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आम आदमी पार्टी: इस कहानी के सारे किरदार काल्पनिक हैं

पुरानी स्क्रिप्ट और पुराने रोल पर नया किरदार सामने है कपिल मिश्रा के रूप में. अक्सर ऐसे प्रयोग करने के लिये रामगोपाल वर्मा ही जाने जाते हैं

Kinshuk Praval Kinshuk Praval | Published On: May 15, 2017 02:51 PM IST | Updated On: May 15, 2017 02:51 PM IST

आम आदमी पार्टी: इस कहानी के सारे किरदार काल्पनिक हैं

साइंस फिक्शन की फिल्मों की वजह से ‘टाइम मशीन’ पर कई फंतासियां हैं. दावे भी किये गए हैं कि इंसान अतीत और भविष्य में जा सकता है. लेकिन ऐसा कोई वाकया आंखों के सामने से नहीं गुजरा है. हालांकि वैज्ञानिक ऐसे आविष्कार में जुटे हुए हैं जिसे टाइम मशीन का नाम दिया जा सके. लेकिन इंसान ने राजनीति नाम का एक ऐसा आविष्कार जरूर कर दिया है जिसमें किसी भी पार्टी या नेता का भूत,वर्तमान और भविष्य सभी देखा जा सकता है.

पार्टियां या नेता अपने अतीत के भूत से पीछा नहीं छुड़ा पाते हैं. उनके कामकाज और चरित्र का पक्का हिसाब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाता है. तभी जब कभी किसी के साथ कुछ पहले की तरह घटा हुआ होता है तो अंग्रेजी में कहा जाता है – हिस्ट्री रिपीट्स इटसेल्फ.

इस वक्त एक्शन-रीप्ले मोड में आप

साभार @KapilMishraAAP

साभार @KapilMishraAAP

आम आदमी पार्टी भी भावनाओं के ज्वार से उपजे आंदोलन का एक आविष्कार है. इसके किरदारों को देखकर कहा जा सकता है कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है. तकरीबन साढ़े तीन साल की मासूम उमर की इस राजनीतिक पार्टी के सारे किरदार काल्पनिक हैं जिनका वास्तविक जीवन में किसी के साथ कोई सरोकार नहीं है. यहां किरदार समय के साथ बदलते हैं और अपनी भूमिका का मंचन खुद करते हैं. अपने डायलॉग खुद लिखते हैं और अपने रोल का निर्देशन भी खुद करते हैं. इस वक्त आम आदमी पार्टी की कहानी एक्शन-रीप्ले के मोड में है.

आम आदमी पार्टी के संयोजक ही दिल्ली के मुख्यमंत्री भी हैं. तिनका-तिनका जोड़ कर अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुए. आज उनकी सत्ता को चुनौती दे रहे हैं उनके ही पूर्व साथी कपिल मिश्रा.

पर्दे के पीछे हैं अरविंद केजरीवाल. आम आदमी पार्टी का जब पोस्टर फटा तो कपिल मिश्रा नाम का हीरो सामने निकला है.

यहां टाइम मशीन का फॉर्मूला सेट दिखाई दे रहा है. कपिल मिश्रा के जरिये अरविंद केजरीवाल का फ्लैशबैक देखा जा सकता है.

कपिल मिश्रा के बयानों और भाषणों में अरविंद केजरीवाल की आर्काइव बाइट सुनी जा सकती हैं.

सौ साल पहले चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने एक उपन्यास लिखा था – ‘उसने कहा था’.

आज इसी उपन्यास का नया वर्जन लिखा जा सकता है – ‘पहले केजरीवाल ने कहा था ...अब कपिल मिश्रा ने कहा’.

दोनों ही किरदार सत्ता की मृगतृष्णा में इस तरह शोकाकुल हैं कि इनके अलाप और विलाप में राजनीति किसी क्रंदन सा सुनाई देती है.

जो लोग कुछ साल पहले अरविंद केजरीवाल का ‘नायक’ वाला किरदार नहीं देख सके वो राजनीति की ‘टाइम मशीन’ के जरिये कपिल मिश्रा का लाइव शो देख सकते हैं.

पुरानी स्क्रिप्ट और पुराने रोल पर नया किरदार सामने है कपिल मिश्रा के रूप में. अक्सर ऐसा प्रयोग करने के लिये रामगोपाल वर्मा ही जाने जाते हैं लेकिन आप पहली राजनीतिक पार्टी है जिसने इसे जमीन पर उतारा.

शीला दीक्षित पर भ्रष्टाचार के आरोप से राजनीति की शुरुआत

Sheila-Dixit

याद कीजिए वो दौर जब दिल्ली की गद्दी पर शीला दीक्षित विराजमान हुई थीं. अरविंद केजरीवाल ने शीला पर भ्रष्टाचार के आरोपों से अपनी राजनीति की शुरुआत की. उन्होंने शीला को हर गली, हर नुक्कड़, हर रोड, हर मोहल्ले में टारगेट किया. दिल्ली की जनता से सीधा सवाल किया कि आपको दिल्ली में बेईमान सरकार चाहिए या फिर अरविंद केजरीवाल. दिल्ली की सड़कों पर केजरीवाल नाम ब्रांड बन कर दौड़ा क्योंकि ऑटो के पीछे पोस्टर चस्पा रहता था.

