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अखिलेश यादव: शायद सितारे बुलंदी पर होना इसी को कहते हैं...

हर बाजी जीत रहे अखिलेश के बारे में यह बात बिल्कुल सटीक बैठती है

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Jan 24, 2017 10:33 AM IST

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अखिलेश यादव: शायद सितारे बुलंदी पर होना इसी को कहते हैं...

एक के बाद एक लगातार सफलता के मुकाम चढ़ते लोगों के बारे में उत्तर भारत में एक सामान्य सी कहावत मशहूर है- उसके सितारे बुलंद है. एक और कहावत भी मशहूर है-गुरु से गुरुआई. अक्सर अपने गुरुओं को चालों में मात देने वालों को इस सामान्य उपमा से नवाजा जाता है.

यूपी की राजनीति में चाल-दर-चाल शह-दर-शह अपने पिता को मात देते अखिलेश यादव के बारे में ये उपमाएं दी जा सकती हैं. जब से समाजवादी पार्टी का विवाद शुरू हुआ है अखिलेश ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव को हर चाल में मात दी है.

एक कुशल शिष्य की तरह अपने गुरु और पिता मुलायम सिंह की हर कमी से वाकिफ अखिलेश यादव ने हर चाल का न सिर्फ जवाब दिया बल्कि पूरा गेम चेक और मेट पर खेला है.

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अखिलेश यादव ने अपने पिता का इससे पहले वाला कार्यकाल देखा था. उन्हें अच्छे से याद है कि कैसे 2007 में उनकी पार्टी को मायावती ने गुंडागर्दी के नारे पर घेर कर बुरी तरह से हराया था.

साल 2012 में जब उन्हें सीएम बनाया गया तो अखिलेश यादव को एक बात समझ में आ गई थी कि सरकार भले ही बन गई हो लेकिन अब नैतिक स्टैंड तो लेना ही होगा. उन्होंने एड़ी चोटी का जोर लगाया और डीपी यादव को बाहर का रास्ता दिखा दिया.

अखिलेश नहीं शिवपाल

कई किस्से मशहूर हैं कि सीएम तो शिवपाल यादव को बनाया जाना था लेकिन ऐन वक्त पर रामगोपाल यादव ने पूरा जोर लगाकर अखिलेश का समर्थन किया और सीएम अखिलेश बन गए. फिर ‘साढ़े चार’ मुख्यमंत्री का अपमानजनक घूंट भी उन्होंने लंबे समय तक पिया. ये सबकुछ सुनते हुए भी अखिलेश यादव पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत बना रहे थे.

Shivpal Yadav

इधर मुलायम सिंह यादव समझ रहे थे कि ये अब भी 90 के दशक वाली समाजवादी पार्टी और अखिलेश सीएम नहीं उनके प्यारे 'टीपू' हैं.

2014 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने यूपी में बीजेपी के हाथों प्रंचड हार सही. फिर विधानसभा चुनावों की नौबत आई तो अखिलेश यादव को समझ आया कि अगर अब नहीं आवाज उठाई गई तो फिर बात हाथ से निकल जाएगी.

लेकिन ये याद रखने वाली बात है अखिलेश जिन लोगों को बाहर निकालने की बात कर रहे हैं वो आज से पार्टी में नहीं हैं. ऐसा भी नहीं कि अखिलेश को राजनीति की समझ भी हाल-फिलहाल ही पैदा हुई है.

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वो जिन लोगों का विरोध कर रहे हैं वो पार्टी में तब भी थे जब उन्होंने सरकार बनाई थी. दरअसल अखिलेश दंगल फिल्म में गीता फोगाट के उस मुकाबले की तरह व्यवहार कर रहे हैं जिसमें आमिर गीता को सिखाते हैं कि उस पहलवान को गलती करने देना और जब वो गलती करे तो उसे पटखनी देकर अंक हासिल कर लेना.

मौका मिला तो लगाया दांव

यूपी की भाषा में कहें तो जब तक मुलायम सिंह का 'भौकाल टाइट' था तब तक तो अखिलेश यादव एक सीधे-शरीफ की तरह व्यवहार करते रहे लेकिन जब उन्हें लगा कि मुलायम की पार्टी पर मुलायम की पकड़ ढीली पड़ रही है तो उन्होंने सीधा पांच अंकों वाला दांव चला है.

अब हर तरफ जीत हासिल कर रहे हैं अखिलेश यादव. पहले पार्टी पर जीत हासिल की. अपने मन के प्रत्याशी उतार रहे हैं. कांग्रेस से अकारण गठबंधन कर रहे हैं. पिता मुलायम चारों खाने चित्त हैं. शिवपाल की समझ से सब बाहर चल रहा है.

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अमर सिंह इलाज कराने लंदन चले गए हैं. अगर चुनाव जीत गए तो सबसे बड़े खिलाड़ी का खिताब भी जीतेंगे. शायद सितारे बुलंदी पर होना इसी को कहते हैं. मौका मिले तो यूपी जाइए सुनिए और एक नया नारा सुनिए...‘  जिसका जलवा कायम है, उसका बप्पा मुलायम है’ .

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