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इलाहाबाद छात्रसंघ चुनाव: सरकार और छात्रों में लगातार क्यों बढ़ रही है दूरी?

इलाहाबाद छात्रसंघ चुनाव में भी एबीवीपी को हार का मुंह देखना पड़ा है. इससे पहले डीयू, जेएनयू, राजस्थान और हैदराबाद यूनिवर्सिटी में हुए छात्रसंघ चुनावों में भी एबीवीपी हार गई थी

Ankit Pathak Updated On: Oct 15, 2017 05:35 PM IST

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इलाहाबाद छात्रसंघ चुनाव: सरकार और छात्रों में लगातार क्यों बढ़ रही है दूरी?

एक तरफ हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और दूसरी तरफ सभी राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों ने अगले लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है, किसी दल में अध्यक्ष चुने जा रहे हैं तो किसी में मंथन चल रहा है, ऐसे समय में देश के तमाम विश्वविद्यालयों के छात्रसंघ से भारतीय जनता पार्टी के संघटक छात्र संगठन ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ का सफाया किस बात की ओर संकेत करता है?

शायद यह संकेत इस ओर है कि आज से साढ़े तीन साल पहले देश में जो लहर उठी थी वह थम सी गई है, विश्वविद्यालयों के भीतर छात्रों ने सत्तारूढ़ पार्टियों के संघटक छात्र दलों को बाहर का रास्ता दिखाया है. पहले उत्तर भारत के राज्यों, क्रमशः राजस्थान, दिल्ली, पंजाब और उत्तराखंड और फिर दक्षिणी राज्य तेलंगाना के विश्वविद्यालयों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की हार देश की राजनीति में नए रुझानों की ओर संकेत है, और अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ ने इस ‘परिवर्तन की बयार’ का रुख तेज कर दिया है.

ये रहा इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ का परिणाम

14 अक्टूबर को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुए छात्रसंघ चुनाव में समाजवादी छात्र सभा के अवनीश कुमार यादव ने (3226 वोट) निर्दलीय प्रत्याशी मृत्युंजय राव परमार को (2674 वोट) 552 वोटों से हराकार अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की है. अध्यक्ष पद पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की प्रत्याशी प्रियंका सिंह कुल 1588 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं, जबकि एनएसयूआई के प्रत्याशी सूरज कुमार दूबे चौथे स्थान पर रहे. भारतीय विद्यार्थी मोर्चा से विकास कुमार भारतीया पांचवें और आइसा से अध्यक्ष पद के प्रत्याशी शक्ति रजवार छठे स्थान पर रहे.

अवनीश कुमार यादव

अवनीश कुमार यादव

उपाध्यक्ष पद पर समाजवादी छात्रसभा के ही चंद्रशेखर चौधरी ने (2249 वोट) अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के प्रत्याशी शिवम् कुमार तिवारी (2177 वोट) को 72 वोटों के करीबी अंतर से हराया. इस पद पर एनएसयूआई के प्रत्याशी विजय सिंह बघेल कुल 1661 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे.

महामंत्री पद पर एबीवीपी के प्रत्याशी निर्भय कुमार द्विवेदी ने एनएसयूआई के प्रत्याशी अर्पित सिंह राजकुमार को 61 वोटों के नजदीकी अंतर से हराया. इस पद पर तीसरे स्थान पर समाजवादी छात्र सभा के प्रत्याशी रहे.

सयुंक्त सचिव पद पर समाजवादी छात्रसभा के भरत सिंह ने (2051 वोट) निर्दलीय प्रत्याशी आदर्श शुक्ला को (1421 वोट) 630 वोटों के बड़े अंतर से हराया.

सांस्कृतिक सचिव पद पर भी समाजवादी छात्र सभा के प्रत्याशी अवधेश कुमार पटेल ने (3801 वोट) एबीवीपी के प्रत्याशी को 912 वोटों के भारी अंतर से हराया.

‘नोटा’ रहा कई पर हावी

इलाहाबाद छात्रसंघ चुनावों में पहली बार ‘नोटा’ (नन ऑफ़ द अबव) का प्रयोग किया गया. अध्यक्ष पद पर 112 वोट, उपाध्यक्ष पर 256 वोट, महामंत्री पर 414 वोट, संयुक्त मंत्री पर 439 वोट और सांस्कृतिक सचिव पर कुल 388 वोट ‘नोटा’ पर पड़े. पहली बार प्रयोग किए जा रहे नोटा ने कई प्रत्याशियों का चुनावी समीकरण बिगाड़ दिया. खासतौर पर महामंत्री और उपाध्यक्ष पद के हारे हुए प्रत्याशियों के लिए नोटा काफी महंगा पड़ गया.