अरविंद केजरीवाल अनशन पर बैठे. हाथ में माइक थाम कर गरजे कि जिस दिन सत्ता में आएंगे तो शीला दीक्षित को जेल भेजकर ही सांस लेंगे. कॉमनवेल्थ घोटाले के आरोपियों को बख्शेंगे नहीं. यहां तक कि उन्होंने ये भी कहा कि वो पार्टी के भीतर किसी भी तरह का करप्शन एक मिनट के लिये बर्दाश्त नहीं करेंगे.

केजरीवाल अनशन पर भी बैठे. बाद में दिल्ली की सत्ता पर भी काबिज हुए. सीएम बदलते ही उनका रोल बदलना शुरू हो गया. क्योंकि आम आदमी पार्टी में केजरीवाल अपनी भूमिका खुद ही समय के हिसाब से तय करते हैं.

उनके डायलॉग बदलने शुरू हो गए जबकि मीडिया ने कहा कि सुर बदल गए. जबकि ऐसा नहीं था. केजरीवाल नई भूमिका में आ चुके थे. उन्होंने अपने आपको रिडिस्कवर किया. भारत एक खोज की तरह केजरीवाल एक नई खोज हुई.

योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को पार्टी से निकाला था

YOGENDRA yadav

सियासत की चक्की में चुनावी आदर्शों को घोंट-घोंट कर पीसा गया. फिर नए चेहरे का लेप तैयार हुआ. जिनको पुराने चेहरे के मुखौटे की पहचान थी उन्हें सबसे पहले पार्टी से बाहर किया गया. योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, प्रो आनंद कुमार जैसे बड़े नाम बहादुर शाह जफर की तरह रंगूनवासी बना दिये गए.

पार्टी यूं ही चल रही थी और पार्टी के भीतर भी पार्टियां चल रही थीं. काल्पनिक किरदारों के असल चेहरे जनता के सामने धीरे-धीरे आने लगे. कई लोग नए रोल में फिट नहीं दिखे तो उनका सीन ही खत्म हो गया.

लेकिन इन सबके बीच वक्त खामोशी के साथ नायक पार्ट टू बनाने की तैयारी में जुटा हुआ था. उसे कपिल मिश्रा के रूप में केजरीवाल का रीमेक बनाने का मौका मिल गया.

कहानी पुरानी और घिसीपिटी न दिखे इसलिये थोड़ा सा बदलाव किया. आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक और अन्ना आंदोलन की टीम के खास सदस्यों में से एक चेहरे को उठाया गया.

कपिल मिश्रा ने अपना रोल बखूबी निभाया. ठीक केजरीवाल की तरह ही उन्होंने भी दिल्ली के सीएम पर भ्रष्टाचार का बम फोड़ा. कपिल ने केजरीवाल पर दो करोड़ की रिश्वत लेने का आरोप लगाया. साथ ही ये भी कहा कि उन्होंने अपने साढ़ू के नाम पर सात एकड़ जमीन की पचास करोड़ रुपए में डील की है. जैसे केजरीवाल के समय शीला कसमसा कर चुप रह जाती थीं उसी तरह अब केजरीवाल चुप हैं.

जैसे केजरीवाल ने कहा था कि वो शीला दीक्षित को जेल भिजवा कर दम लेंगे वैसे ही कपिल मिश्रा ने कहा कि वो कॉलर पकड़ कर घसीट कर केजरीवाल के तिहाड़ भेजेंगे. यहां डायलॉग थोड़ा वॉयलेंट हैं लेकिन वक्त की जरूरत के हिसाब से स्क्रिप्ट की यही डिमांड थी ताकि केजरीवाल बोंले. कुछ तो बोलें. लेकिन केजरीवाल मौन व्रत लिये हुए हैं तो वहीं कपिल मिश्रा अनशन पर बैठे हैं. नायक टू का रीमेक नायक के पहले पार्ट की सारी बातें ताजा कर चुका है.

इस कहानी में किरदारों में थोड़ा फर्क है. इस बार अन्ना हजारे सीन में कहीं नहीं हैं. सिर्फ छोटा सा गेस्ट अपीयरेंस था और एक ही डायलॉग था कि – ‘मेरा सपना तो बहुत पहले ही टूट गया था’.

सपना तो दिल्ली वालों का भी दोबारा टूटा है. तभी अब उन्हें रियलिस्टिक दिखने वाली आम आदमी पार्टी के नुमाइंदे वाकई काल्पनिक किरदारों से दिखाई दे रहे हैं जिनका वास्तविकता और जनता से कोई सरोकार नहीं है.

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