि जनता की उम्मीदों का दबाव होगा. लिहाजा उन्हें ऐसे राज्यों में तेजी से पांव पसारने चाहिए जहां पार्टी के लिए अनुकूल परिस्थितियां हैं मगर सांगठनिक ढांचा कमजोर है.

नरेंद्र मोदी और उनके विश्वसनीय जनरल अमित शाह को अच्छी तरह मालूम है कि 2019 के चुनाव में उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती एकजुट विपक्ष नहीं, बल्कि जनता की उम्मीदों का दबाव होगा.

नरेंद्र मोदी और उनके विश्वसनीय जनरल अमित शाह को अच्छी तरह मालूम है कि 2019 के चुनाव में उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती एकजुट विपक्ष नहीं, बल्कि जनता की उम्मीदों का दबाव होगा.

इस लिहाज से पश्चिम बंगाल का चुनाव बिल्कुल उपयुक्त है. यहां लोकसभा की 42 सीटें हैं. दूसरे राज्यों में चुनावी नुकसान होने पर पश्चिम बंगाल से उसकी भरपाई की जा सकती है. इसका रणनीतिक महत्व भी है. पश्चिम बंगाल में बीजेपी के विस्तार और उसकी राष्ट्रवादी सियासत के लिए समुचित हालात मौजूद हैं.

बीजेपी कई साल तक पश्चिम बंगाल की सियासत में हाशिए पर रही. इसे गैर-बंगालियों के अलावा महानगरों के व्यापारिक समुदाय और उत्तर बंगाल के कुछ हिस्सों में समर्थन हासिल था. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर से हालात बदले. इसे राज्य में आश्चर्यजनक रूप से 17 फीसदी वोट मिले. लेकिन पार्टी के पास न तो सांगठनिक ढांचा था और न ही जमीनी स्तर पर काम करने वाले कैडर थे जो इस कामयाबी को आगे बढ़ा सकें.

लिहाजा 2014 के बाद इसके वोट शेयर में कुछ कमी आई. पार्टी के अंदरूनी झगड़े, स्पष्ट दिशा का अभाव और राज्य में किसी जनाधार वाले नेता का न होना बड़ी बाधा के रूप में सामने आए.

ममता का आना अपने आप में ऐतिहासिक था

यह पश्चिम बंगाल में भारी उथल-पुथल का दौर है. इसके बीज 2011 में तब पड़े जब ममता बनर्जी वाम मोर्चे के 34 साल से अभेद्य दुर्ग में सेंध लगाकर सत्ता पर काबिज हुईं. उनका सत्ता में आना एक महत्वपूर्ण सियासी परिवर्तन था. ममता बनर्जी ने वाम दलों को उन्हीं के खेल में मात दी. उन्होंने वामपंथी राजनीति को इस तरह अपनाया कि वाम दल भी उनका मुकाबला करने में नाकाम साबित होने लगे.

ममता बनर्जी ने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ उस समय मोर्चा खोला था जब मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में वाम मोर्चा दशकों से चली आ रही अपनी प्रगतिविरोधी नीतियां त्यागने और उद्योग हितैषी छवि बनाने की कोशिश कर रहा था.

ममता बनर्जी ने इस मौके का इस्तेमाल वाम दलों से उनका ही मुद्दा छीनने में किया. वामपंथी नीतियां अपनाने के बाद ममता बनर्जी वाम दलों की तरह अपनी पार्टी का सांगठनिक ढांचा तैयार करने में जुट गईं. कुछ ही साल के भीतर वाम दलों की सियासत के साथ संगठन और उनके कुछ प्रमुख नेता और सैकड़ों कार्यकर्ता टीएमसी के पाले में चले गए. बंगाल की मुख्यमंत्री ने अपने पहले कार्यकाल के अंत तक पूरे विपक्ष को करीब-करीब नेस्तनाबूद कर दिया. लेकिन ममता बनर्जी को उन रणनीतिक गलतियों से बचना चाहिए था जिसकी वजह से देश में बीजेपी का उभार आया.

ममता बनर्जी वाम मोर्चे के 34 साल से अभेद्य दुर्ग में सेंध लगाकर सत्ता पर काबिज हुईं.

ममता बनर्जी वाम मोर्चे के 34 साल से अभेद्य दुर्ग में सेंध लगाकर सत्ता पर काबिज हुईं.

