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जिंदगी जैसी ही रहस्यमयी बनी हुई है ब्रह्मेश्वर मुखिया की मौत

रणवीर सेना के चर्चित संस्थापक ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ ‘मुखिया’ की आरा में 1 जून 2012 को हत्या कर दी गई थी

Surendra Kishore Surendra Kishore | Published On: Jun 01, 2017 12:13 AM IST | Updated On: Jun 01, 2017 12:16 AM IST

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जिंदगी जैसी ही रहस्यमयी बनी हुई है ब्रह्मेश्वर मुखिया की मौत

हत्या के पांच साल बीत जाने के बाद भी जांच एजेंसी के हाथ ब्रह्मेश्वर मुखिया के असली हत्यारों तक नहीं पहुंच पाए हैं.

रणवीर सेना के चर्चित संस्थापक ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ ‘मुखिया’ की आरा में 1 जून 2012 को हत्या कर दी गई थी. अहले सुबह करीब साढ़े चार बजे हुई हत्या के समय वह निहत्थे और अकेले थे. अपने घर के पास ही मार्निंग वॉक कर रहे थे.

गत साल जून में एक संदिग्ध नंद गोपाल पांडेय उर्फ फौजी की गिरफ्तारी के बाद यह उम्मीद जगी थी कि इस चर्चित हत्याकांड का अंततः खुलासा हो जाएगा. पर ऐसा नहीं हो सका.

उसके बाद गत दिसंबर में सी.बी.आई ने अखबारों में एक विज्ञापन देकर लोगों से यह अपील की कि वे इस हत्याकांड के बारे में सटीक सूचना दें. उन्हें दस लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा.

ब्रह्मेश्वर मुखिया की कहानी लीक से हट कर रही है

कभी माओवादियों के बाद बिहार की सर्वाधिक ताकतवर निजी सेना रणवीर सेना ही थी. उसके सुप्रीमो रहे ‘मुखिया’ के हत्यारे को खोज पाने में जांच एजेंसी की विफलता अनेक लोगों के लिए चिंता का कारण बनी हुई है.

साथ ही मुखिया के हत्यारे की चतुराई की भी चर्चा रही है जिन तक बिहार पुलिस कौन कहे सी.बी.आई तक नहीं पहुंच पा रही है.

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याद रहे कि नब्बे के दशक में मध्य बिहार के एक बड़े इलाके में रणवीर सेना और लाल सेना के दस्तों के बीच भीषण खूनी खेल चल रहे थे. एक पर एक बड़े-बड़े नरसंहार और काउंटर नरसंहार हो रहे थे. पर समय के साथ हिंसा कम होती चली गई.

सन् 2005 में नीतीश कुमार के सत्ता में आने के बाद तरह-तरह के हिंसक तत्वों के खिलाफ मुकदमों की पुलिस ने अदालतों में त्वरित सुनवाई करवाई. कुछ ही वर्षों में करीब 75 हजार लोगों को सजाएं मिलीं.

जेल से रिहा होने के बाद लोगों का अभिवादन स्वीकार करते ब्रह्मेश्वर मुखिया (फोटो: फेसबुक)

जेल से रिहा होने के बाद लोगों का अभिवादन स्वीकार करते ब्रह्मेश्वर मुखिया (फोटो: फेसबुक)

आर्म्स एक्ट की दफा को अन्य दफाओं से अलग करके मुकदमे की सुनवाई करवाने का अधिक कारगर असर हुआ था.दरअसल आर्म्स एक्ट के मामले में गवाह पुलिस होती है. वह अपना बयान नहीं बदल सकती.परिणामस्वरूप सजाएं अधिक हुईं. नतीजतन तब हर तरह की हिंसा कम हुई थी.

हालांकि हाल के वर्षों में एक बार फिर राजनीतिक संरक्षणप्राप्त अपराधी तत्वों ने भी सिर उठाया है. बिहार के लोगबाग एक बार फिर स्पीडी ट्रायल की जरूरत महसूस कर रहे हैं.

हालांकि उस खास इलाकों से रणवीर सेना और माओवादी हिंसा की खबरें आनी अब लगभग बंद हो गई है. इस बीच खुद को बदलने में लगे ब्रह्मेश्वर मुखिया की कहानी लीक से हट कर रही है.

रणवीर सेना और अतिवादी कम्युनिस्ट दस्तों के बीच भीषण खूनी टकराव के दौर में तो मुखिया का तो बाल बांका नहीं हुआ था, पर जब उन्होंने अहिंसक तरीके से किसानों को संगठित करने का संकल्प लिया तो उनकी हत्या हो गई. याद रहे कि खुद मुखिया पर हिंसा के 22 मुकदमे थे. अपनी हत्या के पहले ही उन में से 16 मुकदमों में वे बरी हो चुके थे.

