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कपिल-केजरीवाल विवाद: जरूरत फिर से नैतिकता का पाठ पढ़ाने की है

उन्होंने एक संस्कृति को जन्म दिया है जिसमें हर कोई अपने सहयोगी का इस्तेमाल सीढ़ी के तौर पर कर रहा है.

Sandipan Sharma Updated On: May 09, 2017 03:36 PM IST

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कपिल-केजरीवाल विवाद: जरूरत फिर से नैतिकता का पाठ पढ़ाने की है

चोरों का भी एक सम्मान होता है लेकिन आम आदमी पार्टी के नेता इससे अनजान हैं. गुस्सैल और शरारती बच्चों की तरह इसके बड़े नेता हर कुछ महीने में इस कदर बुरी लड़ाई में उलझते रहे हैं जैसे वो तलाक के लिए लड़ी जाने वाली बुरी और शर्मनाक लड़ाई लड़ रहे हों.

आए दिन आप नेता जिस तरह एक-दूसरे के खिलाफ जंग छेड़ते दिख रहे हैं उसे देखकर तो यही लगने लगा है कि अगर किसी दिन अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के बीच दंगल की खबर मिल जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा.

राजनीति में एंट्री करने के बाद अगर तथाकथित शिक्षित शहरी प्रबुद्ध ऐसे हो जाते हैं तब लगता है कि हमारी मूल्य व्यवस्था में जरूर कोई बड़ी गड़बड़ है.

कपिल मिश्रा और केजरीवाल के बीच छिड़ी जंग में कोई नैतिकता नहीं बची और ये बताता है कि पिछले दो साल के दौरान आप ने किस तरह का उदाहरण पेश किया है.

कुछ दिन पहले कपिल मिश्रा, केजरीवाल के विश्वासपात्र लेफ्टिनेंट थे. पार्टी का लड़ाकू चेहरा थे. इतने खुशमिजाज थे कि उन्हें देखकर लगता था जैसे वे किसी मजबूत डोर से बंधे हों.

कोई नहीं जानता कि बीते कुछ दिनों में क्या घटित हुआ. आप के भीतर ये अभिमान की लड़ाई है या बीजेपी की साजिश- लेकिन इतना तो साफ है आप नेता किसी न किसी कारण अब एक दूसरे का गिरेबान पकड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं.

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गुरू से संग्राम

 

Arvind Kejriwal

कपिल मिश्रा ने अरविंद केजरीवाल के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है

मिश्रा जो राजनीति में केजरीवाल के कर्जदार हैं अब दिल्ली के मुख्यमंत्री को जेल में डालने, उनकी राजनीति खत्म कर देने की धमकी दे रहे हैं और उनके भ्रष्टाचार विरोधी विश्वसनीयता पर करारा प्रहार कर रहे हैं.

बदले में केजरीवाल की ओर से उनकी करीबी मंडली का हिस्सा रहे मिश्रा को दोषी ठहराया जा रहा है. उन्हें बीजेपी की कठपुतली, लोकप्रियता का भूखा और अयोग्य मंत्री बताया जा रहा है.

शाज़िया इल्मी के बाहर होने से लेकर प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के निष्कासन और हाल में कुमार विश्वास के बगावत तक का पैटर्न सामान्य है.

पहले इसके नेता कुछ ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे वे जन्म से बिछड़े भाई हों और सीधे राजनीति में एक मंच पर आकर जुड़ गए हों. लेकिन इसके कुछ महीने बाद उनके बीच अभिमान की टकराहट होती है.

एक बार जब लड़ाई शुरू हो जाती है तो वे एक-दूसरे के बाल पकड़कर बाजार में खींच लाते हैं और इतने शर्मनाक तरीके से लड़ते हैं कि यह विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि ये वही लोग थे जो कुछ दिनों पहले एक- दूसरे से गले मिला करते थे और मजबूत रिश्ते की मिसालें पेश किया करते थे.

बशीर बद्र ने कभी लिखा था- दुश्मनी जम कर करो, लेकिन ये गुंजाइश रहे जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिन्दा न हों. जाहिर है आप पार्टी के नेताओं ने दुश्मनी के दौर में भी एक आम नागरिक की आवाज नहीं सुनी.

