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केजरीवाल-विश्वास समझौता: भ्रम की कहानी या हकीकत का फसाना

दोनों नेताओं के बीच का तात्कालिक युद्धविराम एक बार फिर से बड़े संघर्ष की तरफ बढ़ेगा?

Amitesh Amitesh | Published On: May 03, 2017 07:02 PM IST | Updated On: May 03, 2017 07:22 PM IST

केजरीवाल-विश्वास समझौता: भ्रम की कहानी या हकीकत का फसाना

आम आदमी पार्टी के भीतर लगी आग को फिलहाल बुझाने की कोशिश की गई है. कुमार विश्वास पर आरएसएस-बीजेपी से मिले होने के आरोप लगाने वाले आप के ओखला से विधायक अमानतुल्लाह को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया गया है. पार्टी की तरफ से एक कमेटी बना दी गई है जो अमानतुल्लाह के बयान की जांच करेगी.

यह कदम कुमार विश्वास की जिद और उनके कड़े तेवर के बाद उठाया गया है, वरना पार्टी के भीतर एक और बिखराव और बवाल देखने को मिलता. कोशिश है कश्मकश को थामने की. लेकिन, अमानतुल्लाह पर कार्रवाई के बाद भी अंदर का बवाल इतनी आसानी से थम जाएगा यह कहना मुश्किल है.

मनीष और विश्वास ने दिलाया सबकुछ ठीक होने का भरोसा

मनीष, manish

लगभग तीन घंटे तक चली पीएसी की मैराथन बैठक के बाद आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया और कुमार विश्वास मीडिया से मुखातिब हुए तो एक संदेश देने की कोशिश की गई कि पार्टी में अब सबकुछ ठीक-ठाक हो गया है. कल तक बागी तेवर अपनाने वाले कुमार विश्वास मान गए हैं.

लेकिन, दोनों की बातों और शारीरिक भाषा से साफ झलक रहा था कि पार्टी के भीतर सबकुछ फिलहाल ठीक नहीं है. पार्टी के भीतर कई मुद्दों पर असहमति है जिसको लेकर आने वाले दिनों में बातचीत का दौर जारी रहेगा.

कुमार विश्वास ने इस बात का संकेत भी दे दिया कि कई मुद्दों पर सहमति-असहमति है जिसपर आगे भी चर्चा जारी रहेगी. केजरीवाल फिलहाल झुक गए हैं तभी तो कहा जा रहा है कि अब नेताओं के बीच चर्चा लगातार होगी, यानी सबकी सुनी जाएगी और संवादहीनता अब खत्म होगी.

दरअसल, आम आदमी पार्टी के भीतर चल रहा बवाल अरविंद केजरीवाल बनाम कुमार विश्वास बन गया था, जिसमें कुमार विश्वास किसी भी सूरत में पार्टी के भीतर अपनी अहमियत से समझौता करने के मूड में नहीं थे. लेकिन, इसके उलट कुमार लगातार पार्टी के भीतर हाशिए पर धकेल दिए गए थे. पार्टी के भीतर उनकी न सुनी जा रही थी और न ही उनसे रायशुमारी हो रही थी. केजरीवाल और उनके करीबी नेता ही लगातार पार्टी के सारे निर्णय ले रहे थे. यही बात कुमार विश्वास को अखर रही थी.

पंजाब और गोवा विधानसभा चुनाव के वक्त भी कुमार को नजरअंदाज कर दिया गया. प्रचार से कुमार विश्वास नदारद रहे. पंजाब में सरकार बनाने का सपना चूर होने और गोवा में गणित पूरी तरह से फेल होने के बाद रही सही कसर दिल्ली में पूरी हो गई. इसी के बाद कुमार विश्वास को बोलने का मौका मिल गया और वो पार्टी के आम नाराज कार्यकर्ता की आवाज बनकर उभर गए जिसे दबा पाना केजरीवाल के लिए मुश्किल हो गया.

पीएसी की बैठक के बाद बाहर निकले कुमार विश्वास ने इस मुश्किल घड़ी  में उनके साथ खड़े रहने वाले पार्टी के कैडर्स का धन्यवाद दिया लेकिन, इस बात से इनकार किया कि पार्टी के भीतर वर्चस्व को लेकर किसी प्रकार का कोई विवाद है. कुमार विश्वास ने एक बार फिर दोहराया कि उन्हें पार्टी के भीतर न कोई पद चाहिए न ही उन्हें मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री बनना है.

क्या कुमार को लॉलीपॉप दिया गया है?

kumar

कुमार विश्वास को पार्टी की तरफ से राजस्थान का प्रभारी बनाकर उन्हें एक जिम्मेदारी सौंपी गई है. शायद पार्टी के भीतर उनको फिर से सक्रिय करने की कोशिश है. लेकिन, इस कोशिश के भी कई मायने लगाए जा रहे हैं. क्या केजरीवाल ने कुमार को लॉलीपाप थमा दिया है. चूंकि आप का राजस्थान में कोई खास वजूद नहीं है. ऐसे में राजस्थान की जिम्मेदारी सौंपकर कुमार विश्वास को क्या वो सब मिल गया जिसको लेकर उनकी नाराजगी थी. इसका जवाब न में ही मिलेगा.

कुमार विश्वास भले ही पार्टी के भीतर किसी तरह के पद पाने को लेकर लालायित नहीं दिख रहे हों, लेकिन, उनके और उनके चाहने वालों की नाराजगी इसी बात को लेकर थी कि पार्टी की लगातार हो रही हार की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा.

नाराजगी इस बात को लेकर ज्यादा थी कि अपने काम काज और कार्यशैली में सुधार के बजाए हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ा जा रहा है. पार्टी सूत्रों के मुताबिक, कुमार विश्वास औऱ उनके समर्थकों की नाराजगी इस बात पर भी थी कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री के साथ-साथ पार्टी के संयोजक का पद भी संभाल रहे हैं.

आरोप ये भी लगे कि कुमार विश्वास पार्टी के संयोजक जैसा बड़ा पद चाहते हैं. लेकिन, फिलहाल इस बात से कुमार ने इनकार कर मामले को शांत करने की कोशिश भी की है. राजस्थान का प्रभार देकर उन्हें शांत करने की कवायद जरूर हुई है, लेकिन, हकीकत तो यही है कि केजरीवाल के पास संयोजक की भी जिम्मेदारी है और मुख्यमंत्री पद की भी.

आप के भीतर की बगावत को फिलहाल थाम लिया गया है. कुमार का विश्वास फिर से वापस लाने की कोशिश हुई है. पार्टी को एक और बिखराव से रोकने की कवायद हुई है. अपने-आप को पार्टी का सर्वेसर्वा मानने वाले केजरीवाल पहली बार आप के दूसरे फाउंडर मेंबर कुमार के सामने थोड़ा झुकते भी नजर आ रहे हैं. लेकिन, सवाल अभी भी मुंह बाए खड़ा है कि आप का युद्ध विराम आखिर कबतक बरकरार रहेगा. क्या केजरीवाल आने वाले दिनों में कुमार की पार्टी के भीतर की ज्यादा दखलंदाजी बर्दाश्त कर पाएंगे या फिर, ये तात्कालिक युद्धविराम एक बार फिर से बड़े संघर्ष की तरफ बढ़ेगा?

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