सर्वाधिक ताकतवर रणवीर सेना ही साबित हुई

7 मई 2012 को 67 वर्षीय ब्रह्मेश्वर मुखिया ने किसानों और मजदूरों को संगठित करने का संकल्प लेते हुए कहा था कि उन्हें संगठित करके हम किसानों के हितों की ओर सरकार का ध्यान खींचने के लिए अहिंसक आंदोलन चलाएंगे.

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इस संकल्प के एक माह के भीतर ही उनकी हत्या कर दी गई. अब तक मिले संकेतों के अनुसार उनकी हत्या में अतिवादी कम्युनिस्टों के हाथ होने का कोई संकेत नहीं मिला है.

7 मई 2012 को ब्रह्मेश्वर मुखिया ने किसानों के लिए संघर्ष शुरू किया (फोटो: फेसबुक)

7 मई 2012 को ब्रह्मेश्वर मुखिया ने किसानों के लिए संघर्ष शुरू किया (फोटो: फेसबुक)

एक खबर आई थी कि वह अपने आवास के आसपास के दबंगों और उत्पाती तत्वों के खिलाफ खुद ही भिड़ जाते थे. दूसरी खबर यह भी आई थी कि रणवीर सेना के दूसरे गुट के कुछ लोग मुखिया की कथित राजनीतिक महत्वाकांक्षा को लेकर उनसे खार खाए बैठे थे. क्या कोई अन्य कारण थे ?

हत्या के पीछे असली कारण क्या थे, इसका पता तभी चलेगा जब सी.बी.आई असली हत्यारे तक पहुंचेगी. मध्य बिहार में साठ के दशक में नक्सली गरीबों और शोषितों के बीच सक्रिय हुए थे. अर्ध सामंती धाक वाले इलाके में नक्सलियों को गरीबों के बीच पैठ बनाने में सुविधा हुई. क्योंकि गरीब मजदूरों को गांव के ताकतवर लोगों के शोषण से बचाने के लिए शासन का हस्तक्षेप लगभग नगण्य था.

भूमिपतियों और नक्सली लाल दस्तों में जब मारकाट शुरू हुई तो भूमिपतियों की ओर से कई निजी सेनाएं बनीं. इस मारकाट को रोकने का कोई कारगर उपाय करने में भी भ्रष्ट और निकम्मा शासन विफल था. नतीजतन लंबे समय तक समाज का एक हिस्सा नक्सलियों पर तो दूसरा हिस्सा रणवीर सेना जैसी हथियारबंद निजी सेनाओं पर निर्भर रहा.

लाल दस्तों को छोड़ दें तो सर्वाधिक ताकतवर रणवीर सेना ही साबित हुई. इन नर संहारों के बीच समाज का धु्रवीकरण हुआ. राजनीतिक दलों को इस ध्रुवीकरण से चुनावी लाभ मिलने लगा. पर यह सब बाद में नहीं चल सका.

शव यात्रा में शामिल भीड़ ने आरा और पटना में भारी तोड़फोड़ की

पटना विश्व विद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम.ए पास ब्रहमेश्वर सिंह मूलतः किसान परिवार से थे. गांव के मुखिया भी चुने गए थे. रणवीर सेना के इस भूमिगत संस्थापक मुखिया को 2002 के अगस्त में पटना में पुलिस ने गिरफ्तार किया था. वह 2011 की जुलाई में जेल से जमानत पर छूटे थे. एक साल के भीतर मार दिए गए.

एक बड़ तबका ऐसा भी था जो ब्रह्मेश्वर मुखिया को पसंद नहीं करता था (फोटो: फेसबुक)

एक बड़ तबका ऐसा भी था जो ब्रह्मेश्वर मुखिया को पसंद नहीं करता था (फोटो: फेसबुक)

ब्रहमेश्वर मुखिया को लेकर समाज के एक हिस्से में सम्मान के भाव थे तो दूसरे हिस्से खासकर नक्सल समर्थकों, पिछड़े और गरीबों के अनुसार वह शोषक और हत्यारा समूह के संरक्षक थे.

उनकी हत्या के बाद जदयू के तत्कालीन सांसद डा.जगदीश शर्मा ने मुखिया को ‘अवतारी पुरूष’ बताया था. एक अन्य नेता ने उन्हें गांधीवादी कहा था. मुखिया की जघन्य हत्या से उनके समर्थकों और प्रशंसकों में तत्काल उपजे भारी गुस्से का नतीजा यह हुआ था कि कई घंटों तक आरा और पटना के बड़े हिस्से में सड़कों पर अराजकता व्याप्त हो गई थी.

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उनकी शव यात्रा में शामिल गुस्साई भीड़ ने आरा और पटना में भारी तोड़फोड़ की. पुलिस मूक दर्शक बनी रही. पुलिस ने कहा कि यदि बल प्रयोग किया जाता तो पूरे राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ जाती. पर उस उत्तेजित भीड़ में शामिल लोगों में से भी कोई व्यक्ति अब तक मुखिया के असली हत्यारे तक पहुंचने में जांच एजेंसी की मदद नहीं कर सका है.

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