एबीवीपी को मुश्किल से मिली एक सीट

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को मुश्किल से एक सीट मिली. महामंत्री पद पर एनएसयूआई के प्रत्याशी को मात्र 61 वोटों से हार मिली. एबीवीपी को सितंबर महीने में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में हुई छेड़खानी और लाठीचार्ज की घटना मंहगी पड़ी, इस घटना पर उनके प्रत्याशी को समाजवादी छात्र सभा के और आइसा के प्रत्याशियों ने घेरा था. बीएचयू में लड़कियों पर हुए लाठीचार्ज का जिक्र कई प्रत्याशियों ने अपने दक्षता भाषण में किया था, यह भी एबीवीपी के खिलाफ गया.

टिकट बंटवारे में हुआ था विवाद

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की इलाहाबाद इकाई में टिकट बंटवारे को लेकर काफी असंतोष नजर आया. यह भी उनके प्रत्याशियों के हार का कारण बना. सबसे अधिक विवाद अध्यक्ष पद को लेकर हुआ. एबीवीपी में अध्यक्ष पद के लिए कुल चार आवेदन आए थे, लेकिन अंत में प्रियंका सिंह, सूरज दूबे और मृत्युंजय राव परमार में से किसी एक को अध्यक्ष पद का प्रत्याशी घोषित किए जाने को लेकर एबीवीपी में तीन फाड़ हो गई.

एबीवीपी ने अन्य विश्वविद्यालयों में हुए हालिया छात्रसंघ चुनावों में महिला प्रत्याशियों को अध्यक्ष पद पर उतारा था इसलिए उसने यहां भी महिला प्रत्याशी को ही टिकट देना ठीक समझा. बाद में सूरज दूबे ने एनएसयूआई से टिकट ले लिया और मृत्युंजय राव परमार ने निर्दलीय प्रतिभाग करना ठीक समझा. इन दोनों प्रत्याशियों ने दक्षता भाषण में एबीवीपी की जमकर खिंचाई की और जेएनयू, डीयू, पंजाब एवं हैदराबाद विश्वविद्यालय के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भी एबीवीपी को हार का मुंह देखना पड़ा. हालांकि देशभर में बीजेपी समर्थित छात्र संगठन की हार के और भी कई गंभीर मायने हैं.

समाजवादी छात्रसभा को एकाएक टिकट बदलना पड़ा मंहगा

समाजवादी छात्रसभा ने चार सीट तो हासिल की लेकिन शायद अपनी सांगठनिक गलती की वजह से महामंत्री की सीट गंवा बैठी. हुआ यह था कि नामांकन के दो दिन पहले समाजवादी छात्रसभा ने अपने पैनल से सभी केंद्रीय पदों पर अपने प्रत्याशियों की सूची जारी की, लेकिन नामांकन के ठीक पहले महामंत्री पद के प्रत्याशी का टिकट बदलकर एक दूसरे प्रत्याशी को दे दिया, इससे पहले टिकट पाए हुए प्रत्याशी के समर्थक नाराज हो गए और क्लीन स्वीप कर सकने वाली समाजवादी छात्रसभा को महामंत्री पद से हाथ धोना पड़ा.

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जातीय समीकरण रहे हावी

सभी पदों पर जातीय समीकरण हावी रहे. समाजवादी छात्र सभा से लेकर एबीवीपी और एनएसयूआई के प्रत्याशियों ने अपनी गुणा-गणित जाति के आधार पर सेट करने की भरपूर कोशिश की लेकिन सफलता सिर्फ समाजवादी छात्रसभा को मिली. समाजवादी पार्टी (सपा) ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव के लिए ‘स्टार प्रचारकों’ की एक सूची जारी की जिसे सोशल मीडिया पर खूब प्रचारित किया गया.

इस सूची में समाजवादी पार्टी के विधायकों, विधानपरिषद सदस्यों, जिला पंचायत सदस्यों से लेकर कई ब्लॉक प्रमुख और पूर्व छात्रसंघ शामिल रहे. लेकिन विश्वविद्यालयों के भीतर जातीय राजनीति का उभार देश की राजीनीति के लिए शुभ-संकेत नहीं है, क्योंकि जब कैंपस में शिक्षा और रोजगार के मुद्दे पर चुनाव लड़ा जाना चाहिए तब जाति, क्षेत्र और धनबल-बाहुबल के दम पर लोग चुनाव लड़ते हैं.

सोशल मीडिया बना था प्रमुख प्रचार माध्यम

जियो और तमाम टेलिकॉम कंपनियों द्वारा दिए गए असीमित इंटरनेट का सीधा प्रभाव छात्रसंघ चुनावों पर देखा गया. यह पहली बार देखा गया कि प्रत्याशियों ने जगह जगह किए अपने भाषणों का लाइव प्रसारण करवाया. आरोप-प्रत्यारोप का सबसे बड़ा माध्यम फेसबुक बना रहा, मतदाताओं से संपर्क साधने के लिए व्हाट्सएप का प्रयोग सभी दलों के प्रत्याशियों ने किया. चुनाव परिणाम आने के थोड़ी देर पहले तक तमाम अफवाहें भी फैलाई गई कि ‘उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पहुंचे इलाहाबाद विश्वविद्यालय’, कईयों ने तो बाकायदा खबर बनाकर सोशल मीडिया पर चलाया.