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कपिल मिश्रा ने आम आदमी पार्टी में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं

जो नजारे आप आंदोलन की पहचान रहे हैं वो हैं आप नेताओं का कंधे से कंधा मिलाकर रामलीला मैदान में इकट्ठा होना. तब 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी को जबरदस्त जीत मिली थी.

उस दौर की वो तस्वीर आज भी लोगों के जेहन में है जब केजरीवाल बीच में खड़े हैं और कुमार विश्वास खुशी, उत्साह और प्यार जताते हुए उछलकर उन्हें गले लगा रहे हैं.

लेकिन अब उनके बीच दुश्मनी कुछ ऐसी है कि अगर उन्हें रामलीला मैदान में आमने-सामने कर दिया जाए तो शायद वे एक दूसरे पर हमला करने से खुद को रोक न पाएं.

उनके बीच के व्यवहार कुछ इस कदर आक्रामक हो गए हैं कि एक-दूसरे को सम्मान देने के लिए तिल भर भी गुंजाइश इनमें से किसी में नहीं दिखती. सभी अहंकारी, विश्वासघाती और स्वार्थी हैं जिन्हें पीठ में छुरा घोंपने में डिग्री हासिल है.

उदाहरण के लिए अचानक मिश्रा में व्हिसिलब्लोअर बनने की पैदा हुई इच्छा को लिया जा सकता है. अगर उन्होंने मंत्री पद छीने जाने से पहले बोला होता तो आज वे विश्वसनीयता की विशाल माला पहने घूम रहे होते.

खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे

मगर, समय ने उनकी स्थिति ऐसी कर दी मानो खिसियानी बिल्ली खंभा नोच रही हो और बदले की ताक में हो. अगर यह सच भी है कि अरविंद केजरीवाल सत्येन्द्र जैन से बेहिसाब कैश ले रहे थे तो भी मिश्रा को यह बताने की जरूरत है कि वे घटना के बाद के दिनों में चुप क्यों रहे?

kapil mishra

कपिल मिश्रा का आरोप है कि केजरीवाल ने दो करोड़ रूपये रिश्वत लिए हैं

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अगर वे सचमुच अपने विवेक और नैतिकता से प्रेरित होकर ऐसा कर रहे हैं तो क्यों उन्होंने ये बातें मंत्री पद से बर्खास्त करने के बाद ही क्यों कही?

अपनी ओर से केजरीवाल कुछ ऐसे दिखते हैं जैसे किसी ने उन्हें विशेषज्ञ बना दिया है जो पीठ में छुरा घोंपने वालों से घिरे हों. नैतिकता के स्तर पर उनके आसपास के लोगों में बड़ा फासला हो.

पहली नजर में मिश्रा का आरोप कि दिल्ली के मुख्यमंत्री ने दो करोड़ रुपये अपने मंत्री से लिए - इसका सिर्फ दो मतलब होता है. या तो खुद को भ्रष्टाचार विरोधी क्रूसेडर घोषित करने वाले केजरीवाल इतने बेपरवाह और बेचैन थे कि किसी चश्मदीद के सामने छोटी रकम भी ले सकते थे.

या फिर उन्होंने ऐसी राजनीतिक संस्कृति का नेतृत्व किया जहां व्यक्तिगत आकांक्षा और बदले की भावना ही मुख्य सिद्धांत बन गए.

बेशक केजरीवाल को यही सलूक मिलना चाहिए. महीनों से वे- 'ये सब चोर हैं जी' - मार्का राजनीति के विशेषज्ञ रहे हैं. 'हमला करो और भागो' की सियासत जिनकी पहचान रही है.

उन्होंने एक संस्कृति को जन्म दिया है जिसमें हर कोई अपने सहयोगी का इस्तेमाल सीढ़ी के तौर पर सफलता के लिए करता रहा और एक बार जब उसकी उपयोगिता खत्म हो गयी तो उन्हें बेरहमी से खारिज करते हुए उनकी इज्जत उतार दी.

इन सबके बीच उम्मीद की किरण बाकी है. अब जबकि वे एक-दूसरे को चोर बता रहे हैं, हम उम्मीद करें कि कोई होगा जिसका ध्यान सम्मान और मर्यादा की ओर जाएगा.

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