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आम आदमी पार्टी को कौन लाएगा 'बंद कमरे' से बाहर?

आम आदमी पार्टी शहरी मध्यवर्ग के प्रतिनिधि दल के रूप में उभरी थी लेकिन उसी वर्ग ने उसका साथ छोड़ा

Pramod Joshi | Published On: Apr 29, 2017 09:22 AM IST | Updated On: Apr 29, 2017 09:22 AM IST

आम आदमी पार्टी को कौन लाएगा 'बंद कमरे' से बाहर?

युद्धों में पराजित होने के बाद वापिस लौटती सेना के सिपाही अक्सर आपस में लड़ते-मरते हैं. आम आदमी पार्टी के साथ भी ऐसा ही हो तो विस्मय नहीं होगा. एमसीडी चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी के नेता-कवि कुमार विश्वास ने कहा है कि हमारे चुनाव हारने का कारण ईवीएम नहीं बल्कि, लोगों से संवाद की कमी है.

उन्होंने यह भी कहा है कि पार्टी में कई फैसले बंद कमरों में किए गए जिस वजह से एमसीडी चुनाव में सही प्रत्याशियों का चयन नहीं हो पाया. उन्होंने यह भी कहा कि सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर पीएम नरेंद्र मोदी पर निशाना नहीं साधना चाहिए था.

अभी यह कहना मुश्किल है कि कुमार विश्वास की ये बातें पार्टी के भीतर की स्वस्थ बहस को व्यक्त करती हैं या व्यक्तिगत कड़वाहट को. अरविन्द केजरीवाल ने पार्टी के नए पार्षदों और विधायकों की बैठक में 'अंतर-मंथन' का इशारा भी किया है. उधर नेताओं की अंतर्विरोधी बातें सामने आ रहीं हैं और संशय भी. पार्टी तय नहीं कर पाई है कि क्या बातें कमरे के अंदर तय होनी चाहिए और क्या बाहर.

अचानक ईवीएम को लेकर पार्टी के रुख में बदलाव है. उसकी विचार-प्रक्रिया में यह अचानक-तत्व ही विस्मयकारी है. लगता है विचार सड़क पर होता है और फैसले कमरे के भीतर. महत्वपूर्ण है उसकी विचार-मंथन प्रक्रिया. पार्टी के इतिहास में विचार-मंथन के दो बड़े मौके इसके पहले आए हैं. एक, लोकसभा चुनाव में पराजय के बाद और दूसरा 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भारी विजय के बाद. पार्टी की पहली बड़ी टूट उस शानदार जीत के बाद ही हुई थी. और उसका कारण था विचार-मंथन का प्रक्रिया-दोष.

कुमार विश्वास ने माना कि ईवीएम की गड़बड़ी एक मुद्दा हो सकता है लेकिन इसे उठाने का सही मंच कोर्ट और चुनाव आयोग है, जहां जाकर हम अपनी आपत्ति दर्ज कराएं. सवाल है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में हार का सामना कर रही मायावती के बयान के फौरन बाद आम आदमी पार्टी ने भी अचानक इस मसले को क्यों उठाया? क्या इस बात पर विचार किया था कि देश के मध्यवर्ग की प्रतिक्रिया क्या है? और यह भी कि यह आरोप मोदी सरकार पर नहीं, चुनाव आयोग पर है, जिसकी छवि अच्छी है.

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"आप" से जितनी तेजी से लोग जुड़े उतनी ही तेजी से वापस जा रहे हैं

अपनी राजनीति से भटकी आम आदमी पार्टी

आम आदमी पार्टी का जन्म होने के बाद युवा उद्यमियों, छात्रों तथा सिविल सोसायटी ने उसका आगे बढ़कर स्वागत किया था. पहली बार देश के मध्यवर्ग की दिलचस्पी राजनीति में बढ़ी थी. सोशल मीडिया से जुड़े युवा वॉलंटियर ‘आप’ की बड़ी ताकत बने. इनमें काफी युवा पश्चिमी देशों में काम करते हैं. उनके मन में भारत की प्रशासनिक व्यवस्था के दोषों को दूर करने की ललक है. पर जितनी तेजी से वे आए. उतनी तेजी से वे जा भी रहे हैं. ज्यादातर की शिकायत है कि यहाँ लोकतंत्र नहीं है.

योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण के हटने के बाद पिछले साल पंजाब में संयोजक के पद सुच्चा सिंह छोटेपुर का हटना बड़ी घटना थी. यह पार्टी भी ‘हाईकमान’ से चलती है. इसके केन्द्र में कुछ लोगों की टीम है, जो फैसले करती है. यह भी सही है कि यही टीम इसे एक बनाए रखती है. वैसे ही जैसे नेहरू-गांधी परिवार कांग्रेस को और संघ परिवार बीजेपी को एक बनाकर रखता है. पर यही बात तो उनकी कमजोरी है.

बड़े लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर चलने वाली इस पार्टी की आंतरिक संरचना में भी झोल है. बहरहाल पार्टी को तार्किक परिणति तक पहुंचना होगा. सफल नहीं होगी तो विफलता के किसी स्तर को छूना होगा. क्या दिल्ली की हार उसका ‘बॉटम आउट’ है?

‘आप’ एक छोटा एजेंडा लेकर मैदान में उतरी थी. व्यापक कार्यक्रम अनुभव की ज़मीन पर विकसित होगा, बशर्ते वह खुद कायम रहे. उसके शुरुआती तौर-तरीकों पर गौर करें तो समझ में आता है कि उसे सबसे पहले नगरपालिका के चुनाव लड़ने चाहिए थे. गली-मोहल्लों के स्तर पर वह नागरिकों की जिन कमेटियों की कल्पना लेकर आई, वह अच्छी थी. इस मामले में मुख्यधारा की पार्टियां फेल हुई हैं. पर जनता के साथ सीधे संवाद के आधार पर फैसले करने वाली प्रणाली को विकसित करना मुश्किल काम है. उसके भीतर वही तत्व घुसा, जो दूसरे दलों में है.

arvind kejriwal, yogendra yadav

वैकल्पिक राजनीति बस कहने भर को रह गई

वैकल्पिक राजनीति से बात शुरू होकर पारंपरिक राजनीति में बदली

वैकल्पिक राजनीति की बातें तो हुईं, पर उस राजनीति के विषय खोजे नहीं गए. इसलिए वही मोदी, राहुल, नीतीश, लालू और ममता. उन्हीं राष्ट्रीय प्रश्नों पर वैसी ही बयानबाज़ी जैसा मुख्यधारा की राजनीति का शगल है. दूसरी ओर सरकारी कुर्सी पर बैठने के बाद भी वही धरना-प्रदर्शन की धमकियां. उसकी बड़ी कमजोरी है, आंतरिक लोकतंत्र की उपेक्षा. इसने क्षेत्रीय-राष्ट्रीय क्षत्रपों की तरह अरविंद केजरीवाल को ब्रांड बनाया और ‘तस्वीरों के मायाजाल’ में अपने समर्थकों को लपेट लिया.

आम आदमी पार्टी शहरी मध्यवर्ग के प्रतिनिधि दल के रूप में उभरी थी. दिल्ली में उसी वर्ग ने उसका साथ छोड़ा. बेशक झुग्गी-झोपड़ी उसके साथ हैं, पर यह वह तबका है, जिसे मुफ्त बिजली-पानी और इलाज आकर्षित करता है. वह ‘वोट बैंक’ है. मुख्यधारा की राजनीति उसे सपने दिखाकर अपना काम चला रही है. उस लोकलुभावन राजनीति से शहरी मध्यवर्ग का मोहभंग हो चुका है. आम आदमी पार्टी इस वर्ग की राजनीति का संदेश लेकर आई थी. इसमें वह फेल हुई है.

इस पार्टी ने दो संकेत दिए थे. जनता से जुड़ाव और पारदर्शिता. भारतीय राजनेता आज भी सामंती दौर के निवासी लगते हैं. ‘आप’ का अपना कोई रेडीमेड विचार और दर्शन नहीं है. जो भी है बन और ढल रहा है. ‘स्वराज’ नाम का उसका दस्तावेज़ कुछ बुनियादी बातों का अनगढ़ संकलन है. पर उसे क्रांतिकारी और व्यवस्था-विरोधी बदलाव की पार्टी मान लेना जल्दबाजी होगी.

भारी-भरकम विचारधारा से मुक्त होना ‘आप’ की कमज़ोरी नहीं, ताकत थी. ऐसा लगता था कि उसके भीतर नए विचारों को स्वीकार करने की सामर्थ्य है और वैचारिक आधार व्यापक है. उसका संदेश था कि मुख्यधारा की पार्टियां खुद को ओवरहॉल करें. अब यही सवाल उसके सामने है.

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