मतगणना के दौरान चलते रहे बम

वैसे तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आसपास सुरक्षा के पूरे इंतजाम थे लेकिन प्रत्याशियों के समर्थकों की भीड़ देर रात तक केंद्रीय पुस्तकालय के सामने जमा रही, पुलिस ने कई बार समर्थकों को खदेड़ा भी. समर्थकों ने भी तेज आवाज के बम फोड़े और गेट पर की गई बैरीकेडिंग तोड़ दी लेकिन मारपीट की कोई घटना नहीं हुई. चुनाव अधिकारी ने तकरीबन एक बजे रात में परिणाम जारी किया तब तक भीड़ थोड़ी कम हो गई थी.

लिंगदोह समिति रही बेअसर

नियमतः तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव लिंगदोह समिति की सिफारिश के आधार पर होता है जिसमें प्रत्याशियों द्वारा कर सकने वाले चुनाव खर्च की अधिकतम सीमा पांच हजार रुपए है लेकिन तमाम पैनल और निर्दलीय प्रत्याशियों ने लाखों रुपए चुनाव में खर्च किए. एसयूवी गाड़ियों के काफिलों से लेकर बैनर, होर्डिंग्स, पोस्टर्स से पूरा शहर पट गया था, प्रत्याशियों के हैंडबिल प्रायः हवा में ही उड़ते पाए गए, इन सब में कई कुंतल कागज बर्बाद होता है. हालांकि शायद यह अभी छात्रों के लिए कोई मुद्दा नहीं बना है. लिंगदोह समिति का पालन करने में लेफ्ट के संगठन ही आगे रहे, हर बार की तरह इस बार भी उनके प्रत्याशियों ने पैदल ही मतदाताओं से संपर्क साधा और हाथ से लिखा हैंडबिल वितरित किया.

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कौन हैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के नए अध्यक्ष

नवनिर्वाचित अध्यक्ष अवनीश कुमार यादव एलएलबी सेकंड ईयर के छात्र हैं. वे मूल रूप से देवरिया जिले के रहने वाले हैं, उनके पिता किसान एवं माता गृहणी हैं. उन्होंने वर्ष 2012 में इलाहाबाद विश्विद्यालय में एडमिशन लिया था, तब से वे समाजवादी छात्रसभा की सक्रिय राजनीति कर रहे हैं. उनके चुनाव का केंद्र हॉलैंड हॉल होस्टल था जहां वे होस्टल वाश आउट के पहले तक रहते थे. विश्वविद्यालय में पिछले दिनों में चले होस्टल वॉशआउट के खिलाफ आंदोलन में अवनीश ने आगे बढ़कर नेतृत्व किया था, उन्होंने अपनी जीत को केंद्र और राज्य सरकारों के प्रति व्याप्त युवा असंतोष की अभिव्यक्ति बताया.

मतदान प्रतिशत रहा कम

इस बार छात्रसंघ चुनाव में 19 हजार से अधिक मतदाता थे लेकिन मात्र 46 फीसदी मतदान ही हो सका. होस्टल वॉशआउट का सीधा प्रभाव मतदान पर पड़ा क्योंकि अभी तक कई छात्रावासों में छात्रों को कमरे आवंटित नहीं किए गए हैं. महिला छात्रावास में भी इस बार अपेक्षाकृत कम मतदान हुआ क्योंकि वॉशआउट के बाद से बड़ी संख्या में लडकियां डेलीगेसी में रह रहीं हैं.

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में लेफ्ट यूनिटी में भारी जीत हासिल की थी. वहीं दूसरे नंबर पर जेएन छात्रसंघ चुनाव पर एबीवीपी रही. इस चुनाव में अध्यक्ष पद पर लेफ्ट यूनिटी की प्रत्याशी गीता कुमारी जीती थीं.

वहीं दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में दो सीटों पर एनएसयूआई तो दो सीटों पर एबीवीपी जीती थी. अहम या मुख्य सीटों पर एनएसयूआई का कब्जा रहा. एनएसयूआई की तरफ से अध्यक्ष पद पर रॉकी तुसीद जीते थे.

हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र संघ चुनाव के नतीजों में एबीवीपी को करारी मात देते हुए एसएफआई और अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन के गठबंधन वाली एलायंस फॉर सोशल जस्टिस ने सभी पदों पर जीत हासिल की थी.

राजस्थान यूनिवर्सिटी चुनाव में भी एबीवीपी को हार का सामना करना पड़ा था. इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार पवन यादव ने एबीवीपी प्रत्याशी संजय मचोड़ी को हराकर अध्यक्ष पद अपने नाम किया था.

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