ममता की मुस्लिमपरस्ती

अपने मुस्लिम वोट को बैंक बरकरार रखने के लिए ममता बनर्जी ने पहचान की सियासत की ओर मजबूती से कदम बढ़ाए. 2011 की जनगणना के मुताबिक, राज्य में मुसलमानों की आबादी 27 फीसदी है. लेकिन राज्य में बड़े पैमाने पर जारी घुसपैठ को देखते हुए इस आंकड़े को कम से कम ही माना जाना चाहिए. तमाम गलत नीतियों के बावजूद वाम मोर्चा अपने 34 साल के शासन में धर्म और राजनीति के घालमेल से दूर था. ममता की मुस्लिमपरस्ती के पीछे शायद यह वजह हो सकती है कि वह वाम मोर्चे को वापसी का कोई मौका नहीं देना चाहती थीं.

वह अच्छी तरह जानती थीं कि बीजेपी के साथ रहा उनका रिश्ता करीब-करीब निहत्थे हो चुके वाम दलों को उनपर हमला करने का मौका देगा. जैसे ही वाम दलों ने उन पर हमले तेज किए, ममता बनर्जी धर्म की राजनीति में डूबती चली गईं और तुष्टीकरण उनकी सियासत का मुख्य बिंदु बनता गया. उन्होंने तुष्टीकरण की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी मशीनरी का भी इस्तेमाल किया. उन्हें तुष्टीकरण की नीतियों की वजह से हिंदुओं के नाराज होने चिंता नहीं थी. शायद वे इस बात से आश्वस्त थीं कि बंगाली हिंदू धार्मिक पहचान के मुकाबले सांस्कृतिक पहचान को ज्यादा महत्व देंगे.

ममता बनर्जी की सांप्रदायिक नीतियों ने बढ़ाई उनके लिए मुश्किलें

ममता बनर्जी ने अपनी तुष्टीकरण की नीति के तहत इमामों का मासिक स्टाइपेंड बढ़ाया और मुसलमानों के धार्मिक जुलूसों के चलते हिंदुओं के मूर्ति विसर्जन कार्यक्रमों पर रोक लगाई. उन्होंने एक समुदाय की हिंसक और कानून विरोधी गतिविधों की तरफ से आंखें बंद कर लीं. ममता बनर्जी की इन नीतियों के चलते अंदर ही अंदर गुस्से का एक तूफान पलने लगा.

कैच न्यूज की 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 'ममता बनर्जी के कार्यकाल में पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा बढ़ी. केनिंग और देगंगा में दंगे हुए. 2013 में साप्रदायिक घटनाएं बढ़कर 106 तक पहुंच गईं, जबकि पिछले पांच साल में 12 से 40 के करीब सांप्रदायिक घटनाएं हुई थीं.'

डेली ओ में छपे अपने लेख में मिन्हाज मर्चेंट लिखते हैं, 'धुलागढ़ टीएमसी कार्यकर्ताओं द्वारा निर्मित सांप्रदायिक विद्वेष में पश्चिम बंगाल के धंसते जाने का सिर्फ एक ताजातरीन लक्षण है. सीपीएम की बर्बरता धर्मनिरपेक्ष थी तो टीएमसी का विद्वेषपूर्ण आचरण पूरी तरह सांप्रदायिक है. उनके लिए दंगा जिंदगी का मनपसंद तरीका है.'

ममता की नीतियों का फायदा बीजेपी को

ममता बनर्जी की तुष्टीकरण की राजनीति से बीजेपी को हिंदू वोट बैंक को मजबूत बनाने का मौका मिल गया. उसने हिंदीभाषी राज्यों की तरह पश्चिम बंगाल में भी तीक्ष्ण धार्मिक भावनाएं फैलाने के लिए कई कदम उठाए. पश्चिम बंगाल के विभिन्न हिस्सों में तीर-तलवार के साथ रामनवमी के करीब 150 जुलूस निकले. इससे साफ संकेत मिलता है कि राज्य में हिंदू वोट बैंक के मजबूत होने बात सच्चाई से परे नहीं है.

अमित शाह तीन स्तरों पर काम कर रहे हैं. वे मोदी के विकास के मॉडल को ममता बनर्जी की सियासत के विकल्प के रूप में सामने रख रहे हैं

अमित शाह तीन स्तरों पर काम कर रहे हैं. वे मोदी के विकास के मॉडल को ममता बनर्जी की सियासत के विकल्प के रूप में सामने रख रहे हैं.

तीन स्तरों पर काम कर रहे हैं शाह

बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने भी इस पर गौर किया है. अमित शाह का पश्चिम बंगाल दौरा इस इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. बीजेपी को अहसास है कि वह अभी टीएमसी की सांगठनिक क्षमता, जनता से उसके जुड़ाव अथवा बूथ स्तर पर उसकी ताकत का मुकाबला नहीं कर सकती.

लिहाजा अपनी यात्रा के दौरान अमित शाह तीन स्तरों पर काम कर रहे हैं. वे मोदी के विकास के मॉडल को ममता बनर्जी की सियासत के विकल्प के रूप में सामने रख रहे हैं और लोगों को बता रहे हैं कि किस तरह ममता बनर्जी की सरकार तमाम घोटालों में संलिप्त है.

वे बीजेपी के आधार वाले इलाकों में सांगठनिक ढांचा मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. यही वजह है कि उन्होंने अपना दौरा उत्तरी बंगाल के नक्सलबाड़ी इलाके से शुरू किया. वे ममता बनर्जी के इलाके में जनता से संवाद स्थापित कर उनकी सरकार की ताकत को चुनौती दे रहे हैं और अपनी इस यात्रा का सांकेतिक महत्व साबित कर रहे हैं.

नक्सलबाड़ी ही क्यों?

अमित शाह ने नक्सलबाड़ी से अपना दौरा क्यों शुरू किया, इस पर कुछ रोशनी डालने की जरूरत है. 1960 के दशक में नक्सलबाड़ी सशस्त्र विद्रोह का केंद्र था. यहीं से विद्रोह की आग देश के दूसरे हिस्सों में फैली थी. उत्तरी बंगाल के कुछ इलाकों में बीजेपी का आधार है. जैसा कि कांठी दक्षिण में हाल ही में हुए उप-चुनाव के नतीजों से साफ है, यहां बीजेपी वाम दलों की कीमत पर तेजी से आगे बढ़ रही है. क्या अमित शाह के लिए वैचारिक स्तर पर आए इस बदलाव को प्रदर्शित करने के लिए नक्सलबाड़ी से बेहतर कोई और जगह हो सकती थी? वही नक्सलबाड़ी जहां कभी रेडिकल लेफ्ट का जन्म हुआ था?

नक्सलबाड़ी के लोग पशु तस्करों की धमकियों का सामना कर रहे हैं. ऐसे में यहां बीजेपी को अपना आधार मजबूत करने का मौका है.

नक्सलबाड़ी के लोग पशु तस्करों की धमकियों का सामना कर रहे हैं. ऐसे में यहां बीजेपी को अपना आधार मजबूत करने का मौका है.

अमित शाह के इस कदम के सांकेतिक मायने तो हैं ही, इसके पीछे राजनैतिक समझ भी दिखती है. उत्तरी बंगाल में पशुओं की तस्करी के कई मामले सामने आए हैं. पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक मंगलवार को बीएसफ के जवानों की नजर चोपरा-फतेहपुर आउटपोस्ट के पास चाय के एक बागान से खोदी जा रही 80 फुट की सुरंग पर पड़ी. माना जा रहा है कि यह सुरंग किशनगंज से सटे उत्तरी बंगाल के इलाके में पशु तस्कर खोद रहे थे.

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में दिए एक हलफनामे में कहा कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर पशुओं की तस्करी तेज गति से चल रही है. लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 2016 से दिसंबर 2016 के बीच सीमा पर 1,78,801 पशु पकड़े गए, जिनमें से 1,28,440 (76.1 फीसदी) पश्चिम बंगाल से थे. गृह मंत्रालय के हलफनामे के मुताबिक सीमा पर पिछले तीन साल में हिंसक झड़पों में 5 बीएसएफ जवानों समेत 35 लोग मारे गए, जबकि 302 बीएसएफ जवान जख्मी हुए.

नक्सलबाड़ी के लोग पशु तस्करों की धमकियों का सामना कर रहे हैं. ऐसे में यहां बीजेपी को अपना आधार मजबूत करने का मौका है.

अपनी यात्रा के दौरान अमित शाह ने सिलीगुड़ी में मध्यम वर्ग के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की. उन्होंने बड़ी चतुराई से बंगाल में उद्योग धंधे न होने और कानून व्यवस्था के बिगड़ते हालात की चर्चा की. इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक अमित शाह ने कहा कि “बंगाल में कानून व्यवस्था रसातल में पहुंच गई है. बंगाल में कभी नोबेल पुरस्कार विजेता रबींद्रनाथ टैगोर का संगीत गूंजता था, लेकिन अब बम की आवाज गूंजती है.”

पश्चिम बंगाल के ‘बम इंडस्ट्री’ पर अमित शाह की टिप्पणी के कुछ दिन पहले इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया कि बीरभूम के लाभपुर इलाके के दरबारपुर गांव में देसी बम बनाते वक्त हुए विस्फोट में कम से कम सात लोग मारे गए. साफ है कि पश्चिम बंगाल के अनूठे सियासी भंवर में बीजेपी को अपने सबसे मजबूत प्रतिद्वंदी से बहुत मदद मिल रही